किताबघर : हिंदू जीवन के नवजागरण का स्वप्न

हिंदू पदपादशाही

विनायक दामोदर सावरकर

धर्म/इतिहास

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2020

प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य: 400 रुपए

समीक्षा : यतीन्द्र मिश्र

छत्रपति शिवाजी के शौर्य, कीर्ति और असाधारण व्यक्तित्व पर भारतीय साहित्य में समय-समय पर विपुल लेखन हुआ है। एक महानायक के रूप में उनकी ऐसी शीर्षस्थ मान्यता है, जब उन्होंने भारत को हिंदवी स्वराज्य दिलाने के लिए अपने पराक्रम से मराठों के इतिहास को भी अमर बनाया है। प्रसिद्ध विचारक विनायक दामोदर सावरकर की हिंदू पदपादशाही’ ऐसी ही कृति है, जो शिवाजी महाराज के बहाने भारत में मुस्लिम आक्रांताओं से उनके युद्ध और भारतीय अस्मिता के प्रश्नों से इतिहास सम्मत ढंग से जूझती है। सावरकर के जीवन में जिन आदर्श नायकों की बड़ी छवि शामिल रही है, उनमें छत्रपति शिवाजी का नाम प्रमुख है। उन्होंने उनकी वीरता के आख्यान को भी कई बार अपने गीतों और कविताओं के द्वारा व्यक्त किया है। छत्रपति शिवाजी पर लिखी उनकी प्रसिद्ध कविता ‘हे हिंदू नृसिंहा’ तो एक दौर में मराठी रंगमंच पर ओज के साथ गाई जाती रही है। यह किताब सावरकर की सनातनी दृष्टि से भारत में शिवाजी महाराज के द्वार्रा हिंदू पदपादशाही की स्थापना की शपथ को मूर्त करने के स्वप्न के तौर पर देखती है। 27 छोटे-बड़े अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक इस अर्थ में पठनीय है कि जब हम भारत की बहुलतावादी संस्कृति के इतिहास का मर्म अक्सर प्रगतिशील इतिहासकारों की पुस्तकों से देखकर समझते हैं तो ऐसे में एक पक्ष वह भी अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए, जो इस विचारधारा से इतर सनातनी मूल्यों के साथ लिखा गया है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति को पढ़ने-समझने के मामले में हर दृष्टि का स्वागत होना चाहिए, जो अपने अनूठे ढंग से इतिहास के उन अध्यायों पर रोशनी डालती है, जिनके कई संकरे रास्तों पर बरसों तक अंधेरा छाया रहता है। इस अर्थ में छत्रपति शिवाजी की शौर्यगाथा, उनके हिंदूवादी दृष्टिकोण, शासन, कार्यप्रणाली व युद्धनीति का कौशल सावरकर की लेखनी से पढ़े जाने योग्य है। इसी समय यह भी देखना चाहिए कि अन्य भाषाओं में इस महान मराठा सम्राट की कथा का विवेचन कितनी विविधता से अंकित हुआ है। मराठी में बाबासाहब पुरंदरे का ‘राजा शिवछत्रपति’, शिवाजी सावंत का उपन्यास ‘छावा’, विश्वास पाटिल का ‘पानीपत’, डा. हेमंतराजे गायकवाड़ का ‘शिवाजी महाराज: द गे्रटेस्ट’ तथा रणजीत देसाई का ‘शिवाजी: द ग्रेट मराठा’ सहज ही याद आते हैं।

अन्य विद्वानों की तरह ही सावरकर ने भी छत्रपति शिवाजी को एक ऐसे अप्रतिम शासक के रूप में देखा है, जिनका पराक्रम, कूटनीति, दूरदृष्टि तथा साहस अद्वितीय रहा है। वे उन्हें ऐसे आदर्श चरित्र के रूप में उकेरते हैं, जिनका जीवन राष्ट्रप्रेम से अनुप्राणित रहा और इसी कारण वे अपने पराक्रम व लोकोपयोगी नीतियों के चलते अपने समय में भारत में सार्थक जनकल्याण का कार्य कर सके। एक नीति निर्धारक के तौर पर लेखक ने शिवाजी को देखने का जतन किया है, जिसका सारा झुकाव भारत को एक ऐसे अखंड और स्वाभिमार्नी ंहदू राष्ट्र के रूप में देखने से था, जो मुस्लिम आक्रांताओं के भय से दूर हो। पुस्तक के अध्याय ‘समग्र राष्ट्र ने शिवाजी महाराज का उत्तरदायित्व निभाया’ में सावरकार लिखते हैं- ‘शिवाजी महाराज का देहांत मराठी इतिहास का आरंभ है। उन्होंने हिंदू प्रतिष्ठान की नींव डाली। उसर्का ंहदू साम्राज्य में परिवर्तन होना अभी शेष था। वह परिवर्तन उनके देहांत के उपरांत हुआ। जिस प्रकार नाटक का सूत्रधार सभी कलाकारों तथा उनके कार्य के बारे में सूचना देकर खुद परदे के पीछे चला जाता है और उसके बाद नाटक या महाकाव्य शुरू होता है, उसी प्रकार जिन व्यक्तियों के माध्यम से यह महान कार्य संपन्न होना था, उनका मार्गदर्शन कर शिवाजी महाराज स्वयं तिरोधान हो गए।’ ऐसी ढेरों स्थापनाओं के साथ वे मराठों के इतिहास पर भी दृष्टि डालते हैं, जो सिर्फ शिवाजी या उनके गुरु रामदास जी पर ही एकाग्र न होकर मल्हारराव, परशराम पंत, बाजीराव, तानाजी आदि के योगदान की भी चर्चा विस्तार से करती है।

पेशवाई के इतिहास को उस कालखंड में राजनीतिक, सामाजिक विरोधाभासों और विदेशी आक्रांताओं की घुसपैठ, आंतरिक कलह, आपसी साझेदारी में फूट तथा क्षत विक्षत हो रही भारतीय संस्कृति की मूलभूत चिंताओं को केंद्र में रखकर लिखी गई इस किताब में लेखक ने कई ऐसे ऐतिहासिक ब्यौरे भी साक्ष्य के तौर पर रखे हैं, जो उस समय का परिदृश्य समझने के लिए जरूरी तौर पर उभरकर सामने आते हैं। एक अध्याय में सावरकर लिखते हैं- ‘नादिर शाह तथा अब्दाली के साथ बने उनके विशाल संगठन की अनवरत कोशिशों पर जब मराठे एकजुटता से पानी फेर रहे थे, तब सिखों को अपने लोगों का एक संगठित और शक्तिशाली राष्ट्र खड़ा करने का अवसर मिला। पानीपत के संग्राम में हुई भयंकर क्षति को सहते हुए सिर्फ पंजाब प्रांत को अपने साम्राज्य से फिर जोड़ने का जो अल्प संतोष अब्दाली को मिलने वाला था, उसे इस नवोदित सिख सत्ता ने उससे छीन लिया।’ ऐसी अनगिनत स्थापनाओं के साथ छत्रपति शिवाजी का औदात्य रचने में सावरकर दृष्टि ने भारतीयता का जो सनातनी स्वप्न देखा है, उसमें इस मराठा शासक र्की ंहदवी स्वराज की परिकल्पना एक बड़े रूपक की तरह इस किताब र्में ंहदू जीवन के सर्वांगीण नवजागरण का स्वप्न देखती है।

मयूरपंख : जीवन सत्य के अनुसंधान का असाधारण चित्रण

गणदेवता

ताराशंकर बंद्योपाध्याय

अनुवाद: हंसकुमार तिवारी

उपन्यास

पहला संस्करण, 1942

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2019

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

मूल्य: 400 रुपए

कानपुर, यतीन्द्र मिश्र। बांग्ला के कालजयी कथाकार ताराशंकर बंद्योपाध्याय की अमर कृति ‘गणदेवता’ भारतीय जीवन को समझने की दुर्लभ कृति है। ‘गणदेवता’ भारतीय नवजागरण काल का महाकाव्य मानी जाती है, जिसमें जीवन के सांस्कृतिक पक्ष की परंपरा और नए प्रभावों को केंद्र में रखकर जीवन के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन को टटोला गया है। इसके कथानक में विघटन और पुनर्गठन का ऐसा जटिल तनाव रचा गया है, जिससे उपन्यास को विस्तार मिलता है।

पुरानी सामाजिक अर्थव्यवस्था का विघटन, नई उद्योग व्यवस्था की स्थापना और इस उलटफेर में जीवन की नई कसौटी पर असाधारण व्यक्तियों का साधारणीकरण आख्यान को प्रामाणिकता देते हैं। इसकी पृष्ठभूमि में अंतर्कथा की तरह देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और बलिदान की कथा, अत्याचार से होड़ लेने का साहस और नैतिकता की स्थापना का विलक्षण स्वप्न इस उपन्यास को बड़ा फलक प्रदान करते हैं। मनुष्य के उदात्त और अनुदात्त पक्षों का एक साथ व्यावहारिक चित्रण इसे ऐसे पाठनीय गद्य में बदलते हैं, जिसका आशय जीवन सत्य की दिशा में खुलता है। असाधारण कृति!

Edited By: Abhishek Agnihotri