यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 05, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अखिलेश की सक्रियता और शिवपाल का दिमाग, चाचा-भतीजे की जोड़ी ने सपा को दिलाया जबरदस्त कमबैक; गढ़ में फिर वापसी
कन्नौज (Lok Sabha Election Result 2024) से मैदान में उतरकर सपा मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) जो संदेश देना चाहते ...और पढ़ें

राजीव द्विवेदी, कानपुर। कन्नौज (Lok Sabha Election Result 2024) से मैदान में उतरकर सपा मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) जो संदेश देना चाहते थे उसमें वह सफल रहे। 2019 में उनकी पत्नी डिंपल यादव को भाजपा के हाथों हार से जो नुकसान हुआ था, उसकी क्षतिपूर्ति भी हो गई और खुद उनके चुनाव लड़ने से प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं में एक ऊर्जा आ गई।
इटावा और फर्रुखाबाद सीटों पर भी असर पड़ा। इटावा भाजपा से छीन ली, फर्रुखाबाद में भाजपा जीती तो पर मामूली अंतर से। अखिलेश ने खुद 2022 से कन्नौज में सक्रियता बढ़ा दी तो चाचा शिवपाल सिंह यादव ने भी पार्टी में नई ऊर्जा फूंकने में कसर नहीं छोड़ी।
डिंपल यादव ने भी झोंकी ताकत
मैनपुरी में प्रचार खत्म होने के बाद डिंपल यादव और उनकी बेटी अदिति ने भी ताकत झोंकी। कुल मिलाकर अखिलेश ने कुनबा जोड़कर गढ़ सहेज लिया।
मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई थी। तब से ही इटावा और कन्नौज में पार्टी का दबदबा रहा। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कन्नौज, फर्रुखाबाद और इटावा की तकरीबन सभी विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाया था।
प्रदेश में सपा सरकार के दौरान ही पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच अपने मजबूत गढ़ इटावा और फर्रुखाबाद की सीट गंवाकर जैसे तैसे 20 हजार के अंतर से कन्नौज की सीट बचा पाई।
2009 में सपा को करना पड़ा था मुश्किलों का सामना
2009 में लाखों के अंतर से जीतने वाले सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव भाजपा के सुब्रत पाठक को 19,907 मतों से ही पराजित कर पाई थीं। तब डिंपल को 4,89,164 मत हासिल हुए थे। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने कन्नौज की पांचों विधानसभा सीटें गंवा दी थीं।
2019 में डिंपल को 5,50,734 मत जरूर मिले, लेकिन वह भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक से करीब 12 हजार मतों से हार गई थीं। प्रदेश में 2022 के विस चुनाव में जब अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की संभावना थी, तब कन्नौज लोकसभा क्षेत्र की बिधूना सीट पर ही सपा को जीत मिली।
फर्रुखाबाद में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने लोकसभा क्षेत्र की अलीगंज, कायमगंज, अमृतपुर, भोजपुर पर जीत हासिल की थी। फर्रुखाबाद सदर सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़े विजय सिंह भी सपा के ही करीबी थे। तब यह माना जाने लगा था कि फर्रुखाबाद सीट सपा के लिए मजबूत किला बन गई है और 2014 में लोकसभा सीट पर फिर से वापसी करेगी, लेकिन सपा प्रत्याशी रामेश्वर सिंह यादव को हार मिली।
भाजपा के मुकेश राजपूत ने 4,06,195 पाकर 1,50,502 मतों से सपा प्रत्याशी को पराजित किया। 2017 का विधानसभा चुनाव सपा ने कांग्रेस के साथ लड़ा और पांचों सीटें गंवा बैठी। 2019 में मोदी लहर का सामना करने के लिए बसपा के साथ गठबंधन किया। गुटबाजी के कारण सपा ने फर्रुखाबाद लोकसभा सीट को बसपा के कोटे में दे दिया।
गठबंधन के प्रत्याशी मनोज अग्रवाल को 3,48,178 मत मिले। जबकि 2014 में 4,06,195 वोट पाने वाले भाजपा प्रत्याशी मुकेश राजपूत को 5,69,880 मत मिले और उनकी जीत का अंतर 2.21 लाख हो गया।
सपा ने 2022 में छोटे-छोटे दलों से गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ा। फिर भी एक भी विधानसभा सीट उसके हाथ नहीं लगी। इटावा में 2014 की मोदी लहर में बसपा के कैडर के अशोक दोहरे को टिकट देकर भाजपा ने 4,39,646 मत पाए और सपा को उसके गढ़ में तगड़ी शिकस्त दे दी।
2009 में सपा से जीत दर्ज करने वाले प्रेमदास कठेरिया तब 2,66,700 मत ही प्राप्त कर सके थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में सैफई परिवार में बिखराव ने सपा को उसके गढ़ में और कमजोर कर दिया। सपा दो धड़ों में बंट गई और एक धड़ा ‘मुलायम के लोग’ के तौर पर नई पहचान के साथ सक्रिय हुआ।
नतीजतन 2019 में सपा की कमजोरी भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हुई। भाजपा के प्रो. रामशंकर कठेरिया 5,22,119 मतों से जीत गए और इटावा भाजपा का गढ़ बन गया। 2024 में समाजवादी परिवार की एकजुटता और पीडीए फार्मूला सफल रहा। सपा के जितेंद्र दोहरे ने बसपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाकर भाजपा के प्रो. रामशंकर कठेरिया को पराजित किया।
