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174 साल पुरानी रामलीला मंचन का इतिहास, कंधों से शुरू हुआ सफर; आज भी रथों पर जीवंत हैं चलायमान पात्र

Published: Thu, 08 Oct 2026 03:35 PM (GMT+05:30)

कोंच की रामलीला का मंचन 1852 में ग्राम पड़री से शुरू हुआ था, जो अब 174 वर्ष पुरानी परंपरा बन ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, जालौन। नगर से तीन किमी दूर ग्राम पड़री में 1852 में लीला मंचन का हुआ था कोंच की गलियों में रची बसी चलायमान रामलीला का ग्राम पड़री में मंचीय लीला के रूप में उद्भव हुआ था।

बाद में दर्शकों और साहित्यकारों की प्रबल इच्छा पर लीला मंचन के कलाकारों को कंधे पर बैठाकर कोंच लाने की उस शर्त ने इस प्राचीन लीला की वह परंपरा आज भी जीवित रखी है।

आज लोगों के कंधों पर मंचन करने वाले कलाकार तो नहीं निकलते लेकिन रथों पर बैठाकर लीला करने का क्रम वैसे ही जारी है। एक गांव में मंच पर होने वाली मनमोहक लीला को देखकर तीन किमी दूर कोंच नगर के साहित्यकार, लीला को चाहने वाले उस लीला को अपने नगर में ले आए।

तभी से समय के झंझावातों को झेलते हुए उस अद्भुत लीला का वही रूप आज भी लोगों को चकित कर रहा है। बदलते समय के साथ कोंच की रामलीला की कई लीलाएं रंगमंच पर होने लगी हैं लेकिन प्रमुख लीलाएं अभी भी चलायमान हैं। जिनमें राम वनगमन (सरयू पार), मारीच वध व जटायु रावण युद्ध व रावण मेघनाद वध शामिल है। रामलीला के दिनों में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न को लोग बगीचों और अपने घरों पर भोजन के लिए आमंत्रित किया करते हैं।

174 वर्ष में प्रवेश कर चुकी है रामलीला

आपसी सौहार्द का प्रतीक रही कोंच की रामलीला जन सहयोग से होती रही और आज भी हो रही है। शुरुआत में जब मंच नहीं था तो रामलीला बाग बगीचों में होती रही। नगर के हर वर्ग के लोग इस लीला में भाग लेते रहे। नगर का हर एक समुदाय का व्यक्ति नगर की इस विरासत को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा रहा है। अब वक्त के साथ बदलाव आया।

रामलीला को संचालित कराने में नगर की धार्मिक संस्था धर्मादा रक्षिणी सभा की मुख्य भूमिका रहा करती है। स्थानीय कलाकार ही रामलीला का मंचन करते हैं। बुजुर्गों द्वारा रामलीला के आयोजन की ऐसी व्यवस्था बनाई है, अनंतकाल तक चलती रहेगी।

रामलीला का अपना मंच होने के बाद भी रामलीला ने अपनी पुरानी परंपरा को नहीं छोड़ा। बाग बगीचों के साथ मैदानी लीला को भी अपनाया हुआ है।मैदानी लीला के लिए स्थान भी तय है सरयू पार लीला सागर तालाब पर तो मारीच वध लीला गढ़ी के पास के मैदान पर रावण, मेघनाद वध लीला दशहरा के रूप में धनुताल के पास के मैदान पर संचालित हो रही है।