कार्यालय संवाददाता, हाथरस :

पूरे विश्व में आज मानवाधिकार दिवस मनाया जाएगा। जिले में विभिन्न संस्थाओं द्वारा कार्यक्रमों का आयोजन होगा। भाषणों का लंबा दौर चलेगा। अफसोस, यहां मानवाधिकार का सच बेहद कड़वा है। कानून और नीतियों की आड़ में मानवाधिकारों का हनन और हरण आम है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर, मौलिक व संविधान में मिले अधिकारों पर खूब कुठाराघात होता रहा है। चौकी-थानों में लोग न्याय के लिए भटकते हैं, तो अन्य दफ्तरों में पेंशन और सरकारी बैशाखियों के लिए। यहां से उन्हें दुत्कार और फटकार ही मिलती है। अपने अधिकार के लिए पहले तो लोग एड़ियां रगड़ते हुए दफ्तरों तक पहुंचते हैं। फिर, अफसरों और बाबुओं के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं, गिड़गिड़ाना पड़ता है। न गरीबों को न्याय मिल रहा है और विकलांगों को। हजारों लोग ऐसे हैं जो मानवाधिकार का मतलब तक नहीं समझते। सच तो यह है कि उन्हें जानबूझकर इससे अनभिज्ञ रखा जाता है। कोई गोष्ठी या समारोह आयोजित कर मानवाधिकारों की जानकारी देने की कोई पहल शासन और प्रशासन द्वारा नहीं होती। इससे तो रोटी का अधिकारी मिला है और न पढ़ाई का। महिला सुरक्षा को लेकर कोई सतर्कता नहीं दिखती। जिले में आए दिन छेड़छाड़ की घटनाएं संज्ञान में आती हैं।

मानवाधिकार की उत्पत्ति

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस की शुरूआत की। इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया, लेकिन हमारे देश में मानवाधिकारी कानून को अमल में लाने के लिए काफी लंबा समय लग गया। भारत में 26 सितंबर 1993 से मानवाधिकारी कानून अमल में लाया गया।

न्यायपालिका की भूमिका

आरटीआइ एक्टिविस्ट गौरव अग्रवाल का कहना है कि न्यायपालिका ने सभी लोगों के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशानुसार बंधुआ श्रम का उन्मूलन, रांची, आगरा व ग्वालियर के मानसिक अस्पतालों का कामकाज, शासकीय महिला सुरक्षा गृह आगरा का कारागार, भोजन का अधिकार आदि कार्यक्रमों का क्रियान्वयन किया जा रहे है। सामाजिक कुरीतियों व लोगों को अनेक मानवाधिकार दिलाने में मानवाधिकार आयोग का प्रयास सराहनीय है।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर