कानपुर पहुंचे RBI के पूर्व निदेशक, कहा- पांच साल में खत्म होगा डॉलर का वर्चस्व, रुपया बनेगा वैश्विक मुद्रा
आरएसएस विचारक और आरबीआई के पूर्व निदेशक एस. गुरुमूर्ति ने कहा कि अगले पांच साल में अमेरिकी डॉलर संकट में ...और पढ़ें

आरबीआइ के पूर्व निदेशक एस गुरुमूर्ति। जागरण
HighLights
अगले पांच साल में अमेरिकी डॉलर की वैल्यू गिरेगी
भारतीय रुपया वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता प्राप्त कर मजबूत होगा
भारत की स्वरोजगार नीति आर्थिक स्थिरता का आधार है
जागरण संवाददाता, कानपुर। आरएसएस विचारक और आरबीआई (RBI) के पूर्व निदेशक एस गुरुमूर्ति का कहना है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ऐसी कोशिशें कर रहे हैं जिन्हें अन्यायपूर्ण माना जा रहा है। इसके बावजूद अमेरिका की अर्थव्यवस्था बचने वाली नहीं है। अगले पांच साल में अमेरिकी डालर (Dollar) की वैल्यू रसातल में चली जाएगी और भारतीय रुपये को पूरी दुनिया में स्वीकार्यता मिलने लगेगी। मौजूदा वैश्विक संकट भी महाशक्तियों के आपसी संघर्ष की देन है।
हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा मेला की तैयारियों संबंधी बैठक में शामिल होने पहुंचे गुरुमूर्ति ने होटल लिटिल शेफ्स में बातचीत के दौरान कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में पिछले तीन दशकों से डालर का वर्चस्व रहा है, लेकिन अब वैश्विक व्यापार में डालर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, भारत ने रूस के साथ ''रुपया-रूबल'' तथा यूएई के साथ स्थानीय मुद्राओं में सीधा व्यापार शुरू किया है। डालर के प्रति घटते विश्वास के कारण आगामी पांच साल में ''डी-डालरलाइजेशन'' की प्रक्रिया और तेज होगी, जिससे भारतीय रुपये को वैश्विक मंच पर नई मजबूती मिलेगी।
एस गुरुमूर्ति ने कहा, वैश्विक स्तर पर टैरिफ में वृद्धि, जहाजों व कंटेनरों की कमी और आपूर्ति शृंखला में आ रही बाधाओं के कारण कई विकसित देश आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इसके विपरीत, भारत अपने मजबूत द्विपक्षीय संबंधों, स्व-रोजगार की संरचना और बढ़ती युवा उद्यमिता के बल पर इस वैश्विक मंदी का सामना करने में सक्षम नजर आ रहा है। विभिन्न देशों के बीच बढ़ते टैरिफ युद्ध और यूरोप में गहराते आर्थिक संकट ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रफ्तार धीमी की है।
देश के भीतर आर्थिक समस्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक स्थिरता का एक बड़ा आधार युवाओं की बदलती व्यावसायिक सोच और स्व-रोजगार माडल है। देश की युवा पीढ़ी जिसे जेन जी कहा जा रहा है। उसका स्व रोजगार शुरू करने का रुझान पिछले दस साल में तीन प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
स्वरोजगार पर कहा, इसी तरह पारंपरिक कृषि मजदूरों का अनुपात 40 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत रह गया है, क्योंकि युवा अब मजदूरी के बजाय कृषि आधारित व्यवसायों को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारत में लगभग 70 प्रतिशत कार्यबल स्व-रोजगार से जुड़ा है, जो देश को किसी भी बड़े सामाजिक या आर्थिक संकट से बचाए रखता है।
उन्होंने कहा कि देश में बेरोजगारी की मुख्य समस्या केवल स्नातकों के स्तर पर देखी जा रही है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक पढ़े लोगों में बेरोजगारी दर नहीं के बराबर (0.5 प्रतिशत से एक प्रतिशत के बीच) है, जबकि स्नातकों में यह दर छह से आठ प्रतिशत के बीच है। इसका मुख्य कारण रोजगारपरक कौशल का अभाव है।
