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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 17, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Book Review : महाभारत के विराट फलक को उद्भासित करता है मृत्युंजय, हिंदी की श्रेष्ठ नाट्य कृति ध्रुवस्वामिनी

By Abhishek AgnihotriEdited By:
Published: Sun, 17 Jul 2022 10:24 AM (IST)

किताबघर में शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युंजय का मराठी से अनुवाद ओम शिवराज ने किया है जिसमें कर्ण के मानवीय ...और पढ़ें

किताबघर और मयूरपंख में मृत्युंजय व ध्रुवस्वामिनी पुस्तक समीक्षा।
किताबघर और मयूरपंख में मृत्युंजय व ध्रुवस्वामिनी पुस्तक समीक्षा।

किताबघर : कर्ण के मानवीय गुणों की विराट संकल्पना

मृत्युंजय

शिवाजी सावंत

उपन्यास

मराठी से अनुवाद: ओम शिवराज

पहला संस्करण, 1974

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2021

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

मूल्य: 620 रुपए

समीक्षा : यतीन्द्र मिश्र

यह देखने वाली बात है कि हिंदी से इतर अन्य भारतीय भाषाओं में आख्यानमूलक जो लेखन संभव हुआ है, उसमें अधिकांश की पृष्ठभूमि समकालीन प्रश्नों से अलग पौराणिक और सांस्कृतिक कथाओं को केंद्र में रखकर होती रही है। मराठी भाषा में भी यह काम असाध्य श्रम और नवोन्मेष के साथ किया गया है। स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर हम जिन प्रादेशिक भाषाओं की कृतियों को रेखांकित करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके मूल में भी यह भावना अंतर्धारा की तरह मौजूद है कि भारत की सामासिक एकता को विभिन्न दृष्टियों के तहत विश्लेषित कर सकें, जिनमें परंपरा और सनातनता का अटूट सामंजस्य विद्यमान हो। ऐसे मूल्यांकन, भारत की सांस्कृतिक चेतना को भी समग्रता से लक्ष्य करते हैं, जिनके कारण एक वृहत्तर कलात्मक परिदृश्य बनता है।

मराठी के चर्चित उपन्यासकार शिवाजी सावंत का उपन्यास ‘मृत्युंजय’ इसी अर्थ में समीचीन है कि वह महाभारत के विराट फलक को उसके एक प्रमुख चरित्र के बहाने उद्भासित करता है। दानवीर कर्ण के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर सावंत इस उपन्यास की आधारपीठिका रचते हैं, जो महाभारत के स्याह-सफेद दोनों ही पक्षों को निमर्मता से आंदोलित करता है। इसी समय यह भी स्मरण करना चाहिए कि कर्ण का चरित्र इतना सार्थक और विश्लेषण के योग्य माना जाता रहा कि उसे ध्यान में रखते हुए साहित्य की अन्य भाषाओं में कुछ बेहतरीन सिरजा जा सका है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का खंडकाव्य ‘रश्मिरथी’ और रणजीत देसाई का ‘राधेय’ कर्ण को ही आदर्श नायक के रूप में स्थापित करते हैं। यह अलग बात है कि मूल महाभारत कर्ण के समस्त मानवीय और दैवीय गुणों के बावजूद उसे एक प्रतिनायक की तरह देखता है, क्योंकि उसने असत्य और अधर्म की राह पर चलने वाले कौरवों का साथ दिया था।

शिवाजी सावंत इस उपन्यास की भूमिका में स्पष्ट करते हैं कि बचपन में स्कूल में खेले गए मराठी नाटिका ‘अंगराज कर्ण’ में कृष्ण का किरदार अदा करने के साथ ही उनमें कर्ण के प्रति कुछ अधिक जानने और समझने की जिज्ञासा हुई। इस जिज्ञासा र्में ंहदी कवि केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ का खंडकाव्य ‘कर्ण’ भी बराबर से शामिल है, जिसे अपने बी.ए. के पाठ्यक्रम में पढ़ते हुए उन्हें ‘मृत्युंजय’ लिखने की आधारभूमि हासिल हुई।

‘मृत्युंजय’ महाकाव्य का फलक लिए हुए ऐसी विराट संकल्पना है, जिसमें कर्ण को तमाम गुणों से संपन्न उस उदात्त नायक के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसकी ओजस्विता, उदारवृत्ति और शौर्य ने उसे एक ऐतिहासिक किरदार में बदल दिया है।

सूक्ष्म और गंभीर चित्रण, व्याख्यात्मक शैली में भावनाओं की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति और मार्मिक रस-निष्पत्ति के साथ दानवीर कर्ण का वह चेहरा हमारे सम्मुख आता है, जिसकी नकारात्मकता को हम थोड़ी देर के लिए मानवीय दुर्बलता के आंगन में रखकर उसके मोहपाश में बंध जाते हैं। शिवाजी सावंत की शैली और उनका प्रस्तुतीकरण इतना बेबाक, विस्तृत और मोहक है कि कर्ण की तुलना में महाभारत के अन्य बड़े चरित्र, विशेषकर भीम और अर्जुन भी कुछ फीके लगने लगते हैं। यह उपन्यासकार की सफलता है कि उसने अपने नायक को प्रामाणिकता और आदर देने के जतन में बाकी चरित्रों पर जो रोशनी डाली है, वह पूरी तरह पवित्र होने के बाद भी कुछ मलिन लगती है। कर्ण यहां एक विचार है, आत्मसंशय से ऊपर उठकर ‘स्व’ को प्रतिष्ठित करने वाला एक दुस्साहसी विवेकी मन, जिसे समाज के सामने यह सिद्ध करना है कि उसका जन्म किसी अपराध की तरह न लिया जाए। उसका होना उतना ही सम्मानीय और महत्वपूर्ण है, जितना कि कुंती के गर्भ से जन्मे धनुर्धर अर्जुन का होना... शायद इसीलिए उपन्यासकार ने कर्ण के पक्ष में तार्किकता गढ़ते हुए जितनी सूक्ष्मता और सुघरता बरती है, वह उसे एक व्यक्ति के धरातल से उठाकर ज्यादा बड़े मानव के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

उपन्यास के कुछ बेहतरीन दृश्यबंध हैं, जिनसे गुजरते हुए एक बड़ी मार्मिक पटकथा के दर्शन होते हैं। इनमें इंद्र का कर्ण से छलपूर्वक उसका कवच-कुंडल मांगना, कुंती से संवाद, द्रौपदी का स्वयंवर और कर्ण की वीरगति का दृश्यांकन। अपनी कथा को स्वगत-संवाद की तरह सुनाने की शैली में रचा गया उपन्यास ढेरों संवादों में चकित करता है। लेखक की यह भी सफलता है कि कर्ण को मिलने वाली ढेरों उपमाएं- दानवीर, अडिग, दिग्विजयी, राधेय, कौंतेय, अशरण और सार्थ जैसे अपने बड़े अभिप्रायों के साथ उपन्यास में खुलकर व्यक्त हुई हैं।

शिवाजी सावंत हर छोड़ी-बड़ी घटना का विवरण समेटते हुए ऐसे खरे विश्लेषण तक पहुंचते हैं, जहां से कर्ण को देखने और उससे व्यवहार का ढंग पाठकों के हृदय में एकबारगी बदल जाता है। असाधारण भाषा में विन्यस्त यह उपन्यास कर्ण के आंतरिक उथल-पुथल का भी ब्यौरा है, जिसे भावुक ढंग से कहते हुए भी वह किसी निर्णय पर नहीं पहुंचते, बल्कि महाभारत के आलोक में ही उसकी नियति को रच डालते हैं। यही पुस्तक की सबसे बड़ी स्थापना है, जो निराश और विफल मन को भी कर्ण के माध्यम से जीने की जिजीविषा प्रदान करती है। ऐसा उपन्यास, जो भाषा की सीमाओं से परे हटकर पढ़ा और सराहा गया।

मयूरपंख : स्त्री की ओजस्विता की नाट्याभिव्यक्ति

ध्रुवस्वामिनी

जयशंकर प्रसाद

नाटक

पहला संस्करण, 1933

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2019र्

हिंद पाकेट बुक्स, पेंगुइन रैंडम हाउस (इंडिया), गुरुग्राम

मूल्य: 99 रुपए

छायावाद के शिखर स्तंभ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘धु्रवस्वामिनी हिंदी की श्रेष्ठ नाट्य कृति है। यह नाटक इतिहास की प्राचीनता को वर्तमान समय की समस्याओं के साथ प्रस्तुत करता है, प्रसाद जी ने इतिहास को अपनी नाट्याभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर न सिर्फ शाश्वत जीवन मूल्यों का स्वरूप दिखाया है, बल्कि युग समस्याओं के हल भी प्रतिपादित किए हैं।

नाटक की कथा गुप्तवंश के शासक रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी पर एकाग्र है, जो स्त्री के आत्मसम्मान तथा शौर्य को ऐतिहासिक संदर्भों में रेखांकित करती है। रामगुप्त की उपेक्षा और संदेह से त्रस्त ध्रुवस्वामिनी सशक्त ढंग से अपने सम्मान की रक्षा तो करती ही है, वह चंद्रगुप्त के साथ मिलकर राज्य के शत्रु शकराज से भी मुक्ति पाती है। एक हद तक यह नाटक राष्ट्रीयता के साथ वैश्विक प्रेम का भी संदेश प्रक्षेपित करता है। इतिहास में कल्पना का संयोजन, भाषा की तत्समता और कई पेंचदार घुमाओं के साथ नाटकीयता का सौंदर्य ‘धु्रवस्वामिनी’ को गहरे अभिप्राय वाली कृति बनाते हैं। रंगमंच की दृष्टि से भी सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रासंगिक नाटक। -(यतीन्द्र मिश्र)

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