कानपुर, जेएनएन। प्रदेश सरकार में प्रावधिक शिक्षा मंत्री कमलरानी वरुण की कोरोन संक्रमण से मौत की सूचना आते ही घाटमपुर क्षेत्र में शोक की लहर है। वह पहली महिला नेता थीं, जिन्होंने आजादी के बाद से विरोधियों का गढ़ रहे घाटमपुर क्षेत्र में भाजपा को जीत दिलाई थी फिर वह चाहे लोकसभा की सीट रही हो या फिर विधानसभा का चुनाव। 1988 में पहली बार सभासद चुनी गईं कमल रानी वरुण दो बार लोकसभा भी पहुंचीं। विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें प्रावधिक शिक्षा मंत्री बनाया गया। उनका निवास कानपुर के शहरी क्षेत्र में था लेकिन उनकी कर्मभूमि घाटमपुर रही। 

लखनऊ में जन्मी, बहू बनकर आईं कानपुर

लखनऊ में 3 मई 1958 को जन्मी कमलरानी वरुण की शादी एलआईसी में प्रशासनिक अधिकारी किशन लाल वरुण से हुई थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिबद्ध स्वयंसेवक किशन लाल की पत्नी बनकर कानपुर आईं कमलरानी ने पहली बार 1977 के चुनाव में बूथ पर मतदाता पर्ची काटने के लिए घूंघट में घर की दहलीज पार की। समाजशास्त्र से एमए कमलरानी को पति किशनलाल ने प्रोत्साहित किया तो वह आरएसएस द्वारा मलिन बस्तियों में संचालित सेवा भारती के सेवा केंद्र में बच्चों को शिक्षा और गरीब महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का प्रशिक्षण देने लगीं।

सेवा भारती से शुरू किया था जनसेवा सफर

कमलरानी वरुण ने 1987 में सेवा भारती से जुड़कर जनसेवा का सफर शुरू किया था, वह कानपुर दक्षिण में सेवा भारती की मंत्री रहीं। इसके बाद सभासद चुनाव में द्वारकापुरी वार्ड से टिकट मिला और वह चुनाव जीतकर सभासद बन गईं। इसके बाद 1995 में वह फिर चुनाव मैदान में उतरीं और लगातार दूसरी बार सभासद चुनी गईं। इसके बाद वह भाजपा की राजनीति में सक्रिय हो गईं और लोगों के बीच अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी। उन्होंने घाटमपुर क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और ग्रामीण लोगों की समस्याओं का समाधान कराने में जुट गईं।

घाटमपुर क्षेत्र में तैयार की भाजपा की जमीन

आजादी के बाद से घाटमपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा बना रहा, इस क्षेत्र में कमलरानी वरुण ने भाजपा की जमीन तैयार की। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने घाटमपुर संसदीय सीट पर कमलरानी पर भरोसा करके प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने भी चुनाव जीतकर सीट पार्टी की झोली में डाल दी। विरोधियों के गढ़ को तोड़कर भाजपा को पहली जीत दिलाने वाली कमलरानी पर शीर्षस्थ नेताओं का विश्वास और बढ़ गया। घाटमुपर क्षेत्र का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने काफी कुछ किया। इसके बाद 1998 में दोबारा चुनाव हुए तो पार्टी ने फिर उनपर भरोसा दिखाया।

कमलरानी वरुण ने दोबारा जीत हासिल करके पार्टी का भरोसा कायम रखा। लेकिन, लोकसभा का सत्र पूरा नहीं हुआ और वर्ष 1999 में फिर चुनाव की घड़ी आ गई। दो बार की विजयी कमल रानी को पार्टी ने फिर चुनाव मैदान में उतारा लेकिन इस बार मात्र पांच सौ मतों से पराजय का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में बसपा के प्यारेलाल संखवार ने जीत हासिल की और दूसरे नंबर पर सपा की अरुणा कोरी रहीं थीं। यह कमलरानी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ था और वर्ष 2004 में फिर पार्टी ने भरोसा जताकर उन्हें टिकट दिया था लेकिन इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।।

वर्ष 2009 के चुनाव का समय आया तो परिसीमन बदल चुका था और घाटमपुर लोकसभा सीट खत्म हो गई थी। यह वह समय था जब इटावा से लेकर प्रयागराज तक चुनावी क्षेत्र को सपा का गढ़ माना जाता रहा, कुछ एक जगहों पर कांग्रेस मजबूती के साथ खड़ी थी। राम मंदिर जैसे आंदोलन के समय भी घाटमपुर क्षेत्र में भाजपा का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं था।

आजादी के बाद कांग्रेस और फिर सपा और बसपा के गढ़ रहे घाटमपुर विधानसभा में भाजपा के लिए जमीन तैयार करना बेहद मुश्किल था। वर्ष 2012 में भाजपा ने कमलरानी को  रसूलाबाद विधानसभा सीट से टिकट दिया लेकिन वह जीत नहीं सकीं। वर्ष 2017 के चुनाव में जब भाजपा पूरी मजबूती से आगे बढ़ रही थी तब उन्हें घाटमपुर विधानसभा सीट से टिकट मिला। कमलरानी ने घाटमपुर विधानसभा क्षेत्र में एक बार फिर भाजपा को पहली जीत दिलाई। इसके बाद वह प्रदेश सरकार में प्रावधिक शिक्षा मंत्री बनीं। 

Posted By: Abhishek Agnihotri

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