सिद्धार्थनगर: जिनकी मौत आनी है, उसे तो कोई रोक नहीं सकता, लेकिन जो बच सकता है, उसे तो बचाने वाले हाथ चाहिए। जो जिला अस्पताल में नहीं हैं। मंगलवार की सुबह कोरोना के चार ऐसे लोगों की मौत हो गई, जिन्हें वेंटीलेटर की जरूरत थी और अस्पताल प्रशासन मुहैया नहीं करा सका।

हैरानी देखिए पिछले वर्ष कोरोना संकट काल में आनन-फानन में शासन से 23 वेंटीलेटर तो भेज दिए गए, लेकिन वे किसी काम के नहीं। वेंटिलेटर चलाने वाले शासन से नहीं मिले। अस्पताल के एमसीएच विग में 15 वेंटीलेटर लगाए गए हैं और आठ स्टोर रूम की शोभा बढ़ा रहे। ऐसे में मरीज बे-मौत मरते हैं तो जिम्मेदारी किसी की तो बनती है।

शुक्र मनाइए, जिलाधिकारी दीपक मीणा का, जिन्होंने अस्पताल की खामियों और बारीकियों को पकड़ लिया, नहीं तो और कितनी जान जाती यह समझने वाली बात है। जिलाधिकारी ने एक महिला डाक्टर समेत लापरवाह नौ स्वास्थ्य कर्मियों पर मुकदमा दर्ज कराया है। फिर भी व्यवस्था न सुधरे तो सवाल तो उठेंगे ही। बवाल में यदि किसी डाक्टर के गिरेबान पर हाथ पहुंचे तो स्वास्थ्य महकमे को यह भी सोचना होगा कि यह हालात पैदा किसने किया, जैसा कि परिदृश्य बताया जा रहा है। बेहोशी के तीन डाक्टर जो वेंटीलेटर चला सकते थे वह खुद कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। वेंटीलेटर को संचालित करने के लिए विशेष तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है, जो हर कोई डाक्टर भी नहीं जानता। इसके लिए क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ और आपरेटर चाहिए। दोनों की व्यवस्था सरकार अभी तक नहीं कर पाई है। हां, यह जरूर है कि एक चिकित्सक को विशेष प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन चौबीस घंटे में वह जिला अस्पताल को कितने घंटे का योगदान दे सकता है, यह अपने आप में सवाल है। इसी कारण वेंटीलेटर का संचालन संभव नहीं हो पा रहा है। जबकि इसके लिए डीएम स्तर से शासन को पत्र भी भेजा जा चुका है। अस्पताल सूत्र बताते हैं कि दो चिकित्सकों ने एमसीएच विग में पड़े वेंटीलेटर चलाने की कोशिश की तो वे नाकाम रहे। बाद में उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिए। जिससे यहां पर कोविड मरीजों के लिए वेंटीलेटर बेमतलब साबित हो रहा है। जिले में आक्सीजन भरपूर है, लेकिन एलवन व एलटू में भर्ती मरीजों की लगातार मौत हो रही हैं। सुखद यह है कि नवागत सीएमओ डा. संदीप चौधरी खुद भी बहुत जानकार हैं। सीएमओ ने बुधवार को तीन वेंटीलेटर पर मरीजों को रखवाया और उसे अपने सामने संचालित कराया। यहां सिर्फ एल-टू की व्यवस्था

जितनी सुविधाएं यहां मुहैया कराई गई है, यदि वह संचालित होतीं तो मरीजों को बस्ती और मेडिकल कालेज के लिए रेफर नहीं करना पड़ता। व्यवस्था न होने से हर दिन एक दर्जन से अधिक मरीज रेफर किए जा रहे हैं। जो रेफर हुए तो उसमें से कई इस दुनिया से चल बसे। बस्ती और गोरखपुर जाते-जाते कितने मरीज रास्ते में दम तोड़ देते हैं। इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। जानकार बताते हैं कि यदि यहां पर वेंटीलेटर का इंतजाम होने से साथ क्रिटिकल जानकारों की टीम होती तो यहां भी एल-थ्री की सुविधा मुहैया हो जाती।

सीएमओ डा. संदीप चौधरी ने बताया कि जिला अस्पताल में गंभीर मरीजों के इलाज के लिए 23 वेंटीलेटर हैं, इनके लिए विशेषज्ञ की तैनाती अभी नहीं हो पाई है, बावजूद चिकित्सकों से इसका संचालन शुरू कराया गया है। तीन मरीज वेंटीलेटर पर रखे गए हैं। मैं खुद भी व्यवस्था देख रहा हूं।

Edited By: Jagran