बेटे को मिली असफलता तो खुद संभाली कमान, यूपी के रिटायर्ड PWD कर्मचारी नीरज पांडेय ऐसे बने 'मशरूम किंग'
पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने कानपुर में मशरूम की खेती को स्वरोजगार का माध्यम बनाया है। उन्होंने अपने बेटे ...और पढ़ें

मशरूम की पैदावार अपने हाथो में लिए किसान नीरज पांडेय
HighLights
सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने शुरू की मशरूम की खेती।
कानपुर में 10 हटों से 30 टन उत्पादन का लक्ष्य।
तकनीकी ज्ञान और बाजार समझ से मिली सफलता।
जागरण संवाददाता, कानपुर। चौबेपुर ब्लॉक के मरियानी गांव निवासी पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने सेवानिवृत्त होने के बाद मशरूम की खेती को स्वरोजगार का माध्यम बनाया है। वर्ष 2022 में नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद शुरू किया गया उनका यह प्रयास अब विस्तार की ओर बढ़ रहा है। चार वर्षों में उन्होंने आठ हटों में उत्पादन व्यवस्था तैयार कर ली है। अब दो नए हट तैयार कर वह कुल 10 हटों से करीब 30 टन मशरूम उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
नीरज पांडेय ने बताया कि मशरूम की खेती की शुरुआत उनके बेटे के प्रयास से हुई थी, लेकिन शुरुआती दौर में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने खुद इस काम की जिम्मेदारी संभाली और तकनीकी जानकारी जुटाकर उत्पादन बढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे अनुभव बढ़ा और खेती का दायरा भी बढ़ता गया।
बांस-बल्ली से तैयार एक हट में मशरूम उत्पादन की व्यवस्था तैयार की जाती है। नीरज के अनुसार, एक हट बनाने में करीब दो लाख रुपये तक की लागत आती है। एक हट से एक उत्पादन चक्र में करीब तीन टन मशरूम उत्पादन होने की संभावना रहती है।
लोगों के लिए उदाहरण बने नीरज
उन्होंने बताया कि उत्पादन, बिक्री मूल्य और अन्य खर्चों के आधार पर एक हट से करीब 50 हजार रुपये तक की बचत होने का अनुमान है। इस हिसाब से 10 हटों से करीब पांच लाख रुपये तक आय बचने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम आय बाजार भाव, उत्पादन लागत और बिक्री पर निर्भर करती है।
वर्तमान में उनके यहां तैयार मशरूम कानपुर के बाजारों में पहुंच रहा है। मांग को देखते हुए उन्होंने उत्पादन क्षमता बढ़ाने का फैसला लिया है। आठ हटों से करीब 24 टन उत्पादन के बाद अब 10 हटों के जरिए 30 टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
नीरज का कहना है कि मशरूम की खेती में कम जगह में उत्पादन की संभावना होती है, लेकिन सफलता के लिए तापमान नियंत्रण, साफ-सफाई, तकनीकी जानकारी और बाजार की समझ जरूरी है। उनका प्रयास रिटायरमेंट के बाद स्वरोजगार की तलाश करने वालों के लिए एक उदाहरण बन रहा है।
