[अमर शहीद क्रांतिकारी शहीद राजनारायण मिश्र की आत्मकथा से उद्धृत]। आपका समाचार मिला। मेरे घर से पत्र आया था। नियमों (प्रिवी कौंसिल संबंधी) के कागज वहां पहुंच गए, परंतु काफी समय बाद पहुंचे। मेरी अपील का प्रबंध कुंवर खुशबख्त राय कर रहे हैं। पत्र में लिखा है-हमारे ससुर को बुलाया है। अगर पैसे के बारे में तय हो गया तो अपील हो जाएगी। पैसा जमा होने की नौबत नहीं मालूम होती। 400 रुपए मुझसे मांगते हैं, बाकी पैसा अपने पास से लगाने को कहते हैं। हमसे 400 रुपए तो दूर, 100 रुपए का भी प्रबंध नहीं हो सकता है। हम न तो 400 रुपए का प्रबंध कर पाएंगे और न अपील होगी। मेरी स्त्री के भाई मुलाकात करने आए थे। उनका कहना था- कुंवर जो हमसे 400 रुपए मांगते हैं, हमारे पास इतना रुपया कहां से आवे। उन्होंने मेरी स्त्री के जेवर बेचकर 200 रुपए उनके हवाले किए थे। कुंवर जी ने उसी में से 40 रुपए देकर चीफ कोर्ट फैसले की नकल के लिए लखनऊ भेजा था। एक वकील अर्जुन सिंह हैं। उन्हीं के पास जमा कर गए थे। कुंवर जी ने उनके नाम पत्र भी दिया था। न मुलाकात को कोई आया और न रुपया जमा हुआ। अब क्या होगा। 11 अक्टूबर तक मियाद थी। अब केवल एक दिन शेष है।

मेरी समझ में नहीं आता, जबकि लोगों को मेरी दशा मालूम है, किसी से छिपी नहीं, फिर भी हमसे पैसों के लिए कहते हैं। हमने उन्हें साफ लिख दिया है- आप अपील न करें। मुझे इसी में आनंद है। मां हमें बुलाती हैं। शीघ्र जाना है। हमारे साथी मिलने की बाट देख रहे हैं। मां को जब तक मेरी सेवा लेनी थी, ली। अब मुझे अपने पास बुला रही हैं- तो मुझे हंसते-हंसते जाना चाहिए। शीघ्र ही आप लोगों के बीच से जा रहा हूं। मेरे हृदय में किसी प्रकार का दुख नहीं है। आजादी के लिए मरने वाले किसी के प्रति द्वेष-भाव नहीं रखते हैं। हंसते-हंसते बलिवेदी पर चढ़ जाते हैं। किसी के प्रति कोई कटु वाक्य नहीं कहते हैं। जाने वाले का कौन साथ देता है। आप लोग किसी तरह की चिंता न करें। मां ने मुझे हंसने के लिए ही पैदा किया था। अंतिम समय में भी हंसता ही रहूंगा। यदि अगले सप्ताह तक रह गए तो फतेहगढ़ को पत्र लिखूंगा। भाई साहब (राम शिरोमणि) ने सुपरिटेंडेंट से आपसे मिलने के लिए कहा था। किसी से मिलने की आज्ञा नहीं है, अत: उन्होंने आपको भाई कहा था, अपनी बुआ का लड़का। सुपरिटेंडेंट काफी देर तक पूछता रहा। आज्ञा तो दे दी है, किंतु जेलर ने कहा है- यदि राय की मुलाकाता ड्यू होती तो मैं करा दूंगा। अब जेलर के हाथ में है। चाहेगा तो हम लोगों को आपके दर्शन हो जाएंगे।

हम चाहते तो यही हैं कि आप सभी लोगों का दर्शन मुझे एक बार अंतिम समय में हो जाए तो अच्छा था। (पत्र पहले का लिखा था। उसे राम शिरोमणि के जाने के बाद पूरा करके भेजा था।) भाई राम तो इलाहाबाद चले गए। अच्छा है, उनके साथी भी वही हैं। हमें अपनों से बिछुड़ने का दुख भी है, साथ ही खुशी भी है। अपने घर के करीब पहुंच गए। वाह री मानवता! एक साथी दिया था, उसे भी मुझसे अलग कर दिया। साथी जा रहे हैं, जाएं। मैं भी जा रहा हूं। चंद दिनों का ही तो साथ रहता। मुझे अब आशा नहीं है कि आप लोगों के दर्शन भी हो पांएगे। मेरी उत्कट इच्छा थी आपसे मिलने की परंतु निरंकुश शासन जालिम सरकार के कारण आपके दर्शन न हो सकेंगे।

देश आजाद हो, हम भी आनंद से रहें। मैं तो जा ही रहा हूं। मेरा अंतिम संदेश देश के युवकों से यही है कि- चाहे जिस जगह पर वह हों, कांग्रेस में हों या और कहीं और, मर मिटने में कसर न रखें।

भाई साहब, आजकल आपकी ही तरह मैं भी अपने को आप ही के पास पाता हूं। सोता हूं तो यही देखता हूं कि आप सभी साथी प्रेम के फूल चुन-चुनकर मुझे हार पहना रहे हैं। आपने सफेद कपड़े भेंट किए हैं। सभी साथी मुझे हृदय से लगा रहे हैं। मेरे माथे पर रोचना लगा रहे हैं। मुझे बलिवेदी पर चढ़ने को विदा कर रहे हैं। मैं एक बहुत ही शांत पथिक के रूप में नजर आता हूं। सामने एक नदी है और आप सभी मुझे नाव पर चढ़ा देते हैं। देखते ही देखते मैं आपके सामने से ओझल हो गया। मैं एक नवीन स्थान में पहुंच गया हूं। मैं चारों ओर आश्चर्य में देख रहा हूं। यकायक देखता हूं कि हजारों नौजवान साथी हंसते-हंसते चले आ रहे हैं। वे मुझे घेर लेते हैं। उन सभी लोगों ने देश का हाल तथा शहीद वृक्ष के बारे में पूछा। मैंने आप सभी साथियों का संदेशा कहा और कहा कि आप लोगों का लगाया पेड़ बराबर बढ़ रहा है। वीर साथी अपने खून से उसे सींचते जा रहे हैं। आशा है आपके पेड़ में बहुत शीघ्र ही मधुर फल लगेंगे। उनको खाकर देशवासी बहुत आनंद मनाएंगे और आपको आशीर्वाद देंगे।

मैं तो आज-कल यही देखता रहता हूं। जागता हूं तो इसी भावी-आनंद से गुजरता हूं। शहीदों के नारे कानों में गूंजा करते हैं। यहां पर जो साथी (राम शिरोमणि) हैं, उनसे कई बार मैंने अपने स्वप्न की बातें कही हैं। मुझे 18 तारीख के अंदर किसी न किसी दिन फांसी लग जाएगी। हम आपका संदेशा अमर शहीदों के पास लेकर जा रहे हैं। - आपका राजू

Edited By: Shaswat Gupta