कानपुर, [शिवा अवस्थी]। वह हिंदी जीते हैं, हिंदी दिखाते हैं और सबको हिंदी से लगाव बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं। इसके लिए उन्होंने जरिया बनाया है हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार, कहानीकार मुंशी प्रेमचंद को। उनके घर से लेकर कारोबार से जुड़े कार्यालय तक प्रेमचंद का ही 'संसार' रचा-बसा है। मुंशी जी की कहानियों पर अब तक आधा दर्जन टेली फिल्में बना चुके हैं। इन्हें स्कूलों-कालेजों में छात्रों को दिखाकर हिंदी के उत्थान का सबक सिखा रहे हैं। अपने पिता की जयंती-पुण्यतिथि भले ही भूल जाएं पर मुंशी से जुड़ी तारीखें बखूबी याद रखते हैं। यह शख्स हैं शहर में जरीब चौकी के पास हीरागंज निवासी 65 वर्षीय फर्नीचर कारोबारी संतोष गुप्ता। 14 सितंबर को हिंदी दिवस पर वह छात्र-छात्राओं को मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की पुस्तकें वितरित करते हैं।

यूट्यूब पर अपलोड कीं टेली फिल्में

मूलरूप से घाटमपुर तहसील के तिवारीपुर निवासी संतोष ने बताया कि उनके पिता हीरागंज में आकर रहने लगे थे। वह यहीं पैदा हुए। हिंदी के प्रति शुरू से ही लगाव था। वर्ष 2005 में बेटों गौरव गुप्ता और प्रभात गुप्ता ने कारोबार में मदद शुरू की तो हिंदी को बढ़ावा देने की सोच और बढ़ी। मुंशी प्रेमचंद की कहानियां पढऩे लगे। धीरे-धीरे उन्हें सब तक पहुंचाया तो सराहना मिली। कहानियों व उपन्यासों की दर्जनों पुस्तकें बांटी। इसी बीच एक दोस्त की बेटी ने टेली फिल्में बनाकर यूट्यूब पर डालने की सीख दी। इस पर मंत्र, कफन, मैकू, नमक का दारोगा समेत आधा दर्जन टेली फिल्में बनाईं और खुद अभिनय भी किया। इन्हें यूट्यूब पर तमाम लोग देख रहे हैं। हरसहाय इंटर कालेज पी रोड, एएनडी डिग्री कालेज, बीएनएसडी इंटर कालेज चुन्नीगंज, ज्वाला देवी महिला डिग्री कालेज में शिविर लगाकर छात्र-छात्राओं को टेली फिल्में दिखा हिंदी के प्रति जागरूक किया। इससे नई पीढ़ी का लगाव इस ओर बढ़ा है।

साहूकारों से मिलने वाले दर्द को उकेरा

हाल ही में संतोष ने मुंशी जी की कहानी सवा सेर गेहूं पर फीचर फिल्म बनाई है। इसमें साहूकार से मिलने वाले दर्द को उकेरा है। बताया कि साहूकारों से तमाम गरीब परेशान हैं। इस फिल्म के माध्यम से शासन-प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंचाने की कोशिश है।

जल्द ही दो और फिल्में, गांव-गांव दिखाएंगे

संतोष ने बताया कि जल्द ही मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर और सुजान भगत पर फिल्में आएंगी। इनकी रूपरेखा बन चुकी है। इसके बाद गबन, गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि आदि उपन्यासों पर भी फिल्में बनाकर हिंदी का प्रचार-प्रसार करेंगे। इन्हें गांव-गांव दिखाएंगे।

Edited By: Abhishek Agnihotri