जागरण संवाददाता, कानपुर : चकेरी वार्ड के गंगा किनारे के गांव की आबोहवा तो पहले से ही जहरीली है, जिसका दंश ग्रामीण झेल रहे। साथ ही खुले में शौच से फैल रही बीमारियों की रोकथाम के लिए भी कुछ नहीं हुआ। वर्षो बाद भाजपा सरकार आने पर गांव-गांव शौचालय बनने शुरू हुए, लेकिन यह गांव बदकिस्मत ही रहे। सामुदायिक शौचालय में कहीं मोटर नहीं है तो कहीं बिजली कनेक्शन नहीं जुड़ा है। ऐसे में ग्रामीण मजबूरी में खेतों में शौच को जाते हैं।

प्योंदी गांव, शेखपुर, किशनपुर, मोती नगर, सुखनीपुर, जाना व अलौलापुर समेत अन्य गांवों में नगर निगम की तरफ से 20 सामुदायिक शौचालय बनवाए गए हैं। शौचालय निर्माण शुरू हुआ तो ग्रामीणों को एक आस बंधी कि अब खुले में शौच से मुक्ति मिलेगी और महिलाएं भी सम्मान महसूस करेंगी। शौचालय तैयार तो हो गए, लेकिन उनके ताले नहीं खुल सके। शौचालय में पानी के लिए मोटर नहीं लगाई गई। जहां मोटर लग गई, वहां बिजली का कनेक्शन नहीं मिला। कहने को गांव में सामुदायिक शौचालय तो बन गए, लेकिन यह उपयोग करने लायक नहीं हैं। लाखों रुपये की कीमत से बने शौचालय जर्जर होकर बिखरते जा रहे हैं। सिर्फ मोटर व बिजली की व्यवस्था करने को नगर निगम व अन्य जिम्मेदार तैयार नहीं हैं। ग्रामीण दो टूक कहते हैं कि शहर पर तो अधिकारियों से लेकर सभी नेताओं की नजर होती है। कानपुर नगर को ओडीएफ घोषित कर भी दिया गया है, लेकिन उनके गांवों में आकर कोई हकीकत देखे कि जमीनी स्तर पर क्या हुआ है। आखिर उन लोगों के साथ ऐसा सौतेलापन क्यों किया जा रहा है, समझ नहीं आता।

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किस-किसने खाया शौचालय का पैसा

स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांव में नगर निगम द्वारा गांवों में शौचालय निर्माण मंजूर किए गए। हर गांव में करीब 50 से 60 तक शौचालय स्वीकृत हुए। निर्माण शुरू हुआ, जो गड्ढा खोदने तक चला। इसके बाद ठेकेदार व मजदूर गायब हो गए। अधिकारी भी झांकने नहीं आए कि आखिर काम पूरा क्यों नहीं हुआ। ग्रामीणों ने अधूरे निर्माण के खिलाफ नगर निगम जोनल कार्यालय से लेकर सड़क तक धरना प्रदर्शन किया। कई बार अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक दी और दुखड़ा रोया। मगर, हुआ कुछ नहीं और गडढे वैसे ही खोदे पड़े हैं। अधिकारियों की उदासीनता देख कई ग्रामीणों ने खुद ही रुपये की व्यवस्था कर शौचालय बनवा लिए, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अब भी अधिकारियों की ओर निहार रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए किसी के भी मन में यह सवाल उठता लाजिमी है कि यहां शौचालय के नाम पर हुआ भ्रष्टाचार सिर्फ ठेकेदार ने तो नहीं किया होगा। जरूर इसमें नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल होंगे। सभी के बीच पैसे का बंदरबांट हुआ होगा।

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अंधेरा व गड्ढा पहुंचा रहा अस्पताल

मार्ग प्रकाश की व्यवस्था न होना और शौचालय के लिए खुदे गड्ढे ग्रामीणों के लिए हादसों का सबब बन रहे हैं। घर के करीब खोदे गड्ढों में गिरकर कई महिलाएं व बच्चे घायल हो चुके हैं। शाम ढलते ही बाहर पर्याप्त रोशनी न होने के कारण लोग संभलकर निकलते हैं कि कहीं गड्ढे में न गिर जाएं। साथ ही बच्चों के खेलते समय परिवार के बड़े बाहर बैठकर निगरानी करते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि वह इन गड्ढों को पाट दें, लेकिन आशा रहती है कि किसी दिन नगर निगम के लोग आएंगे और काम को आगे बढ़ाते हुए शौचालय निर्माण कराएंगे। इस चक्कर में गड्ढे खुले पड़े है और खतरा बन रहे हैं।

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शादी करने से कतराते हैं परिवार

गांव में शौचालय न होने व अन्य समस्याओं से लोग यहां शादी करने से कतराते हैं। जिस घर में रिश्ते की बात चलती है, वहां की जागरूक लड़कियां शौचालय न होने की बात जान पीछे हट जाती हैं। इसके चलते ही कई युवा आज भी कुंवारे हैं। जिनके यहां शौचालय नहीं बने हैं, वहां रिश्तेदार भी आने से कतराते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि रुपया इतना नहीं है कि शौचालय बना सकें, किसी तरह इस नर्क भरी ¨जदगी में खेती-किसानी कर गुजर बसर कर रहे हैं बस। पार्षद अजीत दिवाकर का कहना है कि कई बार अधिकारियों से शिकायत की, पत्राचार किया, लेकिन कोई सुनने को ही तैयार नहीं है।

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हाथ से ठोकर मारी तो झड़ने लगा प्लास्टर

जो शौचालय बनकर तैयार हैं, वह भी भ्रष्टाचार की पोल खोल रहे हैं। त्रिलोकपुर का ही एक उदाहरण बताते हैं। यहां पेड़ के नीचे बैठे ग्रामीणों से पूछा कि शौचालय बन गए या नहीं। तभी लपक कर लगभग 80 वर्षीय प्यारेलाल खड़े होते हैं। कहते हैं कि साथ आइए। वह अपने घर के बाहर शौचालय के सामने ले जाकर खड़ा करते हैं। फिर दिखाते हैं कि कैसे उसका दरवाजा दीवार के सहारे टिका रखा था। फिर कांपते हाथों से एक टक्कर दीवार पर मारते हैं तो प्लास्टर झड़ने लगता है। फिर उसी में से निकली एक ईट उठाकर अपने हाथ तोड़ देते हैं। कहते हैं कि अब आप समझ लें कि यहां शौचालय निर्माण में क्या हुआ है।

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यह है ग्रामीणों का दर्द

सरकार तो कहती है कि खुले में शौच मत करो, लेकिन जब शौचालय ही नहीं बनाकर हम गरीब परिवार के लोगों को देंगे तो ऐसे में कैसे खेतों की ओर न जाएं। सरकार को अपना यह वादा पूरा करना चाहिए।

- अतुल यादव, सुखनीपुर

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सामुदायिक शौचालय तो बनकर तैयार हैं, लेकिन किसी काम का नहीं है। केवल आंखों से देखने के ही काम आ रहा है। नगर निगम अधिकारियों की लापरवाही इतनी है कि मोटर व बिजली कनेक्शन के लिए हम लोग परेशान हो रहे हैं।

- नूर मोहम्मद, सुखनीपुर

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कोई जिम्मेदार हम लोगों के गांव की तरफ रुख करता ही नहीं है, वरना उसे इन शौचालयों की हकीकत से रूबरू कराएं। आधा-अधूरा काम छोड़ ठेकेदार तो भुगतान लेकर भाग खड़ा हुआ। ठगे तो ग्रामीण गए जो कि परेशान हैं।

- नन्हेलाल निषाद, मोतीपुर बहू-बेटियां इज्जत कैसे महसूस करेंगी जब इज्जतघर ही बंद पड़ा है। सरकार ही खूब प्रचार प्रसार कर शौचालय को इज्जतघर बताती है, लेकिन हम लोगों के गांव में हकीकत कुछ और ही है। मगर, कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

- लाखन यादव, मोतीपुर

Posted By: Jagran

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