झालरों की चकाचौंध में भी थमी नहीं चाक की रफ्तार, हरदोई में कुम्हारों ने संजो रखी है पुश्तैनी कला
हरदोई के मलौथा गांव के कुम्हार आधुनिक झालरों की चकाचौंध के बावजूद दीपावली के लिए मिट्टी के दीये बनाने की ...और पढ़ें
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HighLights
हरदोई के मलौथा गांव के कुम्हारों ने जीवित रखी पुश्तैनी दीया कला।
आधुनिक झालरों की चकाचौंध में भी चाक की रफ्तार जारी।
यह कला परिवारों की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत संजोती है।
जागरण संवाददाता, हरदोई। कभी दीपावली की पहचान रहे मिट्टी के दीयों की चमक आज बाजार में रंग-बिरंगी बिजली की झालरों की चकाचौंध के बीच फीकी पड़ती नजर आ रही है। हालांकि, आधुनिकता के इस दौर में भी हरपालपुर विकास क्षेत्र के मलौथा गांव के कुम्हारों ने अपनी पुश्तैनी कला और उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा है। यहां के कुम्हार परिवारों के घरों में आज भी चाक की गूंज सुनाई देती है, जो यह बयां करती है कि परंपरा को जिंदा रखने की यह जिद आज भी कायम है।
मलौथा गांव के रामसेवक, जो भूमिहीन हैं, पूरी तरह इसी पुश्तैनी काम पर निर्भर हैं। दिन-रात चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये गढ़ने वाले रामसेवक का परिवार इसी से अपनी आजीविका चला रहा है। वहीं, लालाराम का परिवार भी इस कला को संजोए हुए है, जहां परिवार के सभी सदस्य मिलकर मिट्टी तैयार करने से लेकर दीये बनाने में जुटे रहते हैं।
गांव के प्रधान ओमप्रकाश ने बताया कि कुम्हारी कला के संरक्षण के लिए डेढ़ बीघा जमीन आवंटित है, जिससे कुम्हारों को कच्ची मिट्टी मिलती है। सवाल सिर्फ दीयों की बिक्री का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने का है, जिसे ये हुनरमंद आज भी अपने हाथों की थाप से सींच रहे हैं।