पूर्वांचल विश्वविद्यालय में संविदा शिक्षकों का मानदेय 25 से बढ़ाकर 40 हजार रुपये करने का निर्णय
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय की विद्या परिषद की बैठक में संविदा शिक्षकों का मानदेय 25 हजार से बढ़ाकर 40 ...और पढ़ें

पूर्वांचल विश्वविद्यालय में संविदा शिक्षकों के मानदेय में बड़ी वृद्धि, कई शैक्षणिक मुद्दों पर भी चर्चा।
HighLights
संविदा शिक्षकों का मानदेय 25 से 40 हजार रुपये हुआ।
पीएचडी प्रक्रिया और महाविद्यालयों के हस्तक्षेप पर आपत्ति दर्ज।
स्नातक परीक्षा प्रणाली में वर्णनात्मक परीक्षा का सुझाव दिया गया।
जागरण संवाददाता, मल्हनी (जौनपुर)। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति सभागार में सोमवार की शाम को कुलपति प्रो. राकेश कुमार सिंह की अध्यक्षता में विद्या परिषद की महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक में कई शैक्षणिक मुद्दों पर सदस्यों के बीच गंभीर चर्चा हुई। कुछ विषयों को लेकर माहौल गरम भी रहा।
विशेष रूप से शोध (पीएचडी) की प्रक्रिया और महाविद्यालयों के शैक्षणिक मामलों में विश्वविद्यालय के हस्तक्षेप को लेकर सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के शिक्षकों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। वहीं, विश्वविद्यालय के संविदा शिक्षकों के मानदेय में 15 हजार रुपये की वृद्धि करते हुए इसे 25 हजार से बढ़ाकर 40 हजार रुपये प्रतिमाह करने का निर्णय लिया गया। हालांकि, इस पर विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति को भी ध्यान में रखने की बात कही गई।
बैठक में करीब 70 विषयों की अध्ययन परिषद की संस्तुतियों को मंजूरी दी गई। पीएचडी से जुड़े मामलों की समीक्षा के दौरान शोध प्रक्रिया, महाविद्यालयों की भूमिका और विश्वविद्यालय स्तर पर लिए जा रहे निर्णयों को लेकर सदस्यों ने सवाल उठाए। आरडीसी के तहत प्रस्तुत 70 प्रकरणों में 25 को स्वीकृति, 36 को निरस्त और नौ को विचाराधीन बताया गया।सदस्यों का कहना था कि पीएचडी से संबंधित मामलों का निस्तारण निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
कुलपति अपने स्तर से इन मामलों की समीक्षा कराएं,लेकिन महाविद्यालयों की आंतरिक शैक्षणिक व्यवस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।महाविद्यालयों से सीधे सूचनाएं मांगने और उनके कार्यक्षेत्र में दखल देने की व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई गई।डीआरसी और आरडीसी की भूमिका को लेकर भी चर्चा हुई। सदस्यों ने कहा कि शोध से संबंधित इन समितियों का गठन निर्धारित नियमों के तहत किया गया है।
ऐसे में इनके समानांतर दूसरी समितियां बनाकर निर्णय लेने की व्यवस्था उचित नहीं है। यदि विश्वविद्यालय किसी विशेष विषय पर अतिरिक्त समिति गठित करता है तो उसमें विश्वविद्यालय के शिक्षकों के साथ सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के शिक्षकों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। इससे महाविद्यालयों की वास्तविक परिस्थितियों और उनकी समस्याओं को निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिल सकेगा।स्नातक स्तर की परीक्षा प्रणाली में भी बदलाव का मुद्दा उठा।
सदस्यों ने बहुविकल्पीय प्रश्नों (एमसीक्यू) के स्थान पर वर्णनात्मक यानी लिखित परीक्षा कराने की आवश्यकता बताई। उनका तर्क था कि लिखित परीक्षा से विद्यार्थियों की विषय पर पकड़, समझ और अभिव्यक्ति क्षमता का बेहतर आकलन हो सकेगा।बैठक में संविदा शिक्षकों के मानदेय में वृद्धि को भी महत्वपूर्ण निर्णय माना गया।
इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित प्रस्तावों पर विचार-विमर्श हुआ। बैठक का संचालन कुलसचिव डॉ. विनोद कुमार सिंह ने किया।इस मौके पर प्रो. आरके पांडेय, प्रो. राजेश सिंह, प्रो. नलिन मिश्र, प्रो. मानस पांडेय,प्रो.राजकुमार सोनी,प्रो.गिरधर मिश्र सहित विद्या परिषद के अधिकांश सदस्य उपस्थित रहे।
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