कानपुर, जेएनएन। आज देश की बेटियां नित नए क्षेत्रों में खुद को साबित कर रही हैं। उनके आत्मविश्वास ने पुरुषों के वर्चस्व और जोखिम वाले क्षेत्रों की प्रचलित मान्यता ध्वस्त कर दी है। हालांकि उनके रास्तों के अवरोध हटाने के लिए अभी भी हमारे समाज को सोच बदलने और कहीं अधिक खुलने की जरूरत है। भारतीय वायुसेना में विंग कमांडर जया तारे बता रही हैं कि किस तरह एक छोटे शहर के मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी पारंपरिक सोच और तमाम मुश्किलों को धता बताते हुए आज आसमान छू रही है...

पुरानी कहावत है कि सिर्फ किसी को देखकर, उसके बारे में एक-दो बातें जानकर धारणा नहीं बनानी चाहिए। चलिए, मैं अपने बारे में तीन बातें बताती हूं। पहली, यह कि मैं एक छोटे शहर कानपुर की रहने वाली हूं, दूसरी यह कि मध्यमवर्गीय परिवार से हूं और तीसरी, जिस स्कूल में मैं पढ़ा करती थी, वह एक सरकारी स्कूल था। इन बातों को पढ़ते हुए आपने मेरे बारे में क्या धारणा बनाई? संभवत: आपने मेरी परवरिश, मेरी सोच, मेरी संस्कृति, भाषा और मेरी जागरूकता के बारे में भी धारणा बना ली होगी, लेकिन मेरी इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। मेरा नाम जया है, लेकिन मेरे नाम के आगे पद लगता है- विंग कमांडर जया। मैं 15 साल से भारतीय वायुसेना में पायलट हूं। अब आप मुझे बताइए, क्या इस नई जानकारी ने आपकी धारणा की दिशा को कुछ बदला कि नहीं? क्या इन दो ध्रुवों ने आपकी धारणा को आकार लेने में खासी दिक्कतें पैदा कर दी हैं? दरअसल, हमारी एक समस्या है कि हम अक्सर बहुत जल्दी किसी के बारे में राय बना लेते हैं।

खुद को साबित करने की जद्दोजहद

मेरा विश्वास है कि यह मायने नहीं रखता है कि आप कहां से और किस माहौल से आते हैं, मायने यह रखता है कि आप कहां पहुंच सकते हैं। अपनी नई भूमिका में डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद आज भी मैं देश की किसी भी लड़की की मनोदशा समझ सकती हूं। कारण, मैं खुद भी इससे गुजरी हूं। मुझे आज भी याद है, कालेज की पढ़ाई के दौरान मुझसे कहा गया था कि हम तुम्हें तीन साल का समय दे रहे हैं या तो तुम खुद को साबित करो या फिर हम तुम्हारी शादी करा देंगे। आज भी ज्यादातर घरों में लड़कियों की नियति यही होती है। मुझे पता था कि घरवालों ने जो भी कहा है वह सामाजिक दबाव का असर है, लेकिन इस फरमान का मुझ पर दोहरा असर हुआ- पहला, मुझे अपने लक्ष्यों के लिए एक समय सीमा का पता चल गया और दूसरा, इस फरमान ने मेरे आत्मसम्मान को झकझोर कर रख दिया। अब मुझे अपने ही घर में अपनी अहमियत साबित करनी थी।

यह वही समय था जब मैंने खुद पर मेहनत करनी शुरू कर दी थी। कालेज के साथ ही मैं एयर एनसीसी कैडेट भी थी। मेरे हर दिन का रूटीन अब खूब सारी पढ़ाई, शारीरिक श्रम, फ्लाइंग और कैंप बन गया था। इसके साथ ही मेरी घर पर भी ट्रेनिंग चल रही थी। मेरे फेल होने की स्थिति में एक अच्छी गृहिणी बनने की ट्रेनिंग। मेरे रिश्तेदारों ने भी शादी के प्रस्ताव लाने में कोई ढिलाई नहीं बरती। शादी के लिए नए-नए प्रस्ताव जारी रहे। दिन तेजी से बीत रहे थे और हर बीतता हुआ दिन मुझ पर शादी का दबाव बढ़ा रहा था।

इस दबाव के बीच, मैं कड़ी मेहनत कर रही थी, क्योंकि मैं अपने सपनों की उड़ान भरना चाहती थी और इसके बाद ही शादी के मंडप पर पहुंचना चाहती थी। आखिरकार मुझे दिए गए तीन साल के आखिरी यानी तीसरे साल मुझे मेरी तपस्या, समर्पण और प्रार्थनाओं का फल मिल ही गया। मुझे भारतीय वायुसेना में चुने जाने का संदेश मिला। यह मेरे जीवन के दूसरे और सबसे खूबसूरत दौर की शुरुआत थी।

जब सपनों को मिले पंख

कड़े प्रशिक्षण के बाद साल 2005 में मैं बतौर पायलट दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित भारतीय वायुसेना में भर्ती हो गई थी। मेरे माता-पिता मेरी ग्रेजुएशन परेड के साक्षी बनने के लिए वहां मौजूद थे। वे सिर्फ अभिभावक ही नहीं, बल्कि मेरे शक्ति स्तंभ भी रहे। हमने सपना देखने से लेकर सपना पूरे होने तक का सफर एक साथ पूरा किया। किसी भी माता-पिता के लिए वह सबसे गर्व का क्षण होता है, जब उनकी बेटी के सपनों को पंख मिल जाएं। उस समय तो पायलट बनने का सपना देखना भी एक सपने जैसा ही हुआ करता था। उस दिन से ज्यादा खुश मैंने उन्हेंं कभी भी नहीं देखा था। मैंने समय मिलते ही उनसे मजाक किया कि क्या अब भी वे चाहते हैं कि मैं अब शादी कर लूं? इस पर मेरे पिता ने कहा कि तुमने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। इसलिए तुम्हें तीन साल का बोनस मिलता है। पापा के इस जवाब ने हम सबको हंसा दिया।

अपनी कमान अपने हाथ

जब आप अपने लक्ष्य को हासिल कर लेते हैं तो आपके आसपास का माहौल भी बदल जाता है और आप अपने जीवन के सफर के यात्री भर नहीं रह जाते हैं, बल्कि आपके जीवन की कमान भी आपके हाथ में आ जाती है। यह बात बिल्कुल सच है कि अगर आप अपनी जिंदगी के फैसले खुद नहीं लेते हैं तो कोई और आपकी जिंदगी के फैसले करेगा। वैसे तो हर व्यक्ति के जीवन में तनाव और संकट आने तय हैं साथ ही बदलाव के हर दौर में तनाव होना ही है। एक परिवार में लड़की तब तक ही बोझ है जब तक वह परिवार की जिम्मेदारी है। जब लड़की अपनी जिम्मेदारी खुद उठा लेती है तो वह समाज के हर बंधन को तोड़ देती है। यह हकीकत है कि शादी और परिवार भी बहुत जरूरी है, पर कुछ भी अपने सपनों से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।

फैसलों पर है नाज

आज जब मैं अतीत में झांककर खुद को कालेज के दौर में देखती हूं तो मुझे खुद पर, अपने सपनों पर और अपने फैसलों पर नाज होता है साथ ही मुझे गर्व होता है कि मैंने अपने लिए जो फैसला किया, उसे सही साबित करने के लिए कड़ी मेहनत की। आज शादी के 10 साल बाद और एक बेटी की मां होने के साथ मुझे गर्व है कि मैं अपने देश की सेवा कर रही हूं और इसके साथ ही अपने परिवार का भी खयाल रख रही हूं। हम अपनी नियति खुद लिखते हैं। हमारी प्राथमिकताएं ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करती हैं। इसलिए वह करें, जो उस समय आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मैं देश की हर लड़की से अनुरोध करती हूं कि वह अपने परिवार को विश्वास में लेकर अपने सपनों तक पहुंचने के लिए जिम्मेदारी ले। इससे पहले कि कोई आपकी जिंदगी के फैसले करे, अपनी जिंदगी का लक्ष्य खुद तय करें, सपने देखें, सपनों को जिएं और उन्हेंं सच करने के लिए जी-जान लगा दें।

Edited By: Manish Pandey