कानपुर, आरती तिवारी। कोरोना की दूसरी लहर में आक्सीजन की किल्लत के बीच खबरें आईं कि कुछ जगहों पर कोविड-19 के संक्रमण से जूझ रहे व्यक्ति अंतत: पीपल और नीम के पेड़ों तले इस आस में बैठ गए कि इनसे मिलने वाली जीवनदायी प्राणवायु उन्हें पुन: स्वस्थ कर देगी। शरीर में गिरते हुए आक्सीजन के स्तर को बढ़ाने की इस कवायद पर कुछ लोगों ने प्रश्नचिन्ह लगाए, मगर चिकित्सकों ने इसे पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया। आयुर्वेद चिकित्सकों ने खुलकर और दबी जुबान में ही सही अन्य पद्धतियों के चिकित्सकों ने कहा कि इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। पहले तो यह हारे को हरिनाम सरीखा लगा, मगर कई रोगियों के इस दावे के बाद कि इससे उन्हें लाभ हुआ, एक बार फिर लोगों की नजर प्रकृति के उस सबसे सुंदर उपहार की ओर गई है जिन्हें हम वृक्ष कहते हैं और जो बिना किसी मूल्य के आजीवन हमारी सेवा व प्राणरक्षा करते हैं। कैसा दुर्भाग्य है कि इन प्राणमित्रों के लिए हमारे पर्यावरण में अब कोई जगह नहीं बची है या ये कहें कि मानवशासित पर्यावरण में वृक्षों की कोई जगह न होने की वजह से यह दुर्भाग्य आया है।

2021 का विश्व पर्यावरण दिवस वृक्षों का शोकगीत है। जिस मानव प्रजाति को वे प्राणवायु देते थे, लगभग दो साल से कोविड-19 की उठती लहरों की वजह से उन्हें उसी के बेहिसाब अंतिम संस्कार का अंतिम साथी बनना पड़ रहा है। बेशक जीवन की पहली किलकारी से लेकर आखिरी सफर तक वृक्षों का मानव से यह साथ बहुत पुराना है, लेकिन जिस तरह उन्हें यह इस साल निभाना पड़ा वह विशुद्ध रूप से अर्थहीन और अनर्थ था। अब जब कोविड-19 की दूसरी लहर मंद पड़ रही है, यह सोचने-विचारने का समय है कि हमने क्या खोया, किन्हें खोया और क्यों खोया!  विचार यह भी करना चाहिए कि आक्सीजन के अभाव में पेड़ों के नीचे मरीजों के लेटने की घटना अति है या अंतिम विकल्प। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के कारण किसी अदने से वायरस द्वारा हंसते-खेलते परिवारों को लील जाने का समाधान भी इसी के उत्तर में छिपा है।

सांसों की चुका रहे कीमत

कोविड-19 की दूसरी लहर आई तो लगभग हर तरफ आक्सीजन सिलिंडर लिए आक्सीजन जुटाने वालों की भीड़ नजर आई। लोगों के हाथ मदद को बढ़े और प्रशासन ने भी अपनी तरफ से जगह-जगह आक्सीजन ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की व्यवस्था शुरू कर दी। सोचने वाली बात है कि प्रकृति में मौजूद इस जीवनदायी गैस को इस कदर सिलिंडर में भरने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर इसको तो हम बिना अतिरिक्त लागत चुकाए वातावरण से पा सकते हैं। तमाम बार चेताए जाने के बावजूद आक्सीजन के प्राकृतिक स्रोत यानी पेड़-पौधों को अपनी जरूरत के हिसाब से काटते-छांटते जाने और नष्ट करने का आज नतीजा यह है कि लोग गिन-गिनकर सांसें लेने पर मजबूर हुए। वक्त बता रहा है कि अब सिर्फ सजगता नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति एक्टिव मोड में संचालन करने की भी जरूरत है अन्यथा स्थिति बद से बदतर होते देर नहीं लगेगी।

ले डूबेगा लालच 

एक वक्त ऐसा था जब धरती के तमाम बेशकीमती खजाने अनछुए थे। अपने लालच में इंसानों ने इसको नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। पेड़ों की कटाई, मिट्टी के खनन से लेकर नदियों की रेत को भी नहीं छोड़ा। जितना हम प्रकृति को नष्ट करते जा रहे हैं उतना ही हमारा जीवन अव्यवस्थित होता जा रहा है। परिणामस्वरूप, आज वायरस, प्रदूषण, प्राकृतिक आपदाएं और अन्य तकलीफें हमारे सामने हैं, जिनसे मानव प्रजाति हर दिन जूझ रही है।

बड़े जरूरी हैं छोटे जंगल

बेहतर होगा कि हम जल्द से जल्द इस आदत को बदल लें और जिन जंगलों को हमने बर्बाद कर दिया, उन्हें एक बार फिर उगाकर अपना पश्चाताप कर लें। अब आप कहेंगे कि इंसान जंगल कैसे उगा सकते हैं? तो दो-चार पेड़ों से शुरुआत कर छोटा सा जंगल बनाया जा सकता है। पृथ्वी को इंसानों के रहने लायक बनाए रखना है तो छोटे-छोटे जंगलों के रूप में वृक्षों का गुलदस्ता लगाना होगा। ऐसा भी नहीं है कि जीवनदायी हरे-भरे वातावरण के लिए इतनी जगह तक न मिल सके, जिसमें दो-चार पेड़ लगाकर उनका संरक्षण और पोषण हो पाए। जरूरत है कि एक साथ मिलकर प्रदूषण से निपटने के लिए छोटे-छोटे जंगल बनाने की पहल हो। मात्र 10-15 वर्ग फुट क्षेत्र में ही दो से चार पेड़ आराम से तैयार किए जा सकते हैं। बेंगलुरु में बसे उत्तराखंड के मूलवासी शुभेंदु शर्मा और उनकी टीम ने 700 वर्ग फुट क्षेत्र में छोटा जंगल उगाया तो 10 वर्ग फुट क्षेत्र में तीन से चार पेड़ उगाकर छोटे-छोटे जंगलों की परिकल्पना को साकार भी किया है। यदि अभी से प्रयास शुरू नहीं किए गए तो विकास की आंधी में विलुप्त होते जनहितैषी वृक्षों को भविष्य में देख पाना शहर ही नहीं, गांवों के बच्चों के लिए भी सपने जैसा होगा।

तय है प्रकृति का चक्र

यह भी नहीं कि अब आप सिर्फ एक ही प्रजाति के पेड़ लगाकर सोचें कि जिम्मेदारी पूरी हुई। प्रकृति में हर चीज का एक क्रम तय है। जिस प्रकार सभी जीव मिलकर एक खाद्य शृंखला बनाते हैं, ठीक वैसे ही पेड़ों को लगाने का भी एक तरीका है, जिससे पर्यावरण में संतुलन बनता है। जिस तरह हमारी डाइट में शामिल दूध स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ दूध ही हमारी सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। उसी तरह सिर्फ नीम या सिर्फ बरगद प्रकृति के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। एक तय तरीके से प्रकृति का चक्र बनाने के बारे में मानवनिर्मित जंगल बनाने को लेकर काम कर रही कंपनी एफॉरेस्ट के एक्जक्यूटिव डायरेक्टर सनी वर्मा कहते हैं, ‘बिगड़ चुके इकोसिस्टम को दुरुस्त करने का एक तरीका यह है कि जिस तरह से पहले जमाने के लोगों की बनाई गई मान्यताओं में हर तरह के पौधों के लिए तय स्थान था, ठीक वैसे ही हमें नीम और बरगद के साथ-साथ शीशम, बड़हल, कदंब, अर्जुन, पलाश जैसे पेड़ों को भी स्थान देना होगा। तब जाकर हमारे जीवन और प्रकृति के बीच का संतुलन ठीक हो पाएगा। जरूरी है कि हम वृक्षों की लुप्त हो रही प्रजातियों की पहचान करें और उनके महत्व को समझते हुए दोबारा अपने जीवन में शामिल करें।’

कुदरत के आंकड़ों में आक्सीजन

550 लीटर 

शुद्ध आक्सीजन जरूरी है एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन।

117 लीटर

आक्सीजन हर साल बनाती हैं औसत आकार के पेड़ की पत्तियां।

30 फीसद 

अधिक आक्सीजन छोड़ता है बांस अन्य वनस्पतियों के मुकाबले।

100 फीसद 

कार्बन डाई ऑक्साइड सोखता है पीपल।  बरगद और नीम में यह आंकड़ा क्रमश: 80 फीसद और 75 फीसद है।

24 घंटे 

आक्सीजन छोड़ते हैं पीपल और तुलसी।

खत्म हो रहे प्रकृति के प्रहरी

विकास की दौड़ में हमने आक्सीजन देने वाले पेड़ -पौधों को अंधाधुंध तरीके से काटा, परिणामस्वरूप हमें आक्सीजन प्लांट लगाने की जरूरत महसूस हो रही है।  प्रकृति के अन्य प्रहरी जैसे जुगनू, गिरगिट, केंचुए, तितली, मधुमक्खियां भी खत्म हो रहे हैं। आज दुनियाभर में लोग आक्सीजन पार्क, कार फ्री जोन और कार फ्री सिटीज जैसी जगहें बना रहे हैं, क्योंकि वे जान चुके हैं कि यही सबसे जरूरी है। समय रहते पर्यावरण को बचा लें तो ही हमारा जीवन बचेगा।

गौरव बाजपेयी, पर्यावरण संरक्षक

जंगल खत्म तो खाद्य शृंखला खत्म

देखा जाए तो कोविड क्राइसिस व आए दिन इस जैसी नई-नई बीमारियों का एक कारण यह भी है कि हमारे आसपास से जंगल घट गए। हमारी टीम का यही मोटो भी है ‘मोर फारेस्ट, लेस डिजीज’। जंगल न सिर्फ हमारे लिए तोहफे की तरह हैं, बल्कि उनका हर हिस्सा एक सबक देता है। जंगलों में फूड चेन पूरी तरह शुरू होती और चरम पर जाती है। इसका हर हिस्सा जंगलों से कुछ न कुछ हासिल कर रहा है। हम जंगल खत्म करके पूरी फूड चेन खत्म कर देते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी ज्योग्राफी को समझते हुए पेड़ या अपना छोटा सा जंगल लगाएं। यह तरकीब आपके बहळ्त काम आएगी।

शुभेंदु शर्मा, इको एंटरप्रेन्योर

इमली, बेल, जामुन, बेर, गूलर, खैर, शहतूत, शरीफा, बड़हल, खिन्नी जैसे बहुउपयोगी वृक्ष आज विलुप्ति की कगार पर हैं। अशोक, अर्जुन, शीशम, कदंब के पेड़ों के अलावा पीपल, बरगद और पाकड़ जैसे भरपूर आक्सीजन देने वाले पर्यावरण हितैषी पेड़ों की संख्या भी कम होती जा रही है।

प्राणवायु ही नहीं, जीवन के आधार हैं पेड़

पेड़ों से निकलने वाली आक्सीजन मानव जीवन को बचाती है। नीम, बरगद, तुलसी तथा बांस की प्रजातियां सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देने वाले पेड़-पौधे हैं।पेड़ों की जड़ें मिट्टी के क्षरण को रोकती हैं, जिससे वातावरण में धूल कम बनती है। 

पेड़ भू-जल स्तर बढ़ाने में सबसे ज्यादा मदद करते हैं। बड़, शीशम, पीपल, आम इसमें बेहद सहायक हैं।

पेड़ वायुमंडल के तापक्रम को कम करते हैं। पेड़ों से घिरी जगह पर दूसरी जगहों की अपेक्षा तीन से चार डिग्री तापमान कम होता है।

यह अमूल्य संपदा हमें ग्लोबल वॉर्मिंग, सूखा, बाढ़ जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है।

Edited By: Shashank Pandey