हाथरस का दाऊजी मेला: 440 रुपये से एक करोड़ तक का सफर, अंग्रेजों की तोपों से भी सुरक्षित रहा मंदिर
हाथरस का प्रसिद्ध श्री दाऊजी महाराज मेला, जो 1912 में एक तहसीलदार की मन्नत पूरी होने पर 440 रुपये में ...और पढ़ें

श्री दाऊजी मंदिर। जागरण
HighLights
1912 में 440 रुपये से हुई थी दाऊजी मेले की शुरुआत।
तत्कालीन तहसीलदार ने बेटे के स्वस्थ होने पर मांगी थी मन्नत।
1817 में अंग्रेजों के हमले से भी दाऊजी मंदिर रहा सुरक्षित।
योगेश शर्मा, हाथरस। हाथरस के प्रसिद्ध लक्खी मेला श्री दाऊजी महाराज की शुरुआत की कहानी बड़ी रोचक है। वर्ष 1912 में महज 440 रुपये में शुरू हुआ मेला आज एक करोड़ रुपये से ज्यादा में ठेका उठता है। दाऊ बाबा की ऐसी कृपा बरसती है कि जो भी ठेकेदार यहां आया, मालामाल होकर गया।
किले पर हमला
बताया जाता है कि 1817 में हाथरस के राजा दयाराम ने अंग्रेजों से बगावत कर दी थी। तब अंग्रेजों ने दयाराम के किले पर हमला किया था, मगर किले के अंदर स्थित दाऊजी के मंदिर पर आंच तक नहीं आई। अंग्रेजों ने राजा दयाराम के किले पर तोपों से हमला किया था, जिससे किले को भारी नुकसान पहुंचा था।
मेले की शुरुआत
इतिहासकारों के अनुसार हाथरस में एक अंग्रेज अफसर के अधीन मुंशी श्यामलाल तहसीलदार के पद पर तैनात थे। उनके बेटे को ऐसी बीमारी हुई जिसका इलाज कहीं नहीं हो पा रहा था। तब किसी ने उन्हें दाऊ बाबा के दरबार में मन्नत मांगने को कहा। तहसीलदार ने मन्नत मांगी कि यदि उनका बेटा ठीक हो गया तो वे दाऊजी महाराज के मंदिर परिसर में मेला लगवाएंगे।
कुछ ही दिनों में उनका बेटा पूरी तरह स्वस्थ हो गया। मन्नत पूरी होने पर तहसीलदार ने वर्ष 1912 में श्री दाऊजी मेले की नींव डाली। पहले साल मेले का कुल खर्च 440 रुपये आया था, जिसमें मंदिर की सजावट, कुश्ती दंगल और साधु-संतों का भंडारा भी शामिल था।
15 दिन का होता था मेला
दाऊजी मंदिर के पुजारी मधुसूदन चतुर्वेदी बताते हैं कि दाऊजी महाराज श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम हैं। यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मेले के दौरान दूर-दूर से पहलवान कुश्ती लड़ने आते हैं। पहले यह मेला 15 दिन का होता था, अब 20 से 25 दिन तक चलता है।
कुश्ती देखने पेड़ पर चढ़ जाते थे लोग
90 वर्षीय नेतरात बताते हैं कि पहले पहलवानों की कुश्ती देखने के लिए लोग पेड़ों पर चढ़ जाते थे। एक अन्य बुजुर्ग मिथिलेश शर्मा कहती हैं, पहले मेले में मिट्टी के खिलौने और चूल्हे बिकते थे, अब प्लास्टिक का जमाना है।
श्री दाऊजी मेला हाथरस की संस्कृति और आस्था का प्रतीक है। 1912 से लेकर अब तक यह मेला निरंतर लगता आ रहा है, सिर्फ कोरोना काल में दो साल बंद रहा। मेले की जमीन भी अब कम होती जा रही है, मगर ठेके की रकम हर साल बढ़ती जा रही है।
बार- बार बदला निर्णय
इस बार श्री दाऊजी मेला 14 सितंबर से शुरू हो गया, मगर विधिवत उद्घाटन 17 सितंबर को जनप्रतिनिधियों के हाथों कराया गया। प्रशासन ने मेले को 20 दिन कराने के बजाय 15 दिन में खत्म करने का निर्णय लिया था मगर अब संशोधन करते हुए मेला 22 दिन कराने का निर्णय लिया गया है।
मेले की तहबाजारी का ठेका एक करोड़ पांच लाख में उठाया गया। राजकीय मेला होने के कारण शासन से डेढ़ करोड़ रुपये मेले के लिए मांगे गए थे, मगर शासन ने सिर्फ पांच प्रतिशत की वृद्धि करके 60 लाख रुपये का बजट ही मंजूर किया है।
