कानपुर की होली क्यों है खास? अंग्रेजों के लगान के खिलाफ यहां परंपरा की रंगबाजी
कानपुर अपनी अनूठी होली परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ आठ दिनों तक उत्सव मनाया जाता है। 1942 में स्वतंत्रता ...और पढ़ें
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HighLights
कानपुर में होली का उत्सव आठ दिनों तक मनाया जाता है।
1942 में स्वतंत्रता संग्राम के कारण होली स्थगित हुई थी।
18 गांवों में लगान विरोधी संघर्ष की याद में रंग पंचमी।
आशुतोष मिश्रा, कानपुर। कानपुर की रंगबाजी की परंपरा जगजाहिर है। यहां की युवा पीढ़ी ने रंग खेलने की इस परंपरा को जिंदादिली और मस्ती के साथ बनाए रखा है। पूरे देश में होली एक ही दिन मनाई जाती है, कानपुर के लोग होली की मस्ती में आठ दिन तक डूबे रहते हैं। 1942 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हटिया के रज्जन बाबू पार्क में तिरंगा फहराकर होली खेलने का निर्णय लिया गया था। जब अंग्रेजों ने होली खेल रहे क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया, तो पूरे शहर में लोग सड़कों पर उतर आए और होली नहीं मनाई गई।
अनुराधा नक्षत्र में ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और क्रांतिकारियों को रिहा किया गया, जिसके बाद सात दिन बाद पूरे शहर में होली मनाई गई। वहीं, गंगा किनारे के 18 गांवों में एक और परंपरा निभाई जाती है। इन गांवों में लगान के खिलाफ अंग्रेजों से मोर्चा लेने की याद में रंग पंचमी को होली मनाई जाती है।
गांवों में रंग पंचमी को खेली जाती है होली
गंगा किनारे के 18 गांवों में रंग पंचमी को होली खेलने की परंपरा भी निभाई जाती है, जो लगान के खिलाफ अंग्रेजों से मोर्चा लेने की याद में मनाई जाती है। इन गांवों के युवा जब रंग पंचमी पर होली खेलने की परंपरा के बारे में पूछते हैं, तो बुजुर्ग जोश से भरकर अपने पुरखों के किस्से सुनाते हैं। उनके जेहन में अंग्रेजों से मोर्चा लेने के किस्से जीवंत हो उठते हैं। किस्से सुनकर युवाओं का चेहरा गुस्से में लाल हो जाता है और जंग की जीत का उत्साह पंचमी पर एक-दूसरे को रंगने में दिखाई देता है।
वाजिदपुर, प्योंदी, शेखपुर, मोतीपुर, सुखनीपुर, अलोलापुर, भोलापुर, मवैया, मैकूपुर, अहिरवां, जाना गांव, घाऊखेड़ा समेत 18 गांवों में रंग पंचमी को होली खेली जाती है। यह परंपरा वर्षों से इन गांवों में चल रही है। वाजिदपुर जाजमऊ निवासी पूर्व विधायक रामकुमार बताते हैं कि उनके परदादा स्व. बाबू जगन्नाथ जमींदार थे। वर्ष 1917 में अंग्रेज कलक्टर ने किसानों पर भारी लगान लगा दिया था। इसके विरोध में उन्होंने 18 गांव के ग्रामीणों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। इस पर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
ग्रामीणों ने इस घटना के विरोध में होली नहीं मनाई। चार दिन बाद जब वह जेल से छूटे, तो पंचमी को उन्होंने ग्रामीणों के साथ होली खेली। तब से यह परंपरा आज भी जारी है। प्योंदी गांव के सोनेलाल बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता से लगान के खिलाफ लड़ाई के किस्से सुने थे। जब बाबू जगन्नाथ जेल से होली के चौथे दिन छूटकर आए, तो गांव में खोया और शक्कर बांटी गई। इसके बाद अगले दिन पंचमी को रंग खेला गया। किशनपुर के कमलेश कुमार निषाद का कहना है कि उनके गांव में भी पंचमी को होली खेली जाती है, और युवा पीढ़ी इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।
