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कॉरपोरेट जॉब को कहा बाय-बाय, अब गांव में ही प्राकृतिक खेती कर नाम और मुनाफा कमा रहा कानपुर का इंजीनियर कपल 

Published: Sat, 17 Oct 2026 10:05 AM (IST)

इंजीनियर रश्मि और अंकुर सचान ने कॉर्पोरेट करियर छोड़ कानपुर के चतुरी पुरवा में 'तुही फार्म्स' शुरू किया है।

जैविक खेती करने वाली इंजीनियर दंपत्ति रश्मि सचान और अंकुर सचान। जागरण

जैविक खेती करने वाली इंजीनियर दंपत्ति रश्मि सचान और अंकुर सचान। जागरण

HighLights

  1. इंजीनियर दंपत्ति ने कॉर्पोरेट करियर छोड़ प्राकृतिक खेती अपनाई।

  2. कानपुर में 5.5 एकड़ में 'तुही फार्म्स' की स्थापना की।

  3. एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल से 30+ फसलें, स्थानीय लोगों को रोजगार।

जागरण संवाददाता, कानपुर। इंजीनियरिंग की पढ़ाई और कॉरपोरेट करियर छोड़कर रश्मि सचान और अंकुर सचान ने प्राकृतिक खेती को व्यवसायिक पहचान देने का अनूठा माडल तैयार किया है। घाटमपुर तहसील के भीतरगांव ब्लॉक के चतुरी पुरवा गांव में 5.5 एकड़ क्षेत्र में विकसित उनका ‘तुही फार्म्स’ एग्रोफारेस्ट्री और जैविक खेती का सफल उदाहरण बन चुका है।

यहां 30 से अधिक किस्मों के पौधों के बीच फल, फूल और कई फसलों की एक साथ खेती की जाती है। वर्ष 2021 में इस माडल की योजना बनी और 2022 से दोनों ने प्राकृतिक खेती को व्यवस्थित रूप से शुरू किया। आज वे उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ग्राहकों तक उत्पाद पहुंचाने तक की पूरी जिम्मेदारी स्वयं निभा रहे हैं।

मैकेनिकल इंजीनियर रश्मि सचान नोएडा में नौकरी कर चुकी हैं, जबकि उनके पति अंकुर सचान एनआईटी वारंगल से पढ़ाई के बाद सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल रहे हैं। दोनों बताते हैं कि उनके पिता की प्रेरणा ने उन्हें खेती की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया।

दूसरे लोगों को भी दिया रोजगार

खेती शुरू करने से पहले उन्होंने प्राकृतिक खेती और एग्रोफारेस्ट्री की तकनीकों का अध्ययन किया, मिट्टी की जरूरतों को समझा और फिर इस माडल को जमीन पर उतारा। अपनी दोनों बेटियों के नामों को मिलाकर उन्होंने अपने ब्रांड का नाम ‘तुही फार्म्स’ रखा।

फार्म में आम, अमरूद, अनार, मौसमी, आंवला और चीकू जैसे फलदार पौधों के साथ सागवान जैसे इमारती पेड़, औषधीय पौधे और गेंदा जैसे फूल भी लगाए गए हैं। पेड़ों के बीच उपलब्ध भूमि में हल्दी, सरसों, अरहर, मूंग, उड़द और चने की खेती की जाती है। इससे जमीन का अधिकतम उपयोग होने के साथ खेती एक ही फसल पर निर्भर नहीं रहती।

रश्मि सचान के अनुसार, एक बीघे में हल्दी की खेती से करीब 18 क्विंटल उत्पादन मिलता है, जिससे लगभग डेढ़ लाख रुपये का लाभ होता है। वहीं तीन एकड़ में सरसों की खेती से लगभग 21 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता है। सरसों से तेल तैयार कर बेचा जाता है। इसके अलावा अरहर, मूंग, उड़द, चना और वंशी किस्म के गेहूं का आटा भी उनके प्रमुख उत्पाद हैं।

सभी उत्पादों की पैकेजिंग और विपणन वे स्वयं करते हैं। हालांकि वंशी गेहूं के आटे को मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी मानने से पहले वैज्ञानिक प्रमाणों की पुष्टि आवश्यक है।

अंकुर बताते हैं कि उनका उद्देश्य खेत की उपज को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाना है, ताकि बिचौलियों पर निर्भरता कम हो और किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके। उनके इस मॉडल से गांव के सात से आठ लोगों को रोजगार भी मिला है। दोनों का मानना है कि प्राकृतिक खेती को यदि प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और सीधे बाजार से जोड़ा जाए तो खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है।

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खास बातें

  • स्थान: चतुरी पुरवा, भीतरगांव ब्लाक (घाटमपुर), कानपुर
  • क्षेत्रफल: 5.5 एकड़ में एग्रोफॉरेस्ट्री आधारित प्राकृतिक खेती
  • शुरुआत: 2022 से, योजना 2021 में बनी
  • ब्रांड: ‘तुही फार्म्स’ (बेटियों के नाम पर)
  • 30 किस्मों के पौधों के साथ बहुफसली खेती
  • मुख्य उत्पाद: हल्दी, सरसों का तेल, अरहर, मूंग, उड़द, चना और वंशी गेहूं का आटा
  • रोजगार: 7-8 स्थानीय लोगों को काम
  • विशेषता: उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बिक्री—सभी कार्य स्वयं संभालते हैं।