जागरण संवाददाता, हाथरस : हिंदी की दुर्दशा पर काका हाथरसी की कही गई बातें और लिखी गईं व्यंग्यात्मक कविताएं भला कोई कैसे भूल सकता है, मगर हो यही रहा है। कविताएं तो दूर की बात लोग तो अब काका को ही भूलते जा रहे हैं। हिंदी की दुर्दशा पर काका ने लिखा है :-

बटुक दत्त से कह रहे, लटुक दत्त आचार्य

सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य

है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-

बनने वालों के मुंह पर क्या पड़ा तमाचा

कहं 'काका' जो ऐश कर रहे रजधानी में

नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में?

एक और छंद :-

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस

हिंदी पढ़नी होय तो जाओ बेटे रूस

जाओ बेटे रूस, भली आई आजादी

इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बांदी

कहं 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत

अवसरवादी बनो स्वार्थ की करो वकालत।

हर मौके पर लोगों को हंसने हंसाने का सिद्धांत अपनाने वाले काका हाथरसी ने मरते दम तक लोगों को ठहाके लगवाने के इंतजाम किए। उनकी शवयात्रा ऊंटगाड़ी पर निकली तो श्मशान घाट पर कवि सम्मेलन भी हुआ। संयोग यह भी है जिस दिन उनका जन्म हुआ, उसी दिन उन्होंने दुनिया छोड़ी। ऐसी दुर्लभ तिथि है अठारह सितम्बर। काश! काका श्रद्धांजलि के बहाने ही हम काका की कही बातें याद कर लें।

'काका' नामकरण : 18 सितम्बर 1906 को शिव कुमार गर्ग के यहां इनका जन्म हुआ। बचपन का नाम प्रभूलाल गर्ग था। शुरू से शरारती, कला और कविता में रुचि रखने वाले थे। अग्रवाल सभा द्वारा अग्रवाल धर्मशाला में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। नाटक में उन्होंने 'काका' की भूमिका निभायी, जो सुपरहिट रही। दूसरे दिन जब ये बाजार में गये तो दुकानदारों और राह चलते लोगों ने 'काका' के नाम से उन्हें पुकारना शुरू कर दिया। लिहाजा उनका उपनाम 'काका' ही हो गया। तब किसे पता था कि जिसका नाम मजाक में 'काका' रखा जा रहा है, वह आगे चलकर पूरी दुनिया में हाथरस की पहचान का कारण बनेगा।

कलाकार 'काका' :

बचपन में पिता की मौत ने 'काकाजी' के परिवार को बुरी तरह झकझोर दिया। शुरुआती जीवन नानी के घर इगलास में भी बीता, वहां एक वकील साहब से अंग्रेजी पढ़ी। जिंदगी की पहली कविता उन्हीं वकील साहब पर लिखी। वहां से सोलह साल की उम्र में वापस हाथरस आ गए और एक आढ़त पर काम किया। यहां से छुट्टी मिलते ही शहर के गोखले पुस्तकालय में अध्ययन करते। इसी शौक ने उन्हें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू से जोड़ दिया, जबकि ब्रजभाषा तो विरासत में मिली थी। वे अपने मित्र रंगीलाल मिश्र के सहयोग से चित्रकार हो गए तो फाइन स्टूडियो खोला। शहर के नहर किनारे बांसुरी बजाना शुरू किया तो इस हुनर पर खासी पकड़ हो गयी। तो संगीत की 'हारमोनियम-तबला-बांसुरी मास्टर' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन मथुरा के प्रभूदयाल मीतल के प्रेस से शुरू करायी। पत्रिका चल निकली तो अपना 'संगीत' प्रेस स्थापित कर दिया, जो हाथरस में आज भी है।

'हास्य' की खातिर संघर्ष :

'काकाजी' ने जिस जमाने में हास्य कविताओं की रचना कर कवि सम्मेलन मंचों की ओर रुख किया, तब हास्य कवियों की कतई-कोई खास पहचान नहीं थी, मंचों पर उन्हें 'विदूषक' कहकर उपेक्षित किया जाता था। जलवा गीतकारों का ही था, लेकिन इस मिथक तो तोड़ने की खातिर 'मुम्बई' के एक कवि सम्मेलन में बिन बुलाये गये। उन्होंने मंच पर जो हास्य काव्य पाठ किया, उससे वे न केवल वहां हिट हुए, बल्कि हर तरफ कवि सम्मेलनों में उनकी डिमांड होने लगी, फिर रफ्ता-रफ्ता हास्य कवियों की खेती ऐसी लहलहायी।

विदेश में हिंदी : काका की हास्य काव्य पताका दुनिया भर में फहरी। विदेशी मूल के लोगों ने 'काकाजी' की कविताओं को सुनने और समझने के लिए हिंदी सीखी। उन्हें पद्मश्री की उपाधि समेत अनेक सम्मान मिले। वे रेडियो स्टेशनों और टीवी चैनलों शोभा बने। ब्रजभाषा में फिल्म 'जमुना किनारे' बनायी।

जीवन के मूल मंत्र :

'काकाजी' के जीवन और उनके काव्य सृजन में कई ऐसे गम्भीर मूल-मंत्र अब भी झलकते है, जिनका अक्षरश: पालन किया जाये तो जिंदगी की दुश्वारियां कम जरूर हो सकती हैं।