जागरण संवाददाता, कानपुर : फेफड़े समेत शरीर के दूसरे अंगों की टीबी के बारे सुना होगा, लेकिन आंखों में टीबी होने की बात सुनकर अटपटा लगा होगा। आंखों की टीबी भी गंभीर समस्या है, समय पर इलाज नहीं कराने पर आंखों की रोशनी जा सकती है। इसका खुलासा 25 देशों में चल रहे शोध में हुआ है। टीबी के लिए संवेदनशील कानपुर में अब ऐसे मरीज ढूंढे जा रहे हैं।

मंगलवार को गैंजेज क्लब में हुई प्रेसवार्ता में सिंगापुर से आए रिसर्च साइंटिस्ट एवं एशिया पैसिफिक ऑपथैल्मिक सोसाइटी के सचिव रुपेश अग्रवाल ने बताया कि नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, विराज हेल्थकेयर फाउंडेशन सिंगापुर एवं कानपुर के आरके देवी आई रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर इस पर प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि शरीर में टीबी का प्रभाव आंख पर भी पड़ता है। इसे आंख की गंभीर बीमारी यूवाइटिस कहते हैं। भारत समेत 25 देशों के 100 से अधिक नेत्ररोग विशेषज्ञों का ग्रुप इस पर अध्ययन कर रहा है। अध्ययन में मिले आंकड़ों के मुताबिक हर सौ में दो को आंख की टीबी है। इससे वह अंजान रहते हैं। शुरूआती लक्षण को कंजेक्टिवाइटिस समझ कर इलाज होता है, जबकि इसमें नेत्र दिव्यांगता का खतरा सर्वाधिक है। मोतियाबिंद, ग्लूकोमा के बाद अंधता की प्रमुख वजह यह है। जिन्हें टीबी है, उनकी आंखों में टीबी का खतरा अधिक होता है। कई बार व्यक्ति को टीबी का संक्रमण नहीं होने पर भी आंखों की टीबी होती है।

यहा अधिक केस होने की संभावना

आरके देवी आई रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. अवध दुबे ने बताया कि शहर में चार साल के अध्ययन में 40 फीसद मरीज चिन्हित किए हैं। यहां फेफड़े की टीबी के केस अधिक हैं, इसलिए आंखों की टीबी अधिक होने की संभावना है। इस शोध प्रोजेक्ट में वरिष्ठ चेस्ट फिजीशियन डॉ. एसके कटियार, डॉ. संदीप कटियार, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, आइएमए के साथ मिलकर आंखों की टीबी के मरीजों की पहचान करेंगे।

जांच के लिए रेटिनल कैमरा स्थापित

आइएमए के सचिव डॉ. गौरव दुबे ने बताया कि आरके देवी आई रिसर्च इंस्टीट्यूट में रेटिनल कैमरा लगाया है। इससे आंखों के टीबी के मरीजों की पहचान होगी।

सिंगापुर से छात्रों का दल अध्ययन को आया

सिंगापुर यूनिवर्सिटी के छात्रों का दल आइटू प्रोजेक्ट के लिए यहां आया है। जो जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज एवं छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में जाकर अध्ययन करेगा।

Posted By: Jagran

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