हाथरस बूलगढ़ी केस: हाई कोर्ट के फैसले से जगी उम्मीद, नोएडा-गाजियाबाद में घर, सरकारी नौकरी चाहता है परिवार
छह साल से सुरक्षा घेरे में रह रहा परिवार अब सामान्य जीवन और सरकारी नौकरी चाहता है, जिसके लिए सरकार को तीन माह का समय दिया गया है।

बूलगढ़ी प्रकरण।
HighLights
हाई कोर्ट के फैसले से पीड़ित परिवार को संतोष मिला
नोएडा या गाजियाबाद में पुनर्वास की उम्मीद जगी है
परिवार को सरकारी नौकरी और सामान्य जीवन चाहिए
जागरण संवाददाता, हाथरस। बूलगढ़ी कांड के पीड़ित परिवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के फैसले से संतोष मिला है। मृतका के बड़े भाई ने बताया कि वर्षों से हाथरस से बाहर बसाए जाने की मांग कर रहे परिवार के लिए अब नोएडा या गाजियाबाद में नया ठिकाना मिलने की उम्मीद जगी है।
परिवार चाहता है कि उसे ऐसी जगह बसाया जाए, जहां रिश्तेदारों का सहारा हो, बच्चों की पढ़ाई और परिवार के सदस्यों के रोजगार का रास्ता खुले और वे लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा घेरे के बीच रहने के बजाय सामान्य जीवन जी सकें।
हाई कोर्ट के फैसले से संतोष, अब तीन माह में पुनर्वास और रोजगार मिलने की उम्मीद
परिवार की मांग केवल मकान तक सीमित नहीं रही है। घटना के बाद से बूलगढ़ी में उसका घर लगातार सुरक्षा घेरे में रहा। नवंबर 2020 में परिवार की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ की 80 जवानों की एक कंपनी तैनात की गई थी। घर के आसपास मोर्चे बनाए गए थे और आने-जाने वालों की निगरानी की व्यवस्था थी। भाई का कहना है कि हाथरस के आसपास के जिले उसके लिए उपयुक्त नहीं हैं।
कासगंज, एटा और अलीगढ़ का विकल्प पसंद नहीं था
कासगंज, एटा और अलीगढ़ में बसाने का विकल्प इसलिए पसंद नहीं आया, क्योंकि ये हाथरस के अपेक्षाकृत नजदीक हैं। परिवार ने अदालत के समक्ष नोएडा या गाजियाबाद को प्राथमिकता दी थी। इन शहरों में रिश्तेदार होने के कारण परिवार को सामाजिक सहारा मिलने की उम्मीद है। साथ ही रोजगार और बच्चों की पढ़ाई के अवसर भी बेहतर मिल सकते हैं।
अब आदेश के अमल का इंतजार
छह साल से सुरक्षा, पुनर्वास और रोजगार की मांग कर रहे परिवार के लिए अदालत का ताजा आदेश एक नई उम्मीद लेकर आया है। बताया कि अब परिवार चाहता है कि इस बार प्रक्रिया केवल सरकारी कागजों तक सीमित न रहे और उसे वास्तव में नोएडा या गाजियाबाद में बसाया जाए। हाई कोर्ट ने पुनर्वास के बाद परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने का भी निर्देश दिया है।
ऐसे में परिवार की नजर अब सरकार की अगली कार्रवाई पर है। परिवार का कहना है कि सरकार जल्द से जल्द एक सदस्य को सरकारी नौकरी दे। जैसा कि पूर्व में सरकार ने वायदा किया था।
सुरक्षा घेरे में बीते छह साल
- 14 सितंबर 2020 को बूलगढ़ी गांव में 19 वर्षीय युवती के साथ घटना के बाद परिवार की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी
- 29 सितंबर को दिल्ली में उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हुई
- इसके बाद मामला देशभर में चर्चा में आया
- परिवार की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सीआरपीएफ ने भी सुरक्षा संभाली
- परिवार के लिए यही सुरक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे सामान्य जीवन में बड़ी बाधा बनती गई
- रिश्तेदारों से दूरी, आने-जाने पर निगरानी और लगातार सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी के बीच परिवार अब ऐसा जीवन चाहता है जिसमें भय और पहरे के बजाय सामान्य सामाजिक माहौल हो
2020 से चली आ रही मांग
- सितंबर 2020 : घटना के बाद परिवार ने सुरक्षा के साथ हाथरस से बाहर बसाए जाने की मांग उठाई
- 2022 : हाई कोर्ट में परिवार की ओर से नोएडा में रिश्तेदारों के बीच रहने और रोजगार की इच्छा सामने रखी गई
- 2023 : सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी परिवार की पसंद नोएडा, गाजियाबाद या दिल्ली बताई गई
- दिसंबर 2024 : हाई कोर्ट ने सरकार को नोएडा या गाजियाबाद में पुनर्वास के विकल्प पर विचार करने को कहा
- 2025 : सरकार ने कासगंज, एटा या अलीगढ़ में बसाने का विकल्प दिया
- 25 अगस्त 2026 : हाई कोर्ट ने सरकार का निर्णय निरस्त कर तीन माह में परिवार को नोएडा या गाजियाबाद में बसाने का आदेश दिया

राहुल गांधी।
राहुल गांधी भी पहुंचे थे बूलगढ़ी
बूलगढ़ी कांड के बाद गांव राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अक्टूबर 2020 में परिवार से मुलाकात की थी। राहुल गांधी 12 दिसंबर 2024 को भी बूलगढ़ी पहुंचे और पीड़ित परिवार से मिले थे। इसके बाद उनके खिलाफ इसी प्रकरण से जुड़े तीन दोषमुक्त युवकों रामू, रवि और लवकुश ने मानहानि का परिवाद दाखिल किया।
हाथरस की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 13 मई 2026 को राहुल गांधी के खिलाफ दाखिल परिवाद खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ तीनों युवकों ने जिला न्यायालय में रिवीजन दाखिल किया। अपर जिला जज पंचम की अदालत ने राहुल गांधी को नोटिस जारी किया, जिसकी तामील हो चुकी है। अब मामले में 19 सितंबर को सुनवाई होगी।
