भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) और हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) जैसे संस्थानों ने कानपुर की पहचान एजुकेशन हब के रूप में बनाई है। तकनीकी शिक्षा की रोशनी फैलाने वाले यह चिराग हैं, फिर भी शहर की शिक्षण व्यवस्था पर चिंता की परछाई नजर आती है। वह भी तब, जबकि सरकार प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक संसाधनों पर करोड़ों रुपया प्रतिवर्ष खर्च कर रही है।

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शैक्षिक संस्थान हैं, पढऩे के लिए छात्र हैं, लेकिन मुख्य कमी है तो शिक्षकों की। सरकार यदि इस ओर ध्यान देकर शिक्षण संस्थानों को 'द्रोण' दे दे तो इसमें कोई शक नहीं है कि यहां से काबिल छात्रों के रूप में सफलता का लक्ष्य भेदने वाले 'अर्जुन' भी खूब मिलेंगे।

दो लाख छात्रों को कैसे पढ़ाएं एक हजार शिक्षक

कानपुर के छत्रपति शाहूजी महाराज विवि से 1200 डिग्री कॉलेज संबद्ध हैं। इनमें 61 सहायता प्राप्त कॉलेज भी हैं। इनमें दो लाख छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। मगर, सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इन्हें पढ़ाने के लिए मात्र 1000 शिक्षक ही हैं, जबकि जरूरत कम से कम 2500 शिक्षकों की है। यही वजह है कि नियमित रूप से कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं।

सिर्फ सीएसजेएमयू ही नहीं, एचबीटीयू और चंद्रशेखर आजाद कृषि विवि भी इसी मुश्किल से गुजर रहे हैं। इससे न सिर्फ पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि शोध कार्यों की रफ्तार भी काफी धीमी है। उच्च शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही सरकार यदि शिक्षकों की कमी पूरी कर दे तो उच्च शिक्षा में कानपुर का स्तर काफी हद तक सुधर सकता है। 

तभी तो स्कूल नहीं आते बच्चे

प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा पर सरकार का पूरा जोर है। बच्चे स्कूल आएं और उन्हें पोषण भी मिले, इसके लिए मिड डे मील भी दिया जाता है। मगर, क्या यह काफी है। दरअसल, सरकार लगातार सरकारी स्कूलों में शिक्षण के सुधार के लिए प्रयासरत है। जनप्रतिनिधियों से विद्यालय गोद लेने के लिए भी कहा गया है। इसके बावजूद स्थिति उन प्रयासों के सापेक्ष सुधरती नहीं दिख रही है।

सरकार प्राथमिक विद्यालय के हर बच्चे पर 20 हजार रुपये प्रतिवर्ष और उच्च प्राथमिक विद्यालय के बच्चे पर 40 हजार रुपये प्रतिवर्ष खर्च कर रही है। वहीं, शिक्षकों के वेतन पर लगभग 300 करोड़ रुपये का प्रतिवर्ष व्यय हो रहा है। मगर, 200500 विद्यार्थियों की बड़ी संख्या के सामने यह संसाधन अभी नाकाफी हैं।

ग्रामीण क्षेत्र के कई विद्यालयों में तो बिजली कनेक्शन तक नहीं है। वहीं, शिक्षकों की कमी से हर विद्यालय जूझ रहा है। यही वजह है कि अभिभावक अपनी क्षमताओं के अनुसार निजी विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। हालांकि फीस और अन्य खर्च अधिक होने की वजह से गरीब परिवार अपने बच्चों को यहां नहीं पढ़ा सकते।

तकनीकी संस्थानों का भरपूर है आकर्षण

सरकार शिक्षकों की कमी पूरी करने के साथ ही अन्य संसाधन दुरुस्त कर दे तो कानपुर की अलग ही पहचान होगी। दरअसल, देश भर के लिए कानपुर का शैक्षिक वातावरण एक आकर्षण है। यहां आइआइटी, गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज और एचबीटीयू की वजह से कई शहरों के बच्चे इंजीनियरिंगऔर मेडिकल की पढ़ाई के लिए यहां आते हैं। काकादेव को तो कोचिंग मंडी के नाम से ही जाना जाता है। यहां लाखों बच्चे रह कर पढ़ाई कर रहे हैं।

यह हैं शहर के प्रमुख शैक्षिक संस्थान

- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान

- हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी

- गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज

- चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि

- राष्ट्रीय शर्करा संस्थान

- उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान

आंकड़े : एक नजर

बेसिक व माध्यमिक शिक्षा

- सर्व शिक्षा अभियान का बजट- 24.85 करोड़ रुपये

- मिड डे मील का बजट- 17.70 करोड़ रुपये

- प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन का खर्च- करीब 300 करोड़ रुपये

- विद्यालयों की संख्या- 2471

- विद्यार्थियों की संख्या- 200500

- प्राथमिक शिक्षा में प्रति छात्र, प्रतिवर्ष खर्च- 20 हजार रुपये

- उच्च प्राथमिक शिक्षा में प्रति छात्र, प्रतिवर्ष खर्च- 40 हजार रुपये

उच्च शिक्षा

- छत्रपति शाहूजी महाराज से संबद्ध डिग्री कॉलेज- 1200

- सहायता प्राप्त कॉलेज- 61

- छात्र-छात्राओं की संख्या- लगभग दो लाख

- शिक्षकों की संख्या- 1000

- शिक्षकों की जरूरत- 2500

By Nandlal Sharma