उत्तर प्रदेश के हरदोई की प्रतिमा ने हौसले से बदली खुद की तकदीर, 366 किसानों की मददगार बनीं
हरदोई की प्रतिमा वर्मा ने सीमित संसाधनों के बावजूद कृषि उद्यमी बनकर अपनी तकदीर बदली।

366 किसानों की मददगार बनीं प्रतिमा।
HighLights
प्रतिमा वर्मा ने कृषि उद्यमी बनकर अपनी तकदीर बदली।
366 किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों की सेवाएं उपलब्ध कराईं।
स्वयं सहायता समूह से जुड़कर बनीं आत्मनिर्भर, दूसरों को प्रेरणा।
जागरण संवाददाता, हरदोई। परिस्थितियां विपरीत थीं। परिवार की आय सीमित थी। खेती-किसानी के भरोसे घर का खर्च चलाना मुश्किल होता था। आर्थिक तंगी थी, लेकिन सपने बड़े थे। कुछ कर गुजरने का जज्बा भी था। अवसर मिला तो मेहनत और हौसले से अपनी तकदीर बदल डाली।
न केवल खुद आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि सैकड़ों किसानों की मुश्किलें भी आसान कर दीं। यह प्रेरक कहानी है सुरसा विकासखंड के चेतापुरवा की प्रतिमा वर्मा की।
कभी सीमित संसाधनों से जूझने वाली प्रतिमा आज कृषि उद्यमी हैं। अपना ट्रैक्टर है। दुग्ध संग्रहण केंद्र भी संचालित कर रही हैं। अब तक 366 किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों की सेवाएं उपलब्ध करा चुकी हैं। उनकी सफलता को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सम्मान दिया है।
सुरसा की ग्राम पंचायत ओदरा पचलाई के मजरा चेतापुरवा निवासी प्रतिमा का परिवार खेती पर निर्भर था। आय के पर्याप्त साधन नहीं थे। दूसरी ओर गांव के छोटे किसानों के सामने महंगे कृषि यंत्र खरीदने की समस्या थी। प्रतिमा ने इसी चुनौती में स्वरोजगार का अवसर तलाशा। 19 अक्टूबर 2022 को गठित जय भोले बाबा आजीविका महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं।
अप्रैल 2023 में एचसीएल फाउंडेशन के सहयोग से कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना हुई। प्रतिमा ने पावर टिलर, रीपर-बाइंडर, ब्रश कटर और बैटरी चालित स्प्रेयर सहित कृषि यंत्रों के संचालन और रखरखाव का प्रशिक्षण लिया। शुरुआत आसान नहीं थी।
सामाजिक रूढ़ियां और पारिवारिक जिम्मेदारियां आड़े आईं, लेकिन कदम पीछे नहीं खींचे। किसानों को किराये पर किफायती दरों में कृषि यंत्र उपलब्ध कराने लगीं।
धीरे-धीरे विश्वास बढ़ा और काम चल निकला। अब तक 366 लघु एवं सीमांत किसानों की 877 कच्चा बीघा भूमि पर कृषि सेवाएं उपलब्ध करा चुकी हैं। इससे करीब 2.60 लाख रुपये की आय अर्जित की। आर्थिक स्थिति सुधरी तो स्वयं का ट्रैक्टर खरीदा। आय बढ़ाने के लिए दुग्ध संग्रहण केंद्र भी शुरू किया।
प्रतिमा कहती हैं कि प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। अब वह चाहती हैं कि गांव की दूसरी महिलाएं भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़ें। हुनर सीखें और स्वरोजगार अपनाकर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करें। उनकी सफलता बताती है कि अवसर और हौसला मिले तो गांव की महिलाएं भी उद्यमिता की नई मिसाल कायम कर सकती हैं।
