गोरखपुर, जागरण संवाददाता। पार्क का ख्याल आते ही आमतौर पर खेलकूद और प्राकृतिक वातावरण में विचरण व विश्राम का दृश्य मन-मस्तिष्क में उभरने लगता है पर गोरखपुर के कुछ पार्कों को लेकर लोगों की विचारधारा सिर्फ इतनी ही नहीं है। इसकी वजह उन पार्कों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। ऐसे पार्कों का नाम आते ही उनसे जुड़े इतिहास की चर्चा शहर के बड़े-बुजुर्ग खुद-ब-खुद करने लगते हैं। उनकी नजर में आज भी वह पार्क नहीं बल्कि ऐतिहासिक स्थल हैं। नई पीढ़ी के लिए ऐसे ही कुछ पार्कों की जानकारी लेकर इस बार हम आए हैं ताकि उन्हें उन पार्कों में विचरण के दौरान ऐतिहासिक स्थल पर मौजूद होने का भी अहसास हो।

इन हिस्सों को दिया गया पार्क का स्वरूप

नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने शहर को आधुनिक स्वरूप देने के लिए अलग-अलग हिस्सों में उन स्थलों का चिन्हांकन कराया, जिसे पार्क का स्वरूप दिया जा सकता था। इस क्रम में कुछ ऐसे स्थल भी चिन्हित किए गए, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यह स्थल थे लालडिग्गी, प्रेमचंद निकेतन, ह्वी पार्क, बिस्मिल लाइब्रेरी और विश्वविद्यालय पार्क। लालडिग्गी को विकसित कर नेहरू पार्क नाम दिया गया तो प्रेमचंद निकेतन प्रेमचंद पार्क बन गया। विश्वविद्यालय पार्क को पंत पार्क नाम दिया गया और बिस्मिल लाइब्रेरी बिस्मिल पार्क में तब्दील हो गई। इन सभी पार्कों की ऐतिहासिकता पर चर्चा से हम इतिहास के उन पन्नों को फिर से पलट सकेंगे, चर्चा के अभाव में जिनसे नई पीढ़ी अंजान है।

प्रेमचंद पार्क (Premchand Park) में कथा सम्राट ने गुजारे थे पांच वर्ष

बेतियाहाता मोहल्ले में स्थापित प्रेमचंद पार्क शहर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति का ध्यान खींचता है। इस पार्क का नाम मुंशी प्रेमचंद के नाम पर यूं ही नहीं है, दरअसल पार्क के अंदर मौजूद प्रेमचंद निकेतन में उन्होंने अपने जीवन के पांच वर्ष गुजारे थे। 1904 में बना यह निकेतन कभी प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के लिए बने नार्मल स्कूल का हिस्सा था। शिक्षा विभाग की नौकरी के सिलसिले में तबादले पर वह 1916 में गोरखपुर आए तो उन्होंने इसी निकेतन को अपना आशियाना बनाया। उसके बाद वह इस निकेतन में तबतक रहे, जबतक उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र नहीं दे दिया। कहते हैं कि 'ईदगाह' और 'नमक का दारोगा' जैसी मशहूर कहानियां प्रेमचंद ने इसी निकेतन में निवास के दौरान लिखी थीं। ईदगाह की पृष्ठभूमि उन्हें निकेतन के ठीक पीछे मौजूद हजरत मुबारक शाह शहीद के दरगाह के सामने की ईदगाह से मिली थी तो नमक का दारोगा की पृष्ठभूमि राप्ती नदी के घाट से। निकेतन को धरोहर समझकर ही 1989 में उसके इर्दगिर्द पार्क विकसित कर दिया गया और उस पार्क को मुंशी जी का नाम दे दिया गया।

'ह्वी' पार्क (V Park) में कभी शाम को बजता था बैंड

मोहद्दीपुर चौक से दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की ओर जाने वाले मार्ग और पैडलेगंज जाने वाले मार्ग को अलग करने में एक पार्क की बड़ी भूमिका है। वह है विंध्यवासिनी पार्क, जिसे ज्यादातर लोग ह्वी पार्क के नाम से जानते हैं। इसका इतिहास करीब सवा सौ साल पुराना है। इसे सन् 1885 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर ह्वी ने बनवाया था। इसलिए यह ह्वी पार्क के नाम से मशहूर हुआ। इसका ऐतिहासिक महत्व दो वजह से है। पहला इसमें मौजूद गुप्तकालीन भगवान विष्णु और भगवान सूर्य की प्रतिमा और दूसरा उत्तरी मुख्य द्वार पर बनी गुंबदाकार इमारत। 35 एकड़ के इस पार्क में सन् 1923 में रुद्रपुर क्षेत्र में मौजूद ग्राम रामचक के पास एक प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष से प्राप्त भगवान विष्णु और भगवान सूर्य की मूर्ति स्थापित की गई है। पार्क के उत्तरी द्वार से प्रवेश करने पर अंग्रेजी वास्तुकला में बना एक छोटा सा दो मंजिला गुंबदाकार भवन सभी को आकर्षित करता है। अंग्रेजी काल में इस इमारत से शाम को बैंड बजता था, इसलिए उस समय इसे बैंड स्टैंड के नाम से भी जाना जाता है। बाद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विंध्यवासिनी प्रसाद के नाम पर इसका नाम विंध्यवासिनी पार्क रख दिया गया।

विश्वविद्यालय के चलते पार्क को पंत (Pant Park) का नाम मिला

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के सामने आबाद पंत पार्क उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को समर्पित है। इसका नाम पंत पार्क क्यों पड़ा, यह बात कम ही लोग जानते होंगे। पार्क के नाम का इतिहास विश्वविद्यालय के इतिहास से जुड़ता है। आजादी के बाद प्रदेश में स्थापित होने वाले इस विश्वविद्यालय की नींव एक मई 1950 को तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने रखी। नब्बे के दशक में वीर बहादुर सिंह ने जब विश्वविद्यालय के सामने पार्क बनाने का प्रस्ताव विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखा तो इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। विश्वविद्यालय ने इसके लिए शासन को जमीन भी उपलब्ध करा दी। जब पार्क बनकर तैयार हुआ तो विश्वविद्यालय की नींव रखने वाले पंत जी के नाम पर पार्क का नाम रख दिया गया।

पार्क में संजोई जाती थी बिस्मिल (Bishmil Park) की यादें

पार्क रोड पर मौजूद बिस्मिल पार्क से क्रांतिकारीपा पं. राम प्रसाद बिस्मिल का कोई सीधा रिश्ता तो नहीं है लेकिन उनसे गहरा जुड़ाव रखने वाले श्यामानंद श्रीवास्तव द्वारा पार्क में उनकी यादें संजोई जाती थीं। इसी कारण जब यह पार्क बना तो उसे बिस्मिल का नाम मिला। हालांकि दो वर्ष पहले पार्क में श्यामानंद द्वारा चलाया जाने वाला पुस्तकालय प्रशासन द्वारा हटाया जा चुका है। इसी पार्क से ही श्यामानंद 'बिस्मिल' नाम का अखबार भी निकाला करते थे। पार्क में श्यामानंद द्वारा बिस्मिल की याद में किए जाने वाले आयोजनों में बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी और भांजे का आगमन होता रहा है।

नेहरू की गिरफ्तारी से जुड़ा है नेहरू पार्क (Nehru Park) का इतिहास

शहर के व्यस्ततम बाजार और थोक मंडी साहबगंज के पश्चिम हाबर्ड बांध के किनारे एक बड़ा ही रमणीक स्थान है, जिसकी पहचान कागजी तौर पर नेहरू पार्क और बोलचाल में लालडिग्गी पार्क के रूप में होती है। कभी यह इस्माइल पार्क भी था। तीन-तीन नाम की पहचान रखने वाला यह पार्क ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ने की वजह से ही शहर की विरासत भी है। कालक्रम में सबसे पहले इसका नाम लालडिग्गी था। लालडिग्गी नाम का इतिहास सतासी राजाओं से जुड़ा है। दरअसल सतासी राजाओं के दूसरे नंबर के भाई को लाल बाबू कहा जाता है। जब सतासी राजा बसंत सिंह ने बसंतपुर किला बनवाया तो उनके छोटे भाई लाल बाबू किले के बगल में शासन में सहयोग के लिए बसे। आज के नेहरू पार्क में लाल बाबू की डिग्गी यानी पोखरा आज भी है। इसी कारण इसे लालडिग्गी नाम मिला। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पंडित जवाहर लाल नेहरू 1940 में गोरखपुर आए तो लालडिग्गी पार्क में उनकी सभा रखी गई। सभा का शासन द्वारा विरोध हुआ तो जस्टिस इस्माइल उन्हें अपनी बग्गी पर बैठाकर पार्क तक ले आए आए। यह बात इतनी मशहूर हुई क पार्क को ही इस्माइल साहब के नाम से जाना जाने लगा। तीन जून 1940 को भाषण देने के दौरान इसी पार्क से तत्कालीन कलेक्टर ने पंडित नेहरू गिरफ्तार किया। इस घटना के चलते ही बाद में इस पार्क का नाम नेहरू पार्क हो गया।

Edited By: Pragati Chand