तालीम और कारोबार के बहाने युवाओं को दे रहे झांसा, आतंकियों का सेफ जोन क्यों बन रहा हापुड़?
हापुड़ में जैश-ए-मोहम्मद के संदिग्ध की गिरफ्तारी के बाद जिले की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। दिल्ली से निकटता, ...और पढ़ें

हापुड़ में आतंकी नेटवर्क की जड़ें गहरी, सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती।
HighLights
जैश-ए-मोहम्मद संदिग्ध की गिरफ्तारी से हापुड़ की सुरक्षा पर सवाल।
दिल्ली से निकटता, खादर क्षेत्र हापुड़ को बनाते हैं संवेदनशील।
स्थानीय पुलिस निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न।
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। गंगा किनारे खादर क्षेत्र के गांव शेरपुर की मस्जिद से जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े संदिग्ध के पकड़े जाने के बाद जिले में आतंकी नेटवर्क और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। यह मामला पहली बार सामने नहीं आया है।
पिछले वर्षों में हापुड़ और आसपास के क्षेत्रों से आतंकी संगठनों से जुड़े संदिग्धों, जासूसी और टेरर फंडिंग के मामलों में गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर हापुड़ आतंकियों और संदिग्ध गतिविधियों के लिए मुफीद क्यों साबित होता रहा है।
हापुड़ की भौगोलिक स्थिति इसे संवेदनशील बनाती है। दिल्ली से नजदीकी, राष्ट्रीय राजमार्गों और अन्य प्रमुख मार्गों से बेहतर कनेक्टिविटी के कारण यहां से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
जिले का बड़ा हिस्सा गंगा के खादर क्षेत्र में आता है। खादर के दूरदराज गांवों, खेतों और तेजी से विकसित हो रहे फार्म हाउसों में नियमित निगरानी पुलिस के लिए चुनौती बनी रहती है। इसके अलावा गंगा पार और आसपास के वन क्षेत्रों में भी पहुंच आसान नहीं है।
घनी आबादी में पहचान करना चुनौती
शहर के बुलंदशहर रोड, पुराना बाजार और अन्य घनी आबादी वाले इलाकों में बाहरी लोगों के लंबे समय तक रहने की स्थिति में उनकी गतिविधियों पर नजर रखना आसान नहीं है। दिल्ली रोड से जुड़े पुराने मोहल्लों में किराये पर रहने वाले लोगों और नए आने-जाने वालों के सत्यापन की व्यवस्था को प्रभावी बनाने की जरूरत है।
अतीत में जिले से जुड़े आतंकी मामलों में सामने आए तथ्यों के बाद यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी स्थानीय स्तर पर समय रहते क्यों नहीं मिल पाती।
धौलाना-पिलखुवा क्षेत्र भी संवेदनशील
नोएडा और गाजियाबाद से सटे धौलाना और पिलखुवा क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों में पूर्व में संदिग्धों की गिरफ्तारी के मामले सामने आ चुके हैं। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में जिले के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के नाम सामने आने से स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत महसूस होती है।
कई मामलों में सामने आ चुका हापुड़ कनेक्शन
पूर्व में आतंकी डेविड हेडली से जुड़े मामले, अब्दुल करीम उर्फ टुंडा की गिरफ्तारी और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संदिग्धों के मामलों में हापुड़ का नाम सामने आ चुका है। इसके अलावा राष्ट्रीय जांच एजेंसी और एटीएस की कार्रवाई में जिले से आइएसआइ और अन्य आतंकी नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप में लोगों की गिरफ्तारी की खबरें सामने आती रही हैं।
वर्ष 2019 में धौलाना, वैठ, अठसैनी और बदरखा क्षेत्र से युवकों की गिरफ्तारी, जनवरी 2021 में बिहूनी गांव के पूर्व सैनिक सौरभ शर्मा की पाकिस्तान के लिए जासूसी और टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तारी, नवंबर 2023 में पिलखुवा क्षेत्र से रियाजुद्दीन की आइएसआइ के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तारी और फरवरी 2024 में श्यामपुर के सतेंद्र सिवाल की आइएसआइ एजेंट होने के आरोप में गिरफ्तारी ने भी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई थी।
स्लीपर सेल पर निगाह जरूरी
शेरपुर प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या पुलिस और स्थानीय खुफिया तंत्र ग्रामीण इलाकों में बाहरी लोगों की गतिविधियों पर पर्याप्त निगरानी रख रहा है। तालीम, कारोबार, धार्मिक गतिविधियों या अन्य सामान्य कारणों से किसी क्षेत्र में लंबे समय तक रहने वाले व्यक्ति की गतिविधि संदिग्ध होने पर समय रहते उसकी जांच जरूरी है। सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ही संदिग्ध नेटवर्क सामने आने की स्थिति स्थानीय निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।
