जागरण संवाददाता, हाथरस : समय बदलने के साथ हमारे जीवन से पूर्वजों की सीख, पुरानी परंपराएं, रीति-रिवाज सब कुछ लुप्त होता जा रहा है। हाईटेक तकनीक इस कदर हावी हो चुकी है कि हम अपनी संस्कृति को भूलकर आधुनिकता की रेस में दौड़ लगा रहे हैं। आने वाली पीढ़ी को भी धर्म-ज्ञान की बातें सिखाने की बजाय अंग्रेजी सभ्यता की चादर उढ़ा रहे हैं। यहां बात हो रही है श्री गणेश चतुर्थी को लेकर करीब तीन दशकों पहले पाठशालाओं में दिखाई देने वाले उत्साह और अद्भुत नजारे की, जहां गणेश चतुर्थी के दिन चंट्टा पूजन का बड़ा महत्व था। पाठशालाओं में सुबह से ही चंट्टे की गूंज सुनाई देने लगती थी। गुरुओं के अंट्टे से ही बच्चे चंट्टा गाते हुए श्री दाऊजी मेले तक पहुंचते थे, पर यह सब अब कॉन्वेंट स्कूलों की भेंट चढ़ गया है। अब न तो पाठशाला बची हैं, और न ही इन रिवाजों को कोई जानता है। हर कोई अपने बच्चे के लिए कॉन्वेंट स्कूल की तलाश में है। अब तो महज औपचारिकता के नाम पर कुछ शिक्षकों व धर्म आचार्यो का सम्मान कर रस्म अदायगी कर दी जाती है।

अतीत की यादें

ब्रज संस्कृति में रचे-बसे हाथरस में एक दौर था जब यहां बच्चों की शुरुआती शिक्षा पाठशालाओं में होती थी। पाठशालाओं का संचालन धर्माचार्य करते थे। इन्हें उन्हीं की पाठशाला या अट्टा के नाम से पुकारा जाता था। इनमें प. खूबीराम खूब, हरिहर गुरु, पड्डा गुरु, नरोत्तम गुरु, भागीरथ गुरु, योगेश गुरु आदि दर्जनों पाठशालाएं शामिल थीं। गणेश चतुर्थी के दिन बच्चों को पाठशाला में प्रवेश दिया जाता था। बच्चे गुरुओं के साथ चट्टों की पूजा करते थे और गुरु उन्हें आशीष देते थे। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान श्री राम भी पाठशाला गए थे।

होती थी तैयारियां

गणेश चतुर्थी से ही यहां ब्रज क्षेत्र के लक्खी मेला श्री दाऊजी महाराज की शुरुआत होती है। इसलिए इसी दिन शहर की सभी पाठशालाओं के बच्चे अलग-अलग टोलियों में चौपाई गाते और चट्टे बजाते हुए अपने-अपने गुरुओं के साथ मेला परिसर में पहुंचते थे। वहां मेला आयोजक गुरुओं का सम्मान करते थे और बच्चों को लड्डू बांटते थे। इसके लिए पाठशालाओं में कई दिन पूर्व से तैयारी होती थीं। गुरु बच्चों को चौपाई कंठस्थ कराते थे।

अब सिर्फ औपचारिकता

मेला में भी स्वरूप बदल गया। जब गुरुओं के साथ बच्चों की टोलियां पहुंचना बंद हो गईं तो आयोजकों ने भी कार्यक्रम का तरीका बदल दिया। अब तो कुछ खास शिक्षकों व धर्माचार्यो को बुलाकर उनका सम्मान कर दिया जाता है। कुछ स्कूलों से बच्चों को बुलाकर लड्डू बांट दिए जाते हैं।

इनका कहना है..

वह जमाना अब नहीं रहा। तब पाठशालाओं के बच्चे गुरुओं के साथ चौपाई गाते हुए मेला में पहुंचते थे। चट्टों का पूजन तो घर-घर होता था। अब तो कुछ ही घर होंगे, जहां बच्चों से चट्टे पुजवाये जाते हों। कॉन्वेंट कल्चर में पुरानी परंपराएं खो गईं।

पं. विजेंद्र शास्त्री, व्याकरण आचार्य

मुझे खूब ध्यान है। गणेश चतुर्थी के दिन जब बच्चे चट्टा लेकर पाठशाला आते थे और यहां से गुरुओं के दाऊजी मेला में पहुंचते थे। बड़ा अद्भुत नजारा होता था। अब तो न गुरु रहे और न ही शिष्य। आधुनिकता की दौड़ में सब गायब हो गया।

गिर्राज किशोर वशिष्ठ, सेवानिवृत्त शिक्षक

Posted By: Jagran