श्राद्ध पक्ष में वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों का मार्मिक सवाल: जीवित माता-पिता की उपेक्षा क्यों?
श्राद्ध पक्ष में वृद्धाश्रमों में भोजन दान करने वालों से बुजुर्ग सवाल करते हैं कि क्या उन्होंने अपने जीवित माता-पिता ...और पढ़ें

बुजुर्ग को भोजन खिलाता युवक ( एआई जेनरेटेड इमेज )
HighLights
वृद्धाश्रम के बुजुर्ग श्राद्ध भोजन देने वालों से सवाल करते हैं।
वे उपेक्षित माता-पिता वाले लोगों का भोजन अस्वीकार करते हैं।
यह संतान के कर्तव्य और संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
हर्ष अग्रवाल, हापुड़। श्राद्ध पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पकवान बन रहे हैं, तर्पण हो रहा है और दान-पुण्य के लिए लोग वृद्धाश्रमों में भोजन, फल और कपड़े लेकर पहुंच रहे हैं।
यहां अपनों की बेरुखी के जख्म लिए बैठे बुजुर्गों का पहला सवाल ही कलेजा चीर देता है, अपने मां-बाप को भी खाना खिलाया या सिर्फ दूसरों के माता-पिता को खिलाकर पुण्य कमाने आए हो?
जिन बुजुर्गों के अपने ही उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़कर भूल गए, वह ऐसे लोगों के घर का भोजन तक स्वीकार नहीं करते, जिनके माता-पिता खुद उपेक्षा के शिकार हैं।
विडंबना देखिए, मृतकों के नाम पर पकवानों की थालियां सज रही हैं, जबकि जीवित मां-बाप दो निवालों के लिए तरस रहे हैं। किसी को घर से निकाल दिया गया, तो किसी को बहाने से वृद्धाश्रम छोड़कर स्वजन लौटे ही नहीं।
बुजुर्गों के पास अपनों के फोन नहीं आते
अब हालात यह हैं कि कई बुजुर्गों के पास न अपनों का फोन आता है और न उनके संपर्क करने पर जवाब मिलता है।
जिंदगी की आखिरी सांसें वृद्धाश्रमों में पूरी कर रहे इन बुजुर्गों के लिए श्राद्ध पक्ष केवल दान-पुण्य का अवसर नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला समय भी है। सवाल यही है कि जब जीवित माता-पिता की सेवा नहीं की, तो उनके नाम पर कर्मकांड का क्या अर्थ?
श्राद्ध पक्ष में मृतकों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और ब्राह्मण भोज की परंपरा निभाई जा रही है। लेकिन, इसी बीच कुछ जीवित मां-बाप ऐसे भी हैं, जिन्हें अपने ही बच्चों के घर में दो निवाले तक नसीब नहीं होते। किसी को घर से निकाल दिया गया तो किसी को वृद्धाश्रम छोड़कर स्वजन लौट गए और फिर पलटकर उनकी सुध तक नहीं ली
अब अपनों के याद में कट रही जिंदगी
अब इन बुजुर्गों की जिंदगी अपनों की याद और इंतजार में कट रही है। विडंबना यह है कि पितरों के नाम पर भोजन कराने वाले कुछ लोग अपने जीवित माता-पिता की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ चुके हैं।
वृद्धाश्रमों में श्राद्ध पक्ष के दौरान भोजन, फल और कपड़े लेकर पहुंचने वाले लोगों की संख्या बढ़ जाती है। बुजुर्गों को भोजन कराने और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए लोग आगे आते हैं।
हालांकि, जब कोई व्यक्ति श्राद्ध का भोजन लेकर पहुंचता है तो बुजुर्गों का सवाल उसे भीतर तक झकझोर देता है, कि अपने मां-बाप को खिलाया? वृद्धाश्रम में रह रहे शिवचरन सिंघल, शशि देवी, जगवती देवी व हेतराम सिंह ने बताया कि जिनके माता-पिता वृद्धाश्रम में रह रहे हैं, उनके घर का भोजन तक स्वीकार करने से हम परहेज करते हैं।
हमारे लिए यह भोजन का सवाल नहीं है, बल्कि माता-पिता के प्रति संतान के कर्तव्य और संवेदनशीलता का सवाल है। यह पीड़ा केवल घर से दूर होने तक सीमित नहीं है। उम्र के इस पड़ाव पर जब हमें सहारे और अपनत्व की सबसे अधिक जरूरत है, तब अपने ही हमसे दूर हो गए हैं।
श्राद्ध पक्ष में वृद्धाश्रमों में पहुंचने वाले लोग भोजन, फल और कपड़े देकर पुण्य कमाने की भावना रखते हैं। यह पहल जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए सहायक हो सकती है। लेकिन, समाज में बड़ा सवाल छोड़ जाती है कि क्या माता-पिता के प्रति कर्तव्य केवल मृत्यु के बाद ही याद आएगा? जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में सहारे के लिए दूसरों की ओर देखना पड़ रहा है। यह चिंतनीय है। - प्रेमपाल शास्त्री- आचार्य गुरुकुल महाविद्यालय ततारपुर
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