संसू, हाथरस : टोक्यो ओलिपिक-2020 में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हाकी टीम के सहायक कोच रहे पीयूष दुबे सोमवार को जब अपने पैतृक सादाबाद तहसील के गांव रसमई पहुंचे तो लोगों ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया। उन्हें देखकर गांव वालों की आंखों में चमक दिखाई दी। स्वजन से लेकर सभी ग्रामीण खुश नजर आ रहे थे। अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर गांव का नाम रोशन करने वाले दुबे का बैंड बाजे के साथ देशभक्ति गीत, जयकारों की गूंज, ढोल नगाड़े के साथ स्वागत किया गया।

गांव रसमई के बाहर सादाबाद-राया मार्ग पर पीयूष दुबे के इंतजार में जनप्रतिनिधि, स्वजन के साथ परिवारीजन और भारी भीड़ जमा थी। दोपहर को जब गाड़ियों के काफिलों और संगीत की धुनों के बीच पीयूष दुबे गांव पहुंचे तो लोग उनकी एक झलक पाने को लालायित थे। युवा सेल्फी लेने, गांव और परिवार के बुजर्ग गर्व से सीना चौड़ा किए लाल से आंखे मिलाने को भीड़ के बीच जद्दोजहद कर रहे थे। लग्जरी कार के सनरूफ से बाहर निकलकर पीयूष दुबे ने हाथ जोड़कर सबका अभिवादन स्वीकार किया और विजय का चिह्न दिखाकर लोगों को वह खुशी दी, जिसकी क्षेत्र के खेल प्रेमियों को जरूरत थी। भारी भीड़ और शोर शराबे के बीच पीयूष दुबे गांव के बाहर ही कार से उतरकर परिजनों और बुजुर्गों से गले मिले और गांव के बाहर बने पूर्वज, माता-पिता के स्मृति स्थल पर पुष्पांजलि अर्पित की। पीयूष के पिता का मार्च 2008 में तथा माता का जनवरी 2018 में निधन हो गया था। उनके स्मृति स्थल पर खड़े होकर उन्होंने देश और गांव की जय जयकार की। भाई श्रवण दुबे ने अनुज को पगड़ी पहनाकर स्वागत किया। इसके बाद उन्हें रथ में बिठाकर बैंडबाजे, ढोल नगाड़ों के साथ गांव ले जाया गया। गांव में बहन, चाची और परिवार की महिलाओं ने उनका तिलक लगाकर, आरती कर मिठाई खिलाकर स्वागत किया। स्वागत कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ। पीयूष दुबे ने माता-पिता के छविचित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया। इसके बाद ग्रामीण, जन प्रतिनिधि, परिजनों ने उनका फूल मालाओं से जोरदार स्वागत किया।

प्रयागराज से टोक्यो तक का सफर

हाकी टीम के सहायक कोच पीयूष दुबे के पिता गवेंद्र सिंह दुबे भूमि संरक्षण विभाग में अधिकारी थे और माता अध्यापिका थीं। प्रयागराज में तैनाती के दौरान बड़े भाई श्रवण कुमार दुबे की सलाह पर 1994 में पीयूष ने हाकी खेलना शुरू किया था। इस दौरान पीयूष को स्पो‌र्ट्स अथारिटी आफ इंडिया के कोच प्रेमशंकर शुक्ला का भी मार्गदर्शन मिला। कुछ ही दिन में वे टीम के कप्तान बन गए। बाद में वह प्रयागराज विवि और प्रदेश स्तर पर भी खेले। 2003 में पटियाला से कोच की परीक्षा पास करने पर उन्हें पटियाला में नियुक्ति मिली। 2004 में पीयूष दुबे वहां के केंद्रीय विद्यालय की हाकी टीम के कोच बने। 2008 में प्रयागराज विश्वविद्यालय की टीम के कोच के रूप में कार्य किया। यहां से उन्होंने स्पो‌र्ट्स अथारिटी आफ इंडिया के कोच की परीक्षा में टॉप किया और साई की सोनीपत शाखा का उन्हें कोच बनाया गया। यहां से कई खिलाड़ियों को उन्होंने नेशनल, इंटरनेशनल के लिये तैयार किया। उनकी अगुवाई में ही पहली बार साई की टीम ने राष्ट्रीय स्तर पर हाकी में पदक जीता। लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करने और बेहतर प्रशिक्षण के चलते उन्हें हाकी टीम के सहायक कोच के रूप में काम करने का मौका मिला। 2019 से वह लगातार भारतीय हाकी टीम के सहायक कोच हैं। स्वामी विवेकानंद से प्रेरित हैं पीयूष

भारतीय हाकी टीम के कोच पीयूष दुबे स्वामी विवेकानंद से प्रेरित हैं। उनके आदर्शों को जीवन में आत्मसात किया है। कोच के पद पर रहते हुये भी मांसाहार, लहसुन, प्याज से परहेज रखते हैं। तीन साल से ज्यादा समय हो गया, वह पत्नी, बच्चियों से नहीं मिले हैं। उनका परिवार सोनीपत में रहता है। वह लेखनी के धनी होने के साथ-साथ संगीत में भी रुचि रखते हैं। दुबे के खून में है खेल

पीयूष दुबे के दादा खेमकरण सिंह दुबे बेहतरीन रेसलर थे। पिता गवेन्द्र सिंह और श्रवण कुमार दुबे भी रेसलर रहे हैं। चाचा उदयवीर सिंह कुशल तैराक हैं। भाई लखन सिंह दुबे भी खेल से जुड़े हुये हैं। पीयूष ने हाकी को ही भविष्य बना लिया। उनका भतीजा जगत युवराज दुबे मुक्केबाज है। आइएएस बनने का था सपना

गुरुग्राम के मशहूर उद्योगपति भाई श्रवण कुमार दुबे को आदर्श मानने वाले पीयूष दुबे पिता गवेन्द्र सिंह दुबे की प्रेरणा से आइएएस बनकर देश की सेवा करना चाहते थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

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