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यौन उत्पीड़न मामले में IIT कानपुर के प्रोफेसर को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ा झटका

Published: Wed, 03 Jun 2026 08:47 AM (GMT+05:30)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर आनंद सुब्रमण्यम को बड़ा ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

HighLights

  1. प्रोफेसर आनंद सुब्रमण्यम को हाई कोर्ट से झटका।

  2. बहाली और वेतन का आदेश रद्द किया गया।

  3. दंड पर बोर्ड ऑफ गवर्नर्स करेगा पुनर्विचार।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे आइआइटी कानपुर के प्रोफेसर आनंद सुब्रमण्यम को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने प्रोफेसर को सेवा में बहाल करके वेतन देने के आदेश को रद करते हुए दंड पर बोर्ड आफ गवर्नर्स को नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश संस्थान की अपीलें स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने दिया है। एकलपीठ ने प्रो. सुब्रमण्यम की याचिका स्वीकार कर आइआइटी कानपुर के यौन उत्पीड़न नियम 2021 को रद कर दिया था। साथ ही आंतरिक शिकायत समिति की 30 सितंबर 2022 की रिपोर्ट, बोर्ड आफ गवर्नर्स की 27 अक्टूबर 2022 व 11 जनवरी 2022 की कार्यवाही, निदेशक का एक मार्च 2023 का आदेश और बोर्ड की 22 फरवरी 2023 की बैठक का प्रस्ताव भी रद कर दिया था।

प्रोफेसर को सेवा में बहाल करके वेतन देने का आदेश हुआ था। आइआइटी ने इस फैसले को खंडपीठ में चुनौती दी। आइआइटी कानपुर में पीएचडी छात्रा ने 24 जून 2022 को अपने गाइड प्रो. आनंद पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए आंतरिक शिकायत समिति में शिकायत की थी। समिति ने 30 जून 2022 को प्रोफेसर से 10 कार्यदिवस में जवाब और गवाहों की सूची के साथ पेश होने का नोटिस भेजा।

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उन्होंने जांच प्रक्रिया पर पक्षपात का आरोप लगाया। 27 जुलाई 2022 को छात्रा का बयान हुआ। समिति ने 30 सितंबर को रिपोर्ट दे दी। बोर्ड आफ गवर्नर्स ने 22 फरवरी 2023 को दंड का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद प्रोफेसर ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी।खंडपीठ ने कहा कि आंतरिक शिकायत समिति की जांच प्रक्रिया में कोई गलती नहीं है।

प्रोफेसर को दूसरा कारण बताओ नोटिस मिला और उन्होंने चार से सात जनवरी 2023 तक चार जवाब भी दिए जिन पर बोर्ड ने विचार किया। इसलिए प्रक्रिया पूरी तरह कानून के अनुसार थी। प्रोफेसर पर यह आरोप भी था कि उन्होंने पीएचडी के दौरान छात्रा को कम अंक दिए। इस बिंदु पर अनुशासनिक अधिकारी ने समुचित विचार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि समिति की जांच रिपोर्ट बरकरार रहेगी, लेकिन 22 फरवरी 2023 का दंड आदेश रद किया जाता है। अब बोर्ड नए सिरे से दंड पर फैसला लेगा।