15 लाख का पैकेज छोड़ बीमार पिता की सेवा के लिए घर लौटे हरदोई के विवेक, आकाश मिसाइल प्रोजेक्ट में निभाई थी अहम भूमिका
हरदोई के विवेक शर्मा ने आकाश मिसाइल प्रोजेक्ट में सीनियर मैकेनिकल डिजाइन इंजीनियर की 15 लाख की नौकरी छोड़ दी।

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HighLights
विवेक शर्मा ने आकाश मिसाइल प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाई।
पिता की बीमारी के कारण 15 लाख का पैकेज छोड़ा।
अब हरदोई में ऑटोमोटिव उत्पादों का वितरण कर रहे हैं।
जागरण संवाददाता, हरदोई। देश की वायु रक्षा प्रणाली से जुड़े प्रोजेक्ट में अहम तकनीकी जिम्मेदारी निभाने वाले हरदोई के विवेक शर्मा के जीवन में एक समय ऐसा आया, जब उन्हें अपने स्थापित करियर और परिवार की जिम्मेदारी के बीच चुनाव करना पड़ा।
ग्रेटर नोएडा की कंपनी में सीनियर मैकेनिकल डिजाइन इंजीनियर के पद पर कार्यरत विवेक आकाश मिसाइल प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले प्रेशराइज्ड कंटेनर की डिजाइनिंग का नेतृत्व कर रहे थे। लाखों का पैकेज था, लेकिन उससे भी बढ़कर देश की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में योगदान देने का गौरव भी उनके पेशेवर जीवन का अहम हिस्सा था।
लेकिन पिता को ब्रेन हेमरेज होने के बाद परिस्थितियां अचानक बदल गईं। परिवार में इकलौता बेटा होने के कारण पिता की देखभाल की जिम्मेदारी उनके सामने थी। ऐसे में उन्होंने दिसंबर 2019 में नौकरी छोड़ दी और हरदोई लौट आए।
विवेक ने राजकीय पॉलिटेक्निक, गाजियाबाद से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इसके बाद लखनऊ के रामस्वरूप इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई पूरी की। तकनीकी शिक्षा के बाद वह ग्रेटर नोएडा स्थित एक कंपनी से जुड़ गए। यहां सीनियर मैकेनिकल डिजाइन इंजीनियर के रूप में उन्होंने आकाश मिसाइल के सुरक्षित रखरखाव में इस्तेमाल होने वाले स्पेशल प्रेशराइज्ड कंटेनर की डिजाइनिंग का नेतृत्व किया।
विवेक ने बताया कि मिसाइल के रखरखाव के लिए कंटेनर की डिजाइन तैयार करते समय उसकी मजबूती और सुरक्षा से जुड़े कई तकनीकी पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता था। परिवहन के दौरान झटकों और कंपन से कंटेनर के भीतर रखी मिसाइल को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए उसकी संरचना महत्वपूर्ण थी। इसके साथ ही वायुमंडलीय दबाव से जुड़ी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
डिजाइन से उत्पादन तक लगा साढ़े तीन साल का समय
विवेक ने बताया कि बतौर लीड डिजाइनर इस प्रोजेक्ट से जुड़ना उनके लिए गौरव की बात थी। उन्हें गर्व महसूस होता था कि उनके प्रयास देश की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने में योगदान दे रहे हैं। चुनौतीपूर्ण होने के साथ ही यह उनके पेशेवर जीवन का गौरवशाली दौर था।
डिजाइन तैयार होने के बाद उसके आधार पर प्रोटोटाइप बनाया गया। इसके बाद डिजाइन और प्रोटोटाइप को मंजूरी के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पास भेजा गया। विवेक के मुताबिक, डिजाइन तैयार करने से लेकर मंजूरी की प्रक्रिया पूरी होने और उत्पादन शुरू होने तक करीब तीन से साढ़े तीन साल लगे।
इस परियोजना पर काम करने के दौरान कंपनी की ओर से उन्हें सालाना 15 लाख रुपये का पैकेज मिलता था। तकनीकी क्षेत्र में अहम जिम्मेदारी, बेहतर वेतन और देश की सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट में योगदान देने के गौरव के बावजूद पारिवारिक परिस्थितियों ने उनके सामने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी, जिसमें उन्हें अपने स्थापित करियर को छोड़ने का फैसला लेना पड़ा।
पिता की बीमारी ने बदल दी जिंदगी की राहट
विवेक के पिता हरि श्याम शर्मा हरदोई के आईटीआई में शिक्षक थे। पिता को ब्रेन हेमरेज होने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। परिवार में इकलौता बेटा होने के कारण उनकी देखभाल की जिम्मेदारी विवेक पर थी। ऐसे में उन्होंने करियर के बजाय पिता के साथ रहने को प्राथमिकता दी और दिसंबर 2019 में नौकरी छोड़कर हरदोई लौट आए।
वर्ष 2024 में पिता का निधन हो गया। इसके बाद विवेक की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। पारिवारिक परिस्थितियों के चुनौतीपूर्ण दौर के बीच विवेक ने अपना व्यवसाय स्थापित किया। वर्तमान में वह हरदोई जिले में ऑटोमोटिव उत्पादों के वितरण से जुड़ी फर्म का संचालन कर रहे हैं। वह दोपहिया वाहनों के पार्ट्स और लुब्रिकेंट्स के अधिकृत वितरक हैं।
