हरदोई में दरदोजी कला फिर पकड़ने लगी रफ्तार, मंदी के बाद काम पर लौटे कारीगर
मल्लावां की दरदोजी कढ़ाई मंदी से उबरकर फिर रफ्तार पकड़ रही है, जिससे कारीगर काम पर लौट रहे हैं। हालांकि, ...और पढ़ें
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HighLights
मल्लावां की दरदोजी कढ़ाई मंदी से उबरकर फिर रफ्तार पकड़ रही।
कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और जीएसटी लागत बढ़ा रहे हैं।
कारीगरों ने प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता की सरकार से मांग की।
संवादसूत्र, मल्लावां। मल्लावां क्षेत्र की पहचान रही दरदोजी कढ़ाई अब मंदी के दौर से उबरकर फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इस पारंपरिक कारीगरी से जुड़े कारीगर दोबारा काम की ओर लौट रहे हैं। हालांकि, कच्चे माल की बढ़ती कीमत और जीएसटी के कारण तैयार माल की लागत बढ़ने से कारोबारियों और कारीगरों की मुश्किलें अभी कम नहीं हुई हैं। मांग घटने के कारण कारीगरों को पहले की अपेक्षा अधिक मेहनत में काम करना पड़ रहा है।
मल्लावां क्षेत्र में कभी सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी का प्रमुख साधन रही दरदोजी कढ़ाई के कारोबार पर पिछले कुछ वर्षों में मंदी का असर पड़ा। कच्चे माल के महंगे होने, बाजार में मांग कम होने और जीएसटी लागू होने से तैयार माल की कीमत बढ़ गई। इससे खरीददारों की संख्या घटने लगी और कई कारीगरों ने इस काम से दूरी बना ली। अब बाजार में कुछ सुधार आने के बाद कारीगर फिर से दरदोजी के काम से जुड़ रहे हैं।
वर्तमान में कारीगर करीब 400 से 500 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। मुहल्ला छत्ता टोला निवासी वाहिद शेख बताते हैं कि एक समय उनके यहां करीब 300 परिवारों में दरदोजी के अड्डे चलते थे, जिन पर एक हजार से अधिक कारीगर काम करते थे। मल्लावां के साथ बिलग्राम, हरदोई, बावन, कन्नौज, आसीवन, मियागंज और गौसगंज समेत कई क्षेत्रों में काम कराया जाता था। तैयार माल को लखनऊ, दिल्ली, हैदराबाद और बेंगलुरु तक ले जाकर बेचा जाता था।
कच्चे माल की कीमत बढ़ने से लागत दोगुनी वाहिद शेख बताते हैं कि मंदी के साथ कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और जीएसटी का असर कारोबार पर पड़ा है। पहले जिस लहंगे की कीमत 10 से 12 हजार रुपये के आसपास होती थी, उसकी लागत अब करीब 20 हजार रुपये तक पहुंच रही है। दरदोजी में इस्तेमाल होने वाला जरकन चीन से आता है।
पहले 118 रुपये में मिलने वाला जरकन अब दिल्ली बाजार में करीब 152 रुपये में मिल रहा है। इसी तरह स्टोन जयपुर और कसब सूरत से आता है। दबकन की कीमत भी 1200 रुपये से बढ़कर करीब 2200 रुपये तक पहुंच गई है। इससे करीब 30 हजार रुपये में तैयार होने वाला लहंगा अब 50 हजार रुपये तक तैयार हो रहा है। लागत बढ़ने से बाजार में मांग प्रभावित हुई है और कारीगरों को कम काम मिलने लगा है।
प्रशिक्षण और आर्थिक मदद की मांग
वाहिद शेख का कहना है कि दरदोजी कारीगरों को सरकार की ओर से अपेक्षित सहायता नहीं मिल रही है। कारीगरों को नई तकनीक और आधुनिक डिजाइन का प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता। यदि सरकार कारीगरों और उनके परिवारों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करे तो वे बेहतर डिजाइन और तकनीक के साथ काम कर सकेंगे, जिससे उनकी आमदनी भी बढ़ेगी। कारीगर चांद शेख ने कहा कि सरकार को दरदोजी के पारंपरिक कारोबार को बचाने के लिए विशेष ध्यान देना चाहिए।
बिना सिले कपड़े पर पहले की तरह जीएसटी में राहत दी जाए और कच्चे माल व तैयार कपड़े पर अलग-अलग स्तर पर बार-बार कर का बोझ न पड़े, इसकी व्यवस्था की जाए। उन्होंने कारीगरों को आसान शर्तों पर ऋण और अन्य आर्थिक सहायता देने के साथ आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की मांग की है।
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