कौन थे हापुड़ के रहने वाले संत बाबा गंगादास? जिन्होंने अपनी कुटिया तोड़कर बनाई थी झांसी की रानी की चिता
रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम क्षणों में बाबा गंगादास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन वो कौन थे और अंग्रेजों से लड़ने ...और पढ़ें

HighLights
बाबा गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार किया।
रानी ने बेटे दामोदर को बाबा गंगादास को सौंपा।
बाबा ने 1857 क्रांति में क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित किया।
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और अंग्रेजों को लोहे के चने चबा देने वाले युद्ध से सभी परिचित हैं। लोगों को वह दृश्य भी याद होगा जिसमें पीठ पर बेटे को बांधकर घोड़े की लगाम मुंह में दबाए हुए रानी दोनों हाथों से युद्ध करती हैं।
इसके साथ ही इतिहास के पृष्टों में दबे कई महत्वपूर्ण तथ्य आम जनमानस को ज्ञात नहीं हैं। ज्यादातर लोग नहीं जानते कि रानी ने अंतिम सांस कहां पर ली और उनका अंतिम संस्कार किसने किया।
रानी लक्ष्मीबाई ने किसे सौंपा था अपना बेटा?
अपनी मौत से पहले रानी ने बेटे को किसकी गोद में सौंपा था। पर्दे के पीछे के आजादी के इन तथ्यों की जानकारी जुटाते हैं, तो सामने नाम आता है उदासीन परंपरा के संत और खड़ी बोली के पहले महाकवि बाबा गंगादास का।
हापुड़ के रहने वाले बाबा गंगादास पर पांच दर्जन से ज्यादा छात्र शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। रानी के बलिदान के स्थान पर ग्वालियर में बाबा की समाधि भी है।
कौन हैं बाबा गंगादास?
हापुड़ में भी उनकी समाधी और मंदिर बनें हुए हैं। उनकी स्मृति में हर साल कुश्तियों का विशाल दंगल भी आयोजित होता है। उसके बावजूद ज्यादातर लोग बाबा गंगादास के व्यक्तित्व व कृतित्व से अपरिचित ही हैं।
बाबूगढ़ क्षेत्र के गांव रसुलपुर के रहने वाले बाबा गंगादास उदासीन परंपरा के संत थे। वह खड़ी बोली के महान कवि थे। उनका मठ ग्वालियर में आज भी है। बाबा गंगादास युवा क्रांतिकारियों को युद्ध का प्रशिक्षण देने का काम मठ के अंदर करते थे। वह बंदूक, भाला, तलवार व कटार चलाने में महारथ रखते थे।
रानी लक्ष्मीबाई और बबा गंगादास की बैठक
अंग्रेजों से युद्ध से पहले रानी लक्ष्मीबाई और बाबा गंगादास की 1858 में गोपनीय बैठक भी हुई थी। युद्ध में घायल होने के बाद रानी लक्ष्मीबाई को लेकर उनके सैनिक बाबा गंगादास के आश्रम में ही पहुंचे थे। रानी की हालत गंभीर थी। उन्होंने बाबा को अपना बेटा सौंपकर उसको सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की अपील की।
इस दौरान रानी ने बाबा से आग्रह किया था कि उनका शव अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने पाए। बाबा ने रानी का सिर अपनी गोद में लिया और उनको गंगाजल पिलाया। तभी रानी का बलिदान हो गया।
रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार
इतिहास के अनुसार इसी दौरान अंग्रेजी सैनिकों ने मठ पर हमला बोल दिया। मठ के साधू बाबा के आदेश पर बंदूक और तलवार लेकर युद्ध करने लगे। आश्रम में चिता बनाने को लकड़ियां भी नहीं थीं। तब बाबा ने अपनी कुटिया तोड़कर चिता बनाई और रानी का अंतिम संस्कार कर दिया। तब तक अंग्रेजी सैनिकों को मठ में प्रवेश नहीं करने दिया गया था।
हर साल कुश्ती का आयोजन
इस एक घंटे के युद्ध में मठ के 745 बैरागी साधुओं ने अपने प्राणों की आहूति दी थी. अंग्रेजी सैनिक जब चिता तक पहुंचे तो उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा। बाबा गंगादास की स्मृति में ग्रामीण 1972 से हर साल ग्रामीण कुश्तियों का दंगल आयोजित करते हैं।
देशभर के नामचीन पहलवान लेते हैं भाग
इसमें देशभर के नामचीन पहलवान भाग लेते हैं। स्मृति में गांव में 1976 में उनकी समाधी बनाई गई थी। ग्रामीण प्रवीण शर्मा, पवनवीर सिंह, राहुल त्यागी और मुकेश त्यागी आदि ने बताया कि आजादी की क्रांति में बाबा ने हजारों जवानों को युद्ध का प्रशिक्षण दिया था।
रानी लक्ष्मीबाई के बेटे को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया
रानी के बेटे दामोदर को सुरक्षित स्थान पर भेजने वाले बाबा गंगादास ही थे। रानी ने बेटे की सुरक्षा के लिए अपना हार भी उतारकर देना चाहा था, जो बाबा ने स्वीकार नहीं किया।
रानी का अंतिम संस्कार करने के बाद बाबा हरिद्वार के लिए निकल गए थे। आजादी की क्रांति के इस महान संत को आज भी पहचान की दरकार है। इस उपेक्षित संत को यथोचित सम्मान दिए जाने की जरूरत है।
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