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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 05, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

महाराणा : सहस्र वर्षों का संघर्ष- एक पुस्तक जो करती है महान हिंदू योद्धाओं की वीरगाथा का वर्णन

By Abhishek AgnihotriEdited By:
Published: Sun, 05 Jun 2022 03:46 PM (IST)

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में आई पुस्तक वर्षों तक इस्लामी आक्रांताओं से लडऩे और उन्हें पराजित वाले मेवाड़ के ...और पढ़ें

अमित तिवारी की समीक्षा- महाराणा : सहस्र वर्षों का संघर्ष।
अमित तिवारी की समीक्षा- महाराणा : सहस्र वर्षों का संघर्ष।

पुस्तक : महाराणा : सहस्र वर्षों का संघर्ष

लेखक : ओमेंद्र रत्नू

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

मूल्य : 500 रुपये

समीक्षा : अमित तिवारी

देश के महान हिंदू योद्धा महाराणा प्रताप के शौर्य व संघर्ष की गाथा और मेवाड़ के बारे में सबने कुछ न कुछ पढ़ा है, लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि मेवाड़ के महान राजपूतों की कथा को जितने विस्तार से इस देश और समाज को जानने की आवश्यकता है, उसका अवसर कभी आने ही नहीं दिया गया। मेवाड़ की जिस वीरभूमि ने महाराणा प्रताप जैसा रत्न दिया है, उसने बाप्पा रावल, रावल खुमाण, रावल रतन सिंह, महाराणा हम्मीर सिंह, महाराणा कुंभा और महाराणा सांगा जैसे वीरों को भी अपना आंचल दिया है। ओमेंद्र रत्नू की लिखी पुस्तक 'महाराणा : सहस्र वर्षों का धर्मयुद्धÓ दुर्भाग्य की उसी धूल को साफ करते हुए हमारे समक्ष इतिहास का वह सुनहरा पन्ना खोलती है, जिसे पश्चिम व इस्लामी विचारकों तथा उनसे प्रेरित कथित इतिहासकारों ने छिपाकर रखा था। आज जब देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है, ऐसे में महान योद्धाओं के बारे में पढऩा और अपने वास्तविक इतिहास को जानना निसंदेह महत्वपूर्ण है।

पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है कि यह हजार से ज्यादा वर्षों तक लगातार इस्लामी आक्रांताओं से लडऩे और उन्हें बार-बार धूल चटाने वाले मेवाड़ के महाराणाओं की कथा को सामने लाती है। किसी भी समाज में वहां के योद्धाओं की गाथाएं इतिहास का हिस्सा होती हैं। ये कथाएं आने वाली पीढिय़ों को प्रेरित और प्रोत्साहित करती हैं। परंतु हमारे देश में इतिहास ऐसी भूमिका निभाता नहीं दिखता। यहां बाहर से आए आक्रांताओं का इतिहास पढ़ाया और समझाया जाता है। यहां मेवाड़, कलिंग, विजयनगर, असम के अहोम और वीर मराठा के दर्जनों योद्धाओं के शौर्य को कपटपूर्ण तरीके से इतिहास के पन्नों से मिटाकर हिंदू दासता का पाठ पढ़ाया जाता रहा है।

लेखक ने विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों से मेवाड़ के सिसोदिया वंश के राजपूतों की शौर्यगाथा को पुस्तक के रूप में पाठकों के समक्ष रखा है। इसमें प्रमाणों के साथ यह स्थापित किया गया है कि वास्तव में दिल्ली सल्तनत जैसी व्याख्याएं कितनी गलत हैं। हिंदुओं ने उन आक्रांताओं से लगातार युद्ध किया है। कभी भी उनके समक्ष हथियार नहीं डाले। उनकी पाशविक युद्ध पद्धतियों ने कभी-कभी और कुछ जगहों पर हिंदुओं को ठिठकने पर विवश अवश्य किया, लेकिन संघर्ष कभी थमा नहीं। अकेले मेवाड़ का सिसोदिया वंश ही हजार साल से ज्यादा समय तक उन आक्रांताओं को आगे बढऩे से रोकता रहा।

यह पुस्तक तीन खंडों में लिखी गई है। पहले खंड में बाप्पा रावल से महाराणा सांगा तक के इतिहास को सामने रखा गया है। इसके बाद महाराणा प्रताप, महाराणा अमर सिंह और महाराणा राज सिंह के महान इतिहास को कलमबद्ध किया गया है। तीसरा खंड इतिहास के नाम पर हिंदू समाज के साथ किए गए खिलवाड़ को उजागर करता है। पुस्तक प्रमाणित करती है कि किस तरह से हिंदुओं की दासता का झूठ गढ़ा गया और विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन किया गया। इसमें विषयवार तरीके से इस्लामी शासन के कालखंड और अवधि को रेखांकित किया गया है। यह सिद्ध किया गया है कि कैसे देश में हजार साल से भी ज्यादा के इस्लामी शासन का झूठ फैलाया गया, जबकि 1192 में मुहम्मद गोरी के हाथों सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय से पहले तक कोई मुस्लिम आक्रांता यहां नहीं रुक पाया था। इसके बाद भी उन्हें लगातार विरोध और संघर्ष का सामना करना पड़ा। उनका शासन हमेशा सीमित रहा। पूरी दुनिया ऐसे प्रमाणों से भरी है कि इस्लामी आक्रांताओं ने जहां भी हमला किया, कुछ समय में उसे इस्लामी राष्ट्र बना दिया। भारत में हजार वर्ष से ज्यादा के संघर्ष के बाद भी उनके लिए यह संभव नहीं हो पाया। यह तथ्य अपने आप में हिंदुओं के संघर्ष को दिखाता है।

यह पठनीय और विचारणीय पुस्तक है। यह पुस्तक भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता को भी दर्शाती है।

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