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हापुड़ का बर्तन उद्योग कैसे पहुंचा अमेरिका-ब्रिटेन? हजारों परिवारों को मिला रोजगार; तांबे से स्टेनलेस स्टील तक का सफर

Published: Mon, 02 Nov 2026 06:34 PM (IST)

हापुड़ का बर्तन उद्योग 1960 में कसेरठ बाजार से शुरू होकर आज वैश्विक पहचान बन चुका है, जो तांबे से ...और पढ़ें

एक कारखाने की भट्ठी से सात समंदर पार तक पहुंची हापुड़ के बर्तनों की खनक। जागरण

एक कारखाने की भट्ठी से सात समंदर पार तक पहुंची हापुड़ के बर्तनों की खनक। जागरण

HighLights

  1. 1960 में लाला मुसद्दीलाल ने तांबे के बर्तनों से की शुरुआत।

  2. तांबे-पीतल से स्टेनलेस स्टील तक उद्योग का विकास।

  3. आज हापुड़ के बर्तन अमेरिका सहित 7 देशों में निर्यात।

ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। हापुड़ में कसेरठ बाजार की तंग गलियों में वर्ष 1960 में तांबे के बर्तनों की एक छोटी सी निर्माण इकाई लाला मुसद्दीलाल ने आरंभ की थी। उससे शुरू हुआ हापुड़ का औद्योगिक सफर आज सात समंदर पार तक अपनी धमक बना चुका है।

कभी तांबे और पीतल के बर्तनों की खनक से गूंजने वाला यह बाजार आज तांबे व स्टेनलेस स्टील किचनवेयर के वैश्विक कारोबार की पहचान बन चुका है। पुरानी पीढ़ी के हुनर, मेहनत और कारोबारी दूरदर्शिता ने उद्योग की ऐसी नींव रखी, कि कुछ ही दशकों में यहां बर्तन निर्माण से जुड़ी सैकड़ों इकाइयां स्थापित हो गईं। समय के साथ कारोबार ने करवट ली और तांबे-पीतल की जगह स्टेनलेस स्टील के बर्तनों ने बाजार में अपनी मजबूत जगह बना ली।

वर्ष 2000 के आसपास हापुड़ के बर्तनों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दस्तक दी। आज अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और नीदरलैंड जैसे देशों तक यहां निर्मित बर्तनों और किचनवेयर की पहुंच है। यहां पर एल्यूमीनियम व तांबे के बर्तनों घरों में कुटीर उद्योग के रूप में तैयार किए जा रहे हैं।

तांबे के बर्तनों से रखी गई औद्योगिक नींव

यहां के बर्तन उद्योग का इतिहास कसेरठ बाजार से जुड़ा है। वर्ष 1960 में यहां तांबे के बर्तनों का पहला छोटा सा कारखाना लाला मुसद्दीलाल ने स्थापित हुआ था। उस समय सीमित संसाधनों और पारंपरिक तकनीक के सहारे बर्तन का काम शुरू हुआ।

धीरे-धीरे इस कारोबार ने आसपास के कारीगरों और व्यापारियों को आकर्षित किया। वर्ष 1970 तक शहर में तांबे और पीतल के बर्तन बनाने वाली 28 औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो चुकी थीं। इन इकाइयों ने न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए, बल्कि हापुड़ को बर्तन निर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान दिलानी शुरू कर दी।

वर्ष 1980 तक उद्योग में बड़ा बदलाव आया। बाजार की मांग और बदलती पसंद को देखते हुए स्टेनलेस स्टील के बर्तनों का निर्माण शुरू हुआ। इसके साथ ही डिजाइनिंग, पालिश और बर्तन निर्माण से जुड़ी अलग-अलग इकाइयां विकसित होने लगीं।

इस दौर में शहर में स्टील के बर्तन बनाने, डिजाइन और पालिश से जुड़े करीब 200 उद्योग संचालित होने लगे थे। इससे बर्तन उद्योग का दायरा बढ़ा और बड़ी संख्या में लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने लगा।

देश की सीमाएं लांघकर विदेशों तक पहुंचा कारोबार

वर्ष 2000 के आसपास हापुड़ के बर्तन कारोबार ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर कदम बढ़ाया। गुणवत्ता, उपयोगिता और आकर्षक डिजाइन के दम पर यहां के उत्पादों की मांग विदेशों में बढ़ने लगी।

अब हापुड़ में निर्मित स्टेनलेस स्टील व तांबे के बर्तन और किचनवेयर अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और नीदरलैंड जैसे देशों के बाजारों तक पहुंच रहे हैं। यहां के उद्योगों में अब पारंपरिक बर्तनों के साथ आधुनिक जरूरतों के अनुरूप उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।

वहीं, इनमें स्टेनलेस स्टील के ड्रम, स्टोरेज बाक्स, थाली, दूध के बर्तन, कड़ाही और अन्य किचनवेयर शामिल हैं। उत्पादों की विविधता और बाजार की मांग के अनुरूप डिजाइन तैयार करने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कंपनियां 200 से अधिक विक्रेताओं के नेटवर्क के माध्यम से देश और विदेश में अपने उत्पादों की आपूर्ति कर रही हैं।

नई पीढ़ी ने संभाली पुरखों की विरासत

वर्तमान में हापुड़ में वैश्विक स्तर पर कारोबार करने वाली सात बड़ी औद्योगिक इकाइयों के साथ करीब 100 छोटी इकाइयां भी संचालित हो रही हैं। इन उद्योगों ने कसेरठ बाजार से शुरू हुई कारोबारी परंपरा को आगे बढ़ाया है।

पुरानी पीढ़ी ने जहां सीमित संसाधनों में उद्योग की नींव रखी थी, वहीं नई पीढ़ी ने आधुनिक तकनीक, नए डिजाइन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़कर कारोबार का विस्तार किया है। छह दशक का यह सफर बताता है कि हापुड़ की पहचान केवल बर्तन निर्माण तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां के उद्यमियों ने स्थानीय हुनर को वैश्विक कारोबार में बदलने का काम किया है।

हमारे पुरखों ने सीमित संसाधनों में जिस कारोबार को स्थापित किया था, हमने उसकी पहचान विदेश तक बनाई है। आज घरों से लेकर बड़े कारखानों तक में बर्तनों का काम हो रहा है। करीब 10 हजार लोग इससे जुड़े हैं। हापुड़ की बर्तनों की गुणवत्ता ही उनकी पहचान है। - गोविंद अग्रवाल कसेरा

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