प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों की कमी नहीं। सरकार इन पर पैसा भी खूब खर्च करती है। मध्याह्न भोजन वितरण, सरकारी यूनिफॉर्म से लेकर तमाम जतन, फिर भी सरकारी स्कूल में पढ़ने वही विद्यार्थी क्यों जाते हैं, जिनके अभिभावकों के पास निजी स्कूलों का महंगा खर्च उठाने का सामर्थ्य नहीं है। जाहिर सी बात है कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर अच्छा नहीं है।

इस लिहाज से देखें तो सरकार का 'सर्वशिक्षा' का मकसद ही पूरा नहीं हो रहा। न बजट की कमी है और ना ही काबिल शिक्षकों का टोटा। फिर क्या वजह है कि सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय बदहाल बने हुए हैं? शिक्षा में सुधार के क्या हो सकते हैं उपाय? इन बिंदुओं पर 'माय सिटी माय प्राइड' अभियान के तहत पढ़िए पूर्व शिक्षा निदेशक, माध्यमिक शिक्षा उप्र और राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति के सदस्य केएम त्रिपाठी की राय-

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स्कूलों में बनाना होगा शिक्षा का वातावरण
शिक्षाविद् केएम त्रिपाठी कहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा में कान्वेंट स्कूल, सीबीएसई और आइसीएसई संबद्ध विद्यालय भी हैं। इनमें शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा है, जबकि सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों का स्तर बहुत नीचा है। वह मानते हैं कि इन स्कूलों की साज-सज्जा, मूलभूत सुविधाएं, फर्नीचर, बिजली, मेज-कुर्सियां आदि मुहैया कराकर सबसे पहले शैक्षिक वातावरण बनाने की जरूरत है। तभी छात्र-छात्राएं वहां पढ़ने के लिए आएंगे। 

प्रधानाचार्य और प्रबंध तंत्र को देने होंगे अधिकारी
श्री त्रिपाठी कहते हैं कि शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर किसी कार्रवाई का अधिकार प्रबंध तंत्र के पास नहीं है। यदि स्कूल की व्यवस्थाएं सुधारनी हैं तो प्रबंध तंत्र के साथ ही प्रधानाचार्य के भी व्यवस्था संबंधी अधिकार बढ़ाने होंगे। तभी वह शिक्षकों की जिम्मेदारी तय कर नियंत्रण कर सकेंगे। उसके बिना शिक्षा की गुणवत्ता सुधारा जाना आसान नहीं है।

प्रधानाचार्य के लिए हो सेवा पूर्व पाठ्यक्रम
प्रधानाचार्यों के अधिकार बढ़ाने की पैरवी के साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति के सदस्य केएम त्रिपाठी उनकी जवाबदेही बढ़ाने की बात भी पुरजोर तरीके से उठाते हैं। उनका कहना है कि कोई शिक्षक प्रधानाचार्य बन जाता है तो कई बार उसे पता ही नहीं होता कि उसके दायित्व क्या हैं, उसे कैसे शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करना है।

ऐसे में जरूरी है कि प्रधानाचार्य का पद प्राप्त होते ही सेवा पूर्व पाठ्यक्रम कराया जाए। यह कम से कम तीन माह का होना चाहिए। वह सीखें कि आदर्श प्रधानाचार्य को क्या-क्या करना चाहिए। उसकी जिम्मेदारी विद्यालय में शिक्षा अनुकूल वातावरण बनाने की होती है। इसके साथ ही शिक्षकों और प्रधानाचार्य का 'परफॉर्मेंस एप्रेजल' भी होना चाहिए। जवाबदेही तय होनी चाहिए कि सरकार इतना वेतन दे रही है तो आपने क्या योगदान दिया।

अभिभावकों की बढ़ानी होगी भागीदारी
शिक्षाविद् केएम त्रिपाठी मानते हैं कि शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों की स्थिति कुछ ठीक है। वहां छात्र संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक हैं। वह सुझाव देते हैं कि शहर हो या गांव, हर स्कूल की मैनेजमेंट कमेटी सक्रिय होनी चाहिए। इस समिति में अभिभावकों को शामिल कर उन्हें सुधार में सक्रिय करें। उनका विश्वास बढ़ेगा तो बच्चे आएंगे। वह फिक्रमंद होंगे तो सुधार भी शुरू हो जाएगा।

 

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By Nandlal Sharma