यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 10, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
एक तरह से इतिहास को कलमबद्ध करने जैसा है ‘पिंजर’, अनूठेपन से आज भी चर्चित है सूरज का सातवां घोड़ा
स्वतंत्रता प्राप्ति के हीरक जयंती वर्ष में अमृता प्रीतम का उपन्यास ‘पिंजर’ स्मरण करने योग्य है जिसने अपने समय में ...और पढ़ें

किताबघर : त्रासदी की जमीन से झांकते मानवीय झरोखे
पिंजर
अमृता प्रीतम
उपन्यास
पहला संस्करण, 1950
पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2021र्
हिंद पाकेट बुक्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, इंडिया
मूल्य: 175 रुपए
समीक्षा : यतीन्द्र मिश्र
भारतीय भाषाओं के साहित्य संसार में पंजाबी भाषा में कुछ ऐसी दस्तावेजी कृतियां लिखी गईं, जिनका समयातीत महत्व है। अमृता प्रीतम ऐसी ही शीर्षस्थ लेखिका हैं, जिनकी कविताएं, संस्मरण, कहानियां और उपन्यास बहुतेरे सामाजिक, राजनीतिक प्रश्नों को इंगित करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के हीरक जयंती वर्ष में उनका उपन्यास ‘पिंजर’ आधिकारिक तौर पर स्मरण किए जाने योग्य है, जिसने अपने समय में एक बड़ी हलचल पैदा की थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन के कुछ पहले के दौर में विन्यस्त ‘पिंजर’ में अमृता प्रीतम जैसे उस काल के उन दारुण प्रसंगों का परिदृश्य रचती हैं, जिनसे गुजरते हुए आज भी सिहरन पैदा होती है। एक बड़े फलक वाले कथानक को, जो अधिकांश लोगों की जिंदगी का दर्द भी बयां करता है, गल्प की शक्ल में लिखा जाना मानीखेज है।
अमृता प्रीतम के इस उपन्यास के साथ भारत-पाक विभाजन पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण कृतियां भी उभरती हैं, जिनका अपने-अपने दौर में लिखा जाना एक तरह से इतिहास को कलमबद्ध करने जैसा है।
इन औपन्यासिक कृतियों और कहानियों को पढ़ते हुए हम स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत समाज के हाल को साहित्यिक अर्थों में समाचार या रिपोर्ट की तरह भी पढ़ सकते हैं। इनमें राजेंद्र सिंह बेदी का ‘लाजवंती’, खुशवंत सिंह का ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, भीष्म साहनी का ‘तमस’ और गुलजार की कहानियां ‘एल.ओ.सी’, ‘रावी पार’ और ‘बंटवारा’ शामिल की जा सकती हैं। इनके अलावा ढेरों वरिष्ठ रचनाकारों के संस्मरणों और आत्मकथाओं में विभाजन की विभीषिका उनके अनुभवों के आधार पर दर्ज हुई, जो उस समय का सजीव चित्रण पेश करती है।
‘पिंजर’ इन्हीं अर्थों में उपन्यास का ओहदा रखते हुए भी एक रचनाकार के सरोकारों का वह आईना है, जिससे अमृता प्रीतम जैसी वैचारिक लेखिका ढेरों राजनीतिक, सामाजिक बदलावों के प्रश्न पूछती हैं।
जाहिर है ऐसे लेखन का अपना जोखिम होता है, जो कई मर्तबा रचनाकार को भी एक सीमित कालखंड के परिप्रेक्ष्य में जवाबदेह बनाता है। साथ ही, उनके संशयों, ऊहापोहों और घुटन को एक आवाज या इबारत देते हुए हमेशा के लिए अभिलेखीकरण भी कर डालता है। पंजाबी के अन्य महत्वपूर्ण रचनाकारों- बलवंत गार्गी और गुरुदयाल सिंह के साथ ही अमृता प्रीतम भी अपने तेवर वाले लेखन के कारण जानी जाती हैं।
उपन्यास के दो प्रमुख पात्रों- पूरो और रशीद के माध्यम से कही गई यह कहानी वैसे तो पारिवारिक दुश्मनी की पृष्ठभूमि में पलती है, मगर उसका कथा विस्तार भारत-पाकिस्तान की सीमाओं को अतिक्रमित करता है। एर्क ंहदू लड़की का अपहरण, परिवार द्वारा बदनामी के भय से त्याग दिए जाने की मार्मिक स्थिति, मुस्लिम लड़के से निकाह और बाद में परिस्थितिजन्य कारणों से उसे अपनाने और जीवन की विसंगतियों को समझने का द्वंद्व उपन्यास में किस्सागोई की तरह आगे बढ़ते हैं।
एकबारगी उपन्यास को पढ़कर लगता है कि हम किसी सिनेमायी अभिव्यक्ति वाली पटकथा से दो-चार हैं, मगर लेखिका ने हर दृश्य को जिस तरह पूरो की वेदना से जोड़कर कहने का ढंग उकेरा है और उसकी जिंदगी के उतार-चढ़ावों को दो सरहदों के आर-पार देखने की तटस्थ कैफियत पाठकों को सौंपी है, उसने ‘पिंजर’ को एक ऐसे गल्प में तब्दील किया है, जिसे पढ़ते हुए पुराने सूखे जख्म से टीस जैसी महसूस होती है।
अमृता प्रीतम अपने पाठकों से उपन्यास की मुख्य स्त्री किरदार के लिए दया या बेचारगी का कोई भाव नहीं चाहतीं। लगता है, जैसे वे किसी दार्शनिक मुद्रा में वह सब बयान दर्ज कर देना चाहती हैं, जो उन्होंने अपने सामने या पड़ोस में हुए किसी हादसे को देखते हुए महसूस किया है। ‘पिंजर’ पूरो से हमीदा बनने की ऐसी त्रासदपूर्ण कहानी भी है, जिसमें निर्लज्ज समाज का दोमुंहापन अंडरटोन में प्रकट होता है।
उपन्यास में ढेरों अन्य नाटकीय तत्व भी हैं, जिसमें पूरो का अपनी भाभी को अपहरण मुक्त कराने का प्रसंग भी शामिल है। 1947 के थोड़ा पहले के दौर में औरतों की स्थिति को रेखांकित करता यह उपन्यास, उस पूरे समय का ऐसा सामाजिक ताना-बाना दिखाता है, जिसके बारे में सोचकर एक नए विमर्श को विस्तार मिलता है कि स्वाधीनता के बाद जो दो मुल्क तकसीम हुए, उनके राजनीतिक आशयों ने सामाजिक विद्रूप का कितना बड़ा सच छुपाया हुआ है।
कथा में सामाजिक रिश्तों के बीच पलने वाले ढेरों मानवीय झरोखे, नैतिकता के तकाजे को बार-बार ढूंढ़ती प्रश्नबेधक निगाहें, परिदृश्य पर हो रहा बदलाव का खौफनाक मंजर और्र ंहदू-मुस्लिम के बीच फैल रहे तनाव को मार्मिक ढंग से निहारता वह समय- उपन्यास के चरित्र को इतिहास की जमीन पर ले जाकर एकबारगी उस यथार्थ के पथरीले रास्ते पर अकेला छोड़ देता है, जहां पूरो और लाजो जैसी न जाने कितनी औरतों के दु:स्वप्न पीढ़ियों तक फैल जाने वाली उदासी ओढ़ लेते हैं। ‘पिंजर’ इस मामले में एक अंधेरी सुरंग से होकर गुजरने का अनुभव भी है, जहां उम्मीद का दामन फिर भी नहीं छूटता। कुछ बचा ले जाने की कैफियत ही उभरती है, जिसे लेखिका, अंत में इस तरह दर्ज करती हैं- ‘चाहे कोई लड़की हिंदू हो या मुसलमान, जो लड़की भी लौटकर अपने ठिकाने पहुंचती है समझो कि उसी के साथ पूरो की आत्मा भी ठिकाने पहुंच गई।’
मयूरपंख : प्रतीकों में ढलते जटिल सामाजिक किरदार
सूरज का सातवां घोड़ा
धर्मवीर भारती
उपन्यास
पहला संस्करण, 1952
पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2015
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
मूल्य: 135 रुपए
निम्न मध्यमवर्ग समाज के वेदना-उल्लास को अपना मानकर उसमें ‘स्व’ का विसर्जन करते हुए धर्मवीर भारती ने प्रयोगधर्मी उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ लिखा, जिसकी कथावस्तु, शिल्प और अनूठेपन के चलते आज भी चर्चा होती है। अज्ञेय ने इसकी भूमिका में संकेत दिया- ‘गंभीरतर तात्पर्यों का साहसपूर्ण और ईमानदार स्वीकार और उस स्वीकृति में न हारकर उठने का निश्चय, उपन्यास को बड़ा बनाते हैं।’ अनेक कहानियों में एक कहानी का सुंदर संयोजन, जिसके केंद्र में माणिक मुल्ला उपस्थित हैं।
जमुना, लिली, सत्ती, तन्ना, रामधन, महेसर जैसे चरित्रों का प्रतीकात्मक गठन इस एक शर्त को कई दृष्टियों से सुलझाने में संलग्न है कि प्रेम में कोई भी निष्कर्ष निकालना या अंतिम सत्य पाने की कोशिश फरेब है। इसी प्रश्न को मानवीय दुर्बलताओं और किरदारों के अंतर्विरोध से पकड़ने की कोशिश में यह उपन्यास शिखर अर्जित करता है। सात दशक से इसकी अबूझ पहेली, संशय के जल में उत्तर पाने की आकांक्षा में डाली गई वंशी की तरह है, जिसमें समाधान की मछली, फंसते-फंसते फिसल ही जाती है। -(यतीन्द्र मिश्र)