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गोरखपुर से जुड़े हैं महात्मा गांधी और प्रेमचंद के रिश्ते

प्रेमचंद हिंदी प्रदेश और यहां के साहित्य समाज में एक चमत्कार के रूप में पैदा हुए। कल्पना कीजिए कि प्रेमचंद और गांधी इस देश में पैदा नहीं हाेते तो क्या होता। महात्मा के बिना आजादी की लड़ाई का और प्रेमचंद के बिना कथा लेखन का।

By Rahul SrivastavaEdited By: Published: Fri, 08 Oct 2021 06:51 PM (IST)Updated: Fri, 08 Oct 2021 06:51 PM (IST)
गोरखपुर से जुड़े हैं प्रेमचंद के रिश्ते। प्रतीकात्मक तस्वीर

गोरखपुर, जागरण संवाददाता : प्रेमचंद हिंदी प्रदेश और यहां के साहित्य समाज में एक चमत्कार के रूप में पैदा हुए, जैसे पराधीन भारतीय समाज में गांधी। कल्पना कीजिए कि प्रेमचंद और गांधी इस देश में पैदा नहीं हाेते तो क्या होता। महात्मा के बिना आजादी की लड़ाई का और प्रेमचंद के बिना कथा लेखन का। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रेमचंद स्वराज आंदोलन के दौर के संभवत: पहले ऐसे लेखक थे, जिन्होंने व्यक्तिगत जीवन के सुख की तिलांजलि देकर देश हित में हलफ उठाया। हालांकि वह अन्य क्रांतिकारी लेखकों और पत्रकारों की तरह जेल तो नहीं गए पर अपनी कलम के जरिए स्वराज आंदोलन में भारतीय समाज के वंचित, अभावग्रस्त किसानों, मजदूरों, मजलूमों की कथाएं लिखकर स्वराज और स्वाधीन जीवन के लिए उसी तरह अलख जगाया, जैसे पूरे देश में साधारण लोगों के बीच महात्मा गांधी ने। कहना न होगा कि दोनों एक-दूसरे के पूरक होकर भारतीय जनमानस को जगाने का काम कर रहे थे।

प्रेमचंद के आदर्श थे महात्मा गांधी

यह तथ्य दिलचस्प है कि प्रेमचंद महत्वाकांक्षी नहीं थे बल्कि देखा जाए तो उनके सामने साहित्य के वह प्रश्न महत्वपूर्ण थे, जो जीवन, समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने स्वयं लिखा है कि 'मेरी आकांक्षाएं कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज संग्राम में विजयी हों।' यही वजह थी कि प्रेमचंद के आदर्श थे महात्मा गांधी, जिनके विचार और कर्म से प्रभावित होकर उन्होंने पत्रकारिता से लेकर अपने कथा लेखन में गांधी के विचारों और कर्मों को साहित्य का आदर्श बनाया। रंगभूमि उपन्यास का सूरदास का विद्रोही चेहरा उस गांधी की प्रतिच्छाया है, जिसने स्वदेशी जागरण और विदेशी उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए जन-जन में आजादी की अलख जगाई थी। गांधी के विचार और कर्म में सादगी का अचूक सौंदर्यबोध छिपा हुआ था और वही प्रेमचंद के जीवन और साहित्य का भी पाथेय था।

गोरखपुर ने प्रेमचंद के सोचने-विचारने की बदल दी दिशा

दीदउ गोरखपुर में प्रेमचंद शोधपीठ के आचार्य प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने कहा कि गांधी और प्रेमचंद के व्यक्तित्व को आमने-सामने रखकर देखें तो अद्भुत साम्य दिखाई देगा। यहां यह कहना जरूरी है कि वह गांधी से प्रभावित तो थे पर अंधभक्त नहीं। भारतीय समाज और मनुष्यत्व के प्रति अथाह प्रेम अगर गांधी में था तो प्रेमचंद भी इसमें उनसे कहीं पीछे नजर नहीं आते। प्रेमचंद की पुण्यतिथि पर उनके और गांधी के बीच रिश्तों की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि गोरखपुर ही वह स्थान था, जिसने प्रेमचंद के सोचने-विचारने की दिशा बदल दी और उस बदली सोच ने उन्हें हृदय से स्वाधीनता संग्राम सेनानी बना दिया। बाले मियां के मैदान में गांधी जी का जोशीला भाषण सुनकर ही प्रेमचंद ने अपनी सरकारी आजीविका का त्याग कर दिया और कलम के जरिए स्वाधीनता के पुजारी बन गए।


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