जागरण संवाददाता, कानपुर: स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पूरे शहर में करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया गया। खर्च तो खूब हो रहा है, लेकिन कार्यों का निगरानी तंत्र पूरी तरह से ठप पड़ा है। तभी ऐतिहासिक इमारतों कोतवाली और लाल इमली में लगी फसाड लाइटें और सौंदर्यीकरण धूल फांक रही हैं। लापरवाही का आलम यह है कि अगर जल्द ही इनका मेंटीनेंस नहीं हुआ तो तीन करोड़ बरबाद होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। शहर की सबसे पुरानी इमारतों में शुमार लालइमली और कानपुर कोतवाली का सुंदरीकरण पिछले साल किया गया था।

केएससीएल ने कानपुर कोतवाली में 1.93 करोड़ और लालइमली मिल के नवीनीकरण के लिए 1.08 करोड़ रुपये खर्च किए। दावा था कि इस राशि से कानपुर कोतवाली को पूरी तरह से पुनर्निर्मित किया जाएगा, जबकि लालइमली मिल को केवल प्रकाश व्यवस्था के साथ सुशोभित किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट पूरा हुए करीब नौ महीने बीत चुके हैं। कोतवाली की यह तस्वीरें बयां कर रही हैं कि महंगी फसाड लाइटें व अन्य उपकरण किस हाल में हैं। जब से इन्हें लगाया गया, उनके मेंटीनेंस को लेकर कुछ भी नहीं हुआ। इसी वजह से इन पर धूल की मोटी पर्त जमा हो गई है।

इसका असर यह हो रहा है कि फसाड लाइटों की चमक धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। कोतवाली के पुनरोद्धार की बात शुरुआत में सामने आई थी, लेकिन लगभग दो करोड़ में केवल पोताई और लाइट लगाए जाने का काम भी प्रोजेक्ट पर सवाल खड़ा कर रहा है। इस मद से कोतवाली की ऐतिहासिक इमारत के अंदर कोई भी काम नहीं कराया गया।

लालइमली

लालइमली मिल की स्थापना वर्ष 1876 में जार्ज ऐलन, वीई कूपर, गैविन एस जोन्स, डा.कोंडोन और बिवैन पेटमैन आदि ने की थी। पहले यह मिल ब्रिटिश सेना के सिपाहियों के लिए कंबल बनाने का काम करती थी। तब इसका नाम कानपोरे वुलन मिल्स था। बाद में मिल परिसर में लाल इमली के पेड़ होने की वजह से इसका नाम लालइमली पड़ा।

दमदार क्वालिटी की वजह से लाल इमली ने वैश्विक नाम कमाया। वर्ष 1920 में ब्रिटिश इंडिया कार्पोरेशन स्थापित किया गया और लाल इमली को एक निदेशक मंडल द्वारा लिमिटेड कंपनी के रूप में पंजीकृत किया गया। वर्ष 1956 में मुद्रा घोटाले के बाद निदेशक मंडल को भंग कर दिया गया। 11 जून 1981 को किए गए राष्ट्रीयकरण में यह मिल भारत सरकार के अधीन हो गई, जहां से इसके पतन की शुरुआत हुई। वर्ष 1992 में यह बीमार यूनिट घोषित कर दी गई।

कानपुर कोतवाली

कानपुर कोतवाली की आधारशिला 84 साल पहले अंग्रेज गवर्नर ने रखी थी। बड़ा चौराहे के पास बनी शहर की पहली कोतवाली का भूमि पूजन 10 मार्च 1936 को आगरा और अवध के गवर्नर जनरल हैरी हैग ने किया था। दो मंजिला कोतवाली की इमारत 25 महीने में बनकर तैयार हुई थी। 26 अप्रैल 1938 को कोतवाली का संचालन शुरू हुआ था। इसकी डिजाइन आइएसई अधिकारी रायबहादुर श्रीनारायण ने तैयार की थी और एसएस भार्गव कांट्रैक्टर थे। कोतवाली में लगे शिलालेख पर नजर डालें तो इसका निर्माण कानपुर एंपावरमेंट ट्रस्ट द्वारा किया गया था। उस जमाने में अंग्रेज पुलिस अधिकारी पूरे शहर पर यहीं से नियंत्रण रखते थे। उनके बैरक भी कोतवाली परिसर में होते थे। उस समय अंग्रेज अधिकारी थानेदार होता था, बाद में शहर का विस्तार होने पर थाने बढ़े तो अधिकारी पद भी बढ़ाए गए।

पुलिस आयुक्त बीपी जोगदण्ड ने कहा कि कोतवाली में स्मार्ट सिटी के तहत कार्य कराया गया और कानपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड की मेंटीनेंस की जिम्मेदारी है। संबंधित विभाग को पत्र लिखकर समय-समय पर मेंटीनेंस के लिए कहा जाएगा। वहीं मंडलायुक्त डा. राज शेखर के अनुसार स्मार्ट सिटी के तहत ये व्यवस्था की गई है। इसे जिस विभाग को दिया जाएगा, उसे रख-रखाव करना है। नगर आयुक्त अभी शहर में नहीं हैं उनसे बात न हो पाने से जानकारी नहीं है कि ये हस्तांतरित हुए या नहीं।

Edited By: Nitesh Srivastava

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट