बुंदेलखंड में दलहनी फसलों में लगने वाले फंगस से बचाएगा IIPR Kanpur, ढाई करोड़ रुपये से तैयार ट्राइकोडर्मा बचाएगा फसल
बुंदेलखंड में दलहनी फसलों में लगातार फंगस की समस्या को देखते हुए, कानपुर स्थित भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आइआइपीआर) ने ...और पढ़ें

HighLights
अरहर, मूंग, उड़द और चना की फसलों में उकठा व जड़ गलन की समस्या
इन दलहनी फसलों को फंगस से बचाने के लिए आइआइपीआर ने पूरा किया परीक्षण
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत मिले ढाई करोड़ रुपये से ट्राइकोडर्मा का उत्पादन
जागरण संवाददाता, कानपुर। बुंदेलखंड में लगातार दलहनी फसलों की खेती अब मिट्टी की सेहत पर भारी पड़ रही है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी फसलों की लगातार खेती के कारण मिट्टी में एक तरह के रोगकारक फंगस का प्रभाव बढ़ गया है। यही फंगस दलहनी फसलों में उकठा (विल्ट), जड़ गलन समेत फफूंदजनित रोगों का बड़ा कारण बन रहा है। इससे पौधे शुरुआती अवस्था में ही कमजोर होकर सूखने लगते हैं और उत्पादन प्रभावित होता है।
किसानों की इस समस्या को देखते हुए कानपुर स्थित भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (IIPR) ने ट्राइकोडर्मा तैयार किया है। संस्थान में इसका परीक्षण पूरा हो चुका है। अब इसे बुंदेलखंड के किसानों तक पहुंचाकर इसके प्रयोग की तकनीक सिखाई जाएगी।
बुंदेलखंड के बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी और जालौन समेत सात जिलों में दलहनी फसलों का उत्पादन बड़े स्तर पर होता है। इन क्षेत्रों में लगातार दलहनी फसलों की खेती होने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ने के साथ रोगकारक फंगस का प्रभाव भी बढ़ा है। उकठा रोग के कारण हर वर्ष किसानों को फसल नुकसान उठाना पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए आइआइपीआर ने ट्राइकोडर्मा आधारित समाधान तैयार किया है।
आइआइपीआर के निदेशक डा. जीपी दीक्षित ने बताया कि ट्राइकोडर्मा तैयार करने के बाद संस्थान में इसका परीक्षण पूरा किया जा चुका है। इसका प्रयोग फसल की बोवाई से पहले किया जाएगा। इससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी और फसल को उकठा व जड़ गलन जैसे रोगों से बचाया जा सकेगा।
उन्होंने बताया कि इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत आइआइपीआर को ढाई करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है। संस्थान में ट्राइकोडर्मा का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाएगा। इसके बाद बुंदेलखंड के किसानों को इसके इस्तेमाल की जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे।
बीजों के जैविक शोधन की तकनीक भी किसानों को सिखाई जाएगी। ट्राइकोडर्मा के साथ राइजोबियम के प्रयोग की जानकारी भी दी जाएगी, जिससे दलहनी फसलों में रोग नियंत्रण के साथ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिल सके। इस योजना से अगले तीन वर्षों में पूरे बुंदेलखंड में इस फंगस को समाप्त किया जाएगा।
दालों से संबंधित इन आंकड़ों को जानिए:
| वर्ष | दलहन उत्पादन (लाख टन में) |
|---|---|
| 2021-22 | 273.02 |
| 2022-23 | 260.58 |
| 2023-24 | 242.26 |
| 2024-25 | 256.83 |
| 2025-26 | 274.09 |
| स्रोत: भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान | |
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