कानपुर, जेएनएन। लखनऊ से कानपुर आनेे के लिए जाजमऊ स्थित गंगा का पुराना पुल जर्जर होने से खतरनाक हो गया है। यह पुल कभी भी ढह सकता है। इसका अंदेशा तो पहले से जताया जा रहा था लेकिन सोमवार को पुल की जांच करने आए एनएचएआइ के अधिकारियों के साथ सर्वेयर कंपनी एसएच इंफ्राटेक के प्रतिनिधियों ने जब निरीक्षण किया तो दंग रह गए। पुल के हर पिलर में उन्हें बेयङ्क्षरग टूटे और ज्वाइंट क्षतिग्रस्त मिले। अफसरों ने माना कि पुल अब आवागमन के लायक नहीं है। फिर भी जरूरत हो तो कम भार वाले वाहनों को बेहद धीमी गति से गुजारा जाए। साथ ही इसकी मरम्मत का तत्काल इंतजाम शुरू कर देना चाहिए, नहीं तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

यह पुल हमीरपुर, महोबा, झांसी, जालौन, कानपुर देहात, चित्रकूट समेत दो दर्जन जिलों के लोगों को लखनऊ से जोड़ता है। 1975 में बनाया गया पुल लंबे समय से जर्जर है। पिछले साल थोड़ी बहुत मरम्मत का कार्य एनएचआइ ने किया था। कुछ ही दिनों में पुल की हालत फिर पुरानी जैसी हो गई। सोमवार को एनएचएआइ के अधिकारियों के साथ सर्वेयर कंपनी एसएच इंफ्राटेक के प्रतिनिधियों ने पुराना जाजमऊ पुल का निरीक्षण किया और माना कि अब यह पुल चलने योग्य नहीं है। टीम लीडर देवाशीष वर्मा ने बताया कि पुल जर्जर हो गया है। इस पर आवागमन खतरे से खाली नहीं है। अगर इसकी जल्द मरम्मत न हुई तो कभी भी हादसा हो सकता है। वह प्रशासन को सुझाव देंगे की पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही को तत्काल रोक दें। पुल पर वाहनों की गति 20 से 30 किमी प्रतिघंटा रखें। यही नहीं, वाहनों के बीच 20 से 25 मीटर की दूरी बनी रहे। सदस्यों ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) को निरीक्षण रिपोर्ट देने के लिए कहा है।

44 साल में ही हो गया बूढ़ा

एनएचएआइ के अधिकारियों के मुताबिक सीमेंटेड ढांचे का पुल लगभग 100 वर्ष चलता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पुल का मेंटीनेंस समय-समय पर हो। जानकारों की मानें तो 44 साल की उम्र के इस पुल की केवल वर्ष 2009 में मरम्मत हुई थी। 2018 में केवल काम चलाऊ मेंटीनेंस किया गया, जबकि नियमों के मुताबिक पुल का मेंटीनेंस हर साल होना चाहिए। इसके अलावा सड़क की मरम्मत चार साल में, बिटुमिन मास्टिक (कंकरीट) की मरम्मत दस साल में होनी चाहिए।

जल्द होगी मरम्मत

एनएचएआइ के परियोजना निदेशक पुरुषोत्तम लाल चौधरी ने बताया कि एसएच इंफ्राटेक के प्रतिनिधियों से रिपोर्ट लेंगे और जरूरी कदम उठाएंगे। मंत्रालय को जानकारी देने के बाद पुल की मरम्मत का काम शुरू होगा।

इसलिए बजी खतरे की घंटी

पुल का निर्माण कई भागों में अलग-अलग किया जाता है। दो स्लैब के बीच कुछ स्थान दिया जाता है। यह स्थान इसलिए छोड़ा जाता है ताकि वाहन गुजरते समय जो विचलन हो उसे बेयङ्क्षरग के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके। इस स्थान को भरने में रबर का प्रयोग किया जाता है, जिसमें अब या तो बड़ा गैप हो गया है या कहीं-कहीं पर यह गैप समाप्त हो चुका है और बीच में कंकड़-पत्थर भर गए हैं। इन हालात में वाहनों का भार सीधे पिलर पर पड़ता है, जिसकी वजह से पूरा स्ट्रक्चर प्रभावित होता है। इसी वजह से भारी वाहन गुजरने पर पुल का पूरा ढांचा हिलने लगता है। लगभग हर पिलर की बेयङ्क्षरग खराब हैं। पुल में दो जगहों पर सीमेंटेड स्ट्रक्चर में ऊपर से दरारें पड़ गई हैं।

यह भी कारण

पुल में डामर और बिटुमिन मास्टिक (कंकरीट) लेयर 50 फीसद से अधिक तक गायब हो चुकी है। इसकी वजह से कंकरीट स्ट्रक्चर पर वाहनों का सीधा भार पड़ रहा है। कई स्थानों पर कंकरीट स्ट्रक्चर टूट गया है और उसमें से लोहे की सरिया दिखाई देने लगी हैं।

एक नजर में पुल की कहानी

-1975 में शुरू हुआ था आवागमन।

-2009 में केवल एक बार हुई मरम्मत।

-लगभग 800 मीटर है पुल की लंबाई।

-2.44 लाख वाहन रोजाना गुजरते हैं।

इनका ये है कहना

एनएचएआइ से रिपोर्ट लेंगे। यदि पुल मरम्मत के योग्य है तो उसकी मरम्मत कराई जाएगी।

-विजय विश्वास पंत, डीएम  

Posted By: Abhishek

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