'ये कानपुर है। यहां ऐसी तमाम मिसाल मिल जाएंगी कि कोई नौजवान नौकरी की तलाश में आया। उसने उद्योग-व्यापार की ओर कदम बढ़ाया तो सफलता मिलती गई और आज सफल उद्यमियों की जमात में उनका नाम लिया जाता है। बेशक, इस उपलब्धि में उनकी खुद की काबिलियत का हिस्सा बड़ा है, लेकिन श्रेय तो इस 'उद्यम-उर्वर' धरती को भी देना होगा। खुद उद्यमी और विशेषज्ञ मानते हैं कि कानपुर ऐसा शहर है, जहां औद्योगिक विकास की संभावनाएं अन्य तमाम शहरों की तुलना में कहीं अधिक हैं। प्रशिक्षित मजदूर, उद्यमिता की सोच, संघर्ष का माद्दा...। यह सबकुछ था, तभी तो इसे 'पूरब का मैनचेस्टर' का तमगा मिला। यहां के उत्पाद विश्व प्रसिद्ध रहे और आज भी हैं।

मगर, तकलीफ यह है कि अब स्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। मिल-कारखाने बंद होते गए। बेरोजगारी बढ़ती गई। आखिर क्या वजह है और वह कौन से रास्ते हो सकते हैं, जिन पर चलकर कानपुर फिर पूरब के मैनचेस्टर का ताज अपने सिर सजा सकता है? इसी पर मंथन और रायशुमारी के लिए दैनिक जागरण ने शनिवार को 'माय सिटी माय प्राइड' अभियान के तहत राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें शामिल हुए वित्त विशेषज्ञ, उद्यमी और प्रबुद्धजनों ने एक सुर में सूत्र दिया कि कानपुर को अपनी ब्रांडिंग और मार्केटिंग जरूर करनी होगी। विषय प्रवर्तन संपादकीय प्रभारी आनंद शर्मा ने किया। अतिथियों का आभार प्रदर्शन यूनिट हेड अवधेश शर्मा ने, जबकि संचालन रेडियो सिटी के आरजे राघव ने किया।

 

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पूंजी बाजार में बढ़ाना होगा निवेश
उद्योगपति पद्म कुमार जैन का सुझाव था कि उद्यमियों को पूंजी बाजार में निवेश बढ़ाना होगा। हमने शेयर ब्रोकिंग का काम 1977 में शुरू किया। तब इसे यहां कोई जानता भी नहीं था। कानपुर में अवधारणा ही नहीं थी कि पूंजी बाजार में निवेश किया जाए। यहां का स्टॉक एक्सचेंज स्थापना के कुछ समय में ही सबसे आगे हो गया। उद्योगों को बूम मिला। वह संभावनाएं आज भी हैं।

जरूरी है उद्योग में 'री-इनवेस्टमेंट'
शिक्षाविद् एवं अर्थ विशेषज्ञ डॉ. श्यामबाबू गुप्त का कहना था कि बड़ी-बड़ी मिल बंद हो गईं, लेकिन युवाओं ने नया औद्योगिक स्वरूप बनाया। मिल तो मालिक और मजदूरों के संघर्ष में बंद हुईं। श्रम कानून की समीक्षा बहुत जरूरी है। सबसे ज्यादा जरूरी है कि उद्यमी आय का लगभग 40 फीसद पैसा 'री-इनवेस्टमेंट' में लगाए। इससे उद्योग का विस्तार होगा, ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा।

उद्योग और शैक्षिक संस्थान के बीच न हो दूरी
छात्रों को प्रबंधन और मार्केटिंग के गुर सिखाने वाले शिक्षाविद् डॉ. मजहर अब्बास नकवी की शिकायत थी कि कानपुर के लोग ही अपने शहर के सबसे ज्यादा आलोचक हैं। यह बंद करना होगा। साथ ही पूंजी बाजार में आइपीओ लाएं। वहीं, पाठ्यक्रम ऐसे बनें, जो युवाओं को मार्केटिंग के काबिल बनाएं। औद्योगिक इकाइयों और शैक्षिक संस्थान को दूरी पाटकर एक-दूसरे की जरूरत के हिसाब से काम करना होगा।

उत्पाद की गुणवत्ता ही दिलाएगी सफलता
संघर्ष से सफलता का मुकाम हासिल करने वाले उद्यमी बलराम नरूला का कहना था कि कानपुर मुख्यत: टेक्सटाइल सिटी के रूप में स्थापित है। दुर्भाग्य से मिलें बंद होती गईं। इस शहर को अपेक्षित प्रगति न मिल पाने के पीछे उद्यमियों की संकुचित सोच भी रही। इस सोच को बदलने की जरूरत है। ग्राहक कृपा करके हमारा उत्पाद नहीं खरीदेगा। हमें अपने उत्पाद की गुणवत्ता को प्राथमिकता पर रखना होगा।

कानपुर बन सकता है उत्पादों की मंडी
हर्बल चाय का उद्योग शुरू कर दिव्यांगों को रोजगार देने वाले स्वामी करुणामूर्ति का कहना था कि टीवी पर प्राइम टाइम में जो विज्ञापन आते हैं, उनमें अधिकांश उत्पाद कानपुर के होते हैं। औद्योगिक घराने उत्पादन कानपुर में करते हैं, क्योंकि यहां जमीन और श्रमिक सस्ते हैं और कारोबार दिल्ली से करते हैं। यह स्थिति बदलनी होगी। ब्रांडिंग कर कानपुर को उत्पादों की मंडी बनाना होगा।

फिर दिखने लगी हैं विकास की संभावनाएं
अर्थ विशेषज्ञ एवं शिक्षाविद् प्रो. संजय कुमार श्रीवास्तव ने सकारात्मक नजरिया रखा। बोले कि मैं इस शहर में आया, तब यह औद्योगिक ढलान पर था। उद्योग बंद हो रहे थे, तमाम समस्याएं थीं। यह गरीबनवाज शहर फिर उठान की ओर है। बिजली आपूर्ति, सड़कें सुधरी हैं। मालिकों के प्रति श्रमिकों की सोच बदली है। धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है, संभावनाएं नजर आ रही हैं।

उद्यमियों को चाहिए संसाधन और सुरक्षा
उद्यमी उमंग अग्रवाल का कहना था कि कानपुर सौ साल तक औद्योगिक मानचित्र में सबसे ऊपर रहा है। सरकार कुछ नया न दे, पुराने संसाधन और व्यवस्थाएं ही बहाल कर दे। यहां वाटर ट्रांसपोर्ट की महती आवश्यकता है। संसाधनों के अलावा उद्यमी-व्यापारियों को सुरक्षित माहौल भी चाहिए। वहीं, बाहरी औद्योगिक घरानों को लाने की बजाए यहां स्थापित लघु उद्योगों को बढ़ाया जाए।

उत्पाद के साथ जरूरी है शहर की ब्रांडिंग
छोटी सी पूंजी से बड़ा कारोबार खड़ा करने वाली युवा उद्यमी प्रेरणा वर्मा का कहना था कि कुछ लोग बाहर जाकर अपने उत्पाद की तो ब्रांडिंग करते हैं और शहर या देश की बुराई करते हैं। इसका बड़ा नुकसान होता है। इस सोच को बदलना होगा। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि शिक्षा व्यवस्था में भी उद्यमिता को अहमियत देनी होगी। अभी यही सिखाया-पढ़ाया जाता है कि अच्छा पढ़कर अच्छी नौकरी लग जाएगी।

नई तकनीक और सोच से मिलेगी राह
वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में नई सोच के साथ कदम बढ़ाने वाले युवा उद्यमी नितिन चौधरी ने समस्या में से ही समाधान खोजने की बात कही। उनका कहना था कि शहर में गोबर की समस्या का मुद्दा उठता है, उससे बड़े पैमाने पर गोबर गैस बनाने में इस्तेमाल क्यों नहीं करते। कूड़े से बॉयो-सीएनजी बनाई जा सकती है। हमें नई सोच और तकनीक को अपनाकर औद्योगिक विकास करना होगा।

कानपुर में है बहुत दम
संघर्ष और सफलता के बेहतरीन स्वाद चख चुके कारोबारी रामगोपाल दुबे पूरी तरह सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज नजर आए। उनका कहना था कि मैं 14 साल पहले नौकरी की तलाश में कानपुर आया था। अच्छी नौकरी नहीं मिली तो स्वरोजगार की दिशा में प्रयास किए और सफलता मिल गई। आज ई-रिक्शा का कारखाना चला रहा हूं। उनका स्पष्ट मानना है कि कानपुर में उद्यमिता विकास का भरपूर दम है।

धरातल पर भी उतारनी होंगी योजनाएं
कारोबारी शिवकुमार गुप्ता ने कहा कि फजलगंज सबसे पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है, लेकिन यहां तमाम समस्याएं हैं। उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं तमाम बनती हैं, लगातार बैठकें भी होती रहती हैं, लेकिन योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पातीं। यदि कागज पर बनने वाली योजनाओं पर व्यावहारिक रूप से अमल होगा तो निश्चित ही लघु उद्योगों को ऑक्सीजन मिल जाएगी।

बढ़ानी होगी युवाओं की भागीदारी
युवा कारोबारी रजत गुप्ता का मानना है कि यदि उद्यमिता को बढ़ाना है, अर्थ तंत्र को मजबूत करना है तो इसमें युवाओं की भागीदारी भी सक्रियता से बढ़ानी होगी। युवाओं को सिर्फ नौकरी की ही राह न दिखाएं। उन्हें स्वरोजगार के प्रति प्रोत्साहित करें। इसके साथ ही जरूरी है कि युवा मानव संसाधन और उनकी नई सोच का भी पूरा इस्तेमाल किया जाए।

जागरुकता का भी है अभाव
प्रबंधन की शिक्षा से जुड़े शशांक अवस्थी ने बताया कि 2010 में एमबीए की पढ़ाई के बाद वह प्रबंधन शिक्षा से जुड़ गए। उन्होंने अहसास किया कि युवा एडमिशन तो लेते थे, लेकिन उनका खुद नजरिया स्पष्ट नहीं होता था कि वह यह करना क्यों चाहते हैं। इसके बाद हमने एक मिशन भी चलाया। हमें युवाओं को जागरूक करना होगा, एक चैनल ऐसा बनाना होगा, जो व्यावहारिकता के प्रति जागरूक करे।

यह भी थे विशेषज्ञों के मत
- कानपुर-लखनऊ सड़क मार्ग की कनेक्टिविटी और बेहतर की जाए। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पर टोल प्लाजा के रिकॉर्ड बताते हैं कि 80 फीसद वाहन कानपुर के होते हैं।
- शहर में औद्योगिक माहौल बनाने, इसकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग करने के लिए नियमित रूप से ट्रेड फेयर का आयोजन करना चाहिए।
- विदेशों की तर्ज पर स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने की बजाए रीयल इकोनॉमिक जोन बनाए जाएं।
- कानपुर को मैन्युफैक्चरिंग हब, स्प्रिच्युअल और मेडिकल टूरिज्म की दिशा में भी विकसित किया जा सकता है।

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By Nandlal Sharma