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हापुड़ में जीरो बजट खेती का अभियान: एक गाय से पांच एकड़ जमीन पर होगी रसायन मुक्त खेती

Published: Sun, 04 Oct 2026 11:37 AM (IST)

हापुड़ के कूलपुर गांव में एक गाय से पांच एकड़ खेती के टिप्स सिखाए जाएंगे, जिससे रसायन मुक्त और लाभदायक कृषि को प्रोत्साहन मिलेगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड

HighLights

  1. प्रत्येक जिले में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र खोले जाएंगे।

  2. एक देशी गाय से पांच एकड़ खेती का प्रावधान है।

  3. हापुड़ के कूलपुर गांव में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित होगा।

ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। शासन ने जीरो बजट यानि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की योजना तैयार की है। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की पहल पर इसका अभियान शुरू किया जा रहा है।

इसमें एक देशी गाय से पांच एकड़ खेती करने का प्रावधान है। इस अविश्वनीय कृषि तकनीक का प्रशिक्षण देने और खेती करके दिखाने के लिए प्रत्येक जिले में एक-एक केंद्र तैयार किया जा रहा है।

प्रकृतिक खेती पर होगा जोर

इन केंद्रों का संचालन पशुपालन व कृषि विभाग मिलकर करेंगे। इसमें गो आश्रय केंद्रों के आसपास के किसानों के कुछ खेतों में प्रकृतिक खेती कराई जाएगी। उनमें गोमुत्र, गोबर और विशेष रूप से तैयार किए जाने वाला जीवामृत प्रयोग किया जाएगा। इसमें किसी प्रकार का रसायन-कीटनाशक नहीं लगाया जाएगा।

वही निरीक्षण के लिए जिले के दो दर्जन किसानों की कमेटी होगी। वह निरीक्षण के साथ ही मास्टर ट्रेनर के रूप में भी प्रशिक्षित होंगे। इसमें जहर मुक्त खेती करने के साथ ही उसकी पैदावार की बिक्री के लिए भी उचित प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जाएगा। हापुड़ में इसके लिए गढ़मुक्तेश्वर तहसील क्षेत्र के गांव कूलपुर का चयन किया गया है।

कीटनाशक नहीं लगाएंगे, मुनाफा कमाएंगे

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक डा. अरविंद यादव ने बताया कि जब 1960 में यूरिया आया था। तब 20 किलो प्रति हेक्टेयर का प्रयोग होता था। आजकल यूरिया गन्ने में 200 और आलू में 500 किलो प्रति हेक्टेयर का प्रयोग किया जा रहा है। इससे जमीन बंजर हो रही है।

बंजर हो रही भूमि

1960 में उत्तराखंड की पंतनगर यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिक डा. मैनये ने मेरठ मंडल के खेतों पर अध्ययन किया था। उन्होंने पाया था कि खेतों में 2.5 प्रतिशत आर्गेनिक कार्बन था। उर्वरा खेती के लिए इनकी मात्रा 0.5 से ज्यादा होनी चाहिए। वहीं अब सर्वे में सामने आया है कि आर्गेनिक कार्बन 0.3 से 0.4 ही रह गया है। इस प्रकार भूमि बंजर हो रही है।

यदि तत्काल प्रकृति खेती को नहीं अपनाया तो आने वाली पीढ़ियों को जहरीले हवा-पानी और अनाज मिलेंगे। यूरिया का प्रयोग बंद करने के तीन साल बाद खेतों की मिट्टी और पैदावार से खुशबू आने लगेगी।

सात गुना बढ़ गया कैंसर

अहमदाबाद हास्पिटल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डा. जेएस पटेल के शोध में सामने आया है कि 10 साल में कैंसर सात गुना बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण केमिकल वाला खाद्यान्न व खनिजहीन पानी का प्रयोग करना है। जहरमुक्त अनाज-दाल-सब्जी का प्रयोग करने पर प्रतिरोधक क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि संक्रामक रोग भी पास नहीं आता है। ऐसे में आने वाली पीढ़ियों के लिए जहरमुक्त खेती को तत्काल अपनाने की जरूरत है। इसके लिए एक गाय से पांच हेक्टेयर यानि जीरो बजट खेती को प्रचलन में लाना होगा।

कैसे तैयार होता है जीवामृत?

इसके लिए गोमूत्र और गोबर मिलाकर 200 लीटर पानी में रखते हैं। उसमें पांच किलो गुड़, पांच किलो उड़द की दाल और पांच किलो ऐसे स्थान की मिट्टी, जहां पर रसायन प्रयोग नहीं किए गए हों। पांच दिन में यह जीवामृत तैयार हो जाता है। बोआई से पहले इसको खेत में फैला देते हैं। तीन साल प्रयोग करने के बाद मिट्टी से रसायन की मात्रा बिल्कुल खत्म हो जाती है। वहीं पैदावार रसायन के प्रयोग जितनी ही होती है।

खोले जा रहे प्रशिक्षण केंद्र

प्रत्येक जिले में प्राकृतिक यानि जीरो बजट खेती के प्रशिक्षण को केंद्र खोले जा रहे हैं। इसमें गोआश्रय स्थल के आसपास के खेतों में जीरो बजट खेती कराने की तैयारी है। किसानों अपनी रसायन वाली और वहीं केंद्र की रसायनमुक्त खेती की पैदावार, स्वाद व गुणवत्ता में अंतर देखेंगे। उसके बाद वह अपने खेतों में भी प्राकृतिक खेती करेंगे।

इसके लिए वह देशी गाय का पालन भी करेंगे। ऐसे में लागत कम लगेगी और पैदावार भरपूर होगी। वहीं प्राकृतिक तरीके से तैयार पैदावार का बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा। ऐसे में एक-एक कर सभी किसान जहरमुक्त खेती को अपनाने लगेंगे। इससे खेतों की मिट्टी बंजर होने से बचेगी और लोगों काे गंभीर बीमारियों की चपेट में आने से बचाया जा सकेगा।

हमने प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने की योजना तैयार की है। इसके प्रथम चरण में एक-एक केंद्र बनाने की तैयारी है। हम कूलपुर क्षेत्र में इसकी स्थापना करा रहे हैं। इसमें देशी गायों के गोबर व मूत्र से खेती करानी बताई जाएगी। जिसमें किसी रसायन का प्रयोग भी न हो और पैदावार भी भरपूर मिल सके।
- डा. ओपी मिश्रा, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी।

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