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बर्फीले स्थानों पर जवानों के पैर गर्म रखेंगे आइआइटी कानपुर में बने विशेष जूते

डा. जे. रामकुमार ने बताया कि अत्यधिक ठंड की स्थिति में रहने वाले लोगों के आघात से संबंधित बीमारियों का शिकार होने की आशंका रहती है। साथ ही अनियंत्रित रक्तस्राव भी प्रमुख समस्या होती है। अगर शरीर का तापमान बेहद कम हो जाता है।

By Sanjay PokhriyalEdited By: Published: Mon, 12 Sep 2022 06:41 PM (IST)Updated: Mon, 12 Sep 2022 06:41 PM (IST)
आइआइटी कानपुर की लैब में तैयार किया गया विशेष जूता दिखाते प्रोफेसर जे. रामकुमार।

चंद्रप्रकाश गुप्ता, कानपुर : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की टीम ने एसे जूते तैयार किए हैं, जो ग्लेशियर व अत्यधिक ठंडे स्थानों पर तैनात जवानों के पैरों को गर्माहट देंगे। यही नहीं जवान बाहरी तापमान के अनुसार जूते के अंदर की गर्माहट को कम-ज्यादा भी कर सकेंगे। संस्थान इस तकनीक को किसी कंपनी को हस्तांतरित करने पर विचार कर रहा है। साथ ही रक्षा मंत्रालय के इनोवेशन फार डिफेंस एक्सीलेंस (आइडेक्स) कार्यक्रम में भी आवेदन किया जाएगा। ताकि इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सके।

आइआइटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग और डिजाइन विभाग के प्रोफेसर जे. रामकुमार ने बताया कि यह विशेष जूते 12 वोल्ट की बैटरी, तापमान नियंत्रण इकाई व तापयुग्म (थर्मोकपल) सेंसर तकनीक पर आधारित है। बैटरी से प्रवाहित धारा को तारों के माध्यम से रबर सोल के अंदर तारों की पतली चादर में प्रवाहित किया जाता है। इस चादर को नाइक्रोम तार से बनाया गया है। नाइक्रोम तार में 80 प्रतिशत निकल और 20 प्रतिशत क्रोमियम होता है। इससे कुछ ही देर में सोल के साथ पूरे जूते का तापमान बढ़ जाता है और जूता पहनने वाले के पैरों को गर्माहट मिलती है।

सोल के अंदर तारों की चादर के तापमान को मापने के लिए सेंसर का इस्तेमाल किया गया है। इससे तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही जूते के भीतर पूर्वनिर्धारित तापमान सीमा कायम रखने को आन-आफ स्विच (रिले) का इस्तेमाल किया गया है ताकि बैटरी से मिलने वाली ऊर्जा बाहरी तापमान के मुताबिक नियंत्रित की जा सके। जब रिले चालू होता है तो गर्मी देने वाली प्रक्रिया शुरू करने के लिए बैटरी से ऊर्जा की आपूर्ति होती है और जब रिले बंद होता है तो बैटरी ऊर्जा की आपूर्ति बंद कर देती है।

अत्यधिक ठंड में बढ़ते हैं आघात से संबंधित मामले

डा. जे. रामकुमार ने बताया कि अत्यधिक ठंड की स्थिति में रहने वाले लोगों के आघात से संबंधित बीमारियों का शिकार होने की आशंका रहती है। साथ ही अनियंत्रित रक्तस्राव भी प्रमुख समस्या होती है। अगर शरीर का तापमान बेहद कम हो जाता है तो रक्तस्राव या रक्त की आपूर्ति की कमी मृत्यु का कारण बन सकती है। चूंकि ग्लेशियरों में मनुष्य के जूते बर्फ के संपर्क में आते हैं, इसलिए पैरों को गर्म रखना बेहद जरूरी होता है। कई बार सैनिक लंबे समय तक ड्यूटी करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि उनके पैरों में शीतदंश व अन्य स्थायी क्षति होने लगती है। अत्यधिक ठंडी जलवायु से निपटने के लिए सैनिक भारी इंसुलेटिंग जूतों का भी उपयोग करते हैं, लेकिन भारी इंसुलेटिंग जूते सैन्य अभ्यास में बाधा उत्पन्न करते हैं।

जूते का वजन भी कम, बैटरी चार्जिंग भी आसान

जूता निमार्ण की प्रक्रिया के निर्देशन करने वाले प्रोफेसर जे. रामकुमार के अनुसार अमूमन ग्लेशियर पर जवान पौन किलो तक वजन के जूते का प्रयोग करते हैं, जो काफी भारी होते हैं, लेकिन आइआइटी के बनाए जूते का वजन आधा किलोग्राम से भी कम होगा। इसमें लगी बैटरी चार से पांच घंटे तक ऊर्जा देगी। इसके बाद इसे चार्ज किया जा सकता है या फिर दूसरी बैटरी का इस्तेमाल किया जा सकता है। ज्यादातर जवान ग्लेशियर पर एक बार में इतने समय तक ही ड्यूटी करते हैं।


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