सपा-भाजपा के दिग्गजों का गोरखपुर में जमावड़ा, आखिर यूपी की राजनीति में इतना खास क्यों है यह शहर?
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़े नेताओं के कार्यक्रमों के लिए गोरखपुर ही इतना महत्वपूर्ण क्यों बन रहा है? ...और पढ़ें
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HighLights
एक ही दिन दो प्रमुख दलों के प्रदेश स्तर के नेताओं का गोरखपुर में कार्यक्रम
2027 से पहले संगठन की जमीनी ताकत पर जोर
विधानसभा सीटों और दो लोकसभा क्षेत्रों का जिला
विवेक शुक्ला, गोरखपुर। गोरखपुर में गुरुवार को सियासत के दो अलग-अलग रंग दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े दो दिवसीय प्रवास पर हैं तो समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल भी दो दिन के दौरे पर पहुंचे हैं। दोनों दलों के कार्यक्रमों में बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद पर जोर है।
सवाल यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़े नेताओं के कार्यक्रमों के लिए गोरखपुर ही इतना महत्वपूर्ण क्यों बन रहा है? इसकी वजह केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृहक्षेत्र होना नहीं है। गोरखपुर पूर्वांचल की राजनीति का ऐसा केंद्र है, जहां लोकसभा से लेकर विधानसभा तक का राजनीतिक प्रभाव आसपास के क्षेत्रों तक दिखाई देता है।
नौ विधानसभा सीटें, दो लोकसभा क्षेत्र
गोरखपुर जिले में नौ विधानसभा क्षेत्र कैंपियरगंज, पिपराइच, गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवां, खजनी, चौरीचौरा, बांसगांव और चिल्लूपार हैं। जिले में गोरखपुर और बांसगांव के रूप में दो लोकसभा क्षेत्र भी हैं। जिला प्रशासन के अनुसार वर्तमान में इन सभी नौ विधानसभा क्षेत्रों के विधायक भाजपा के हैं और दोनों लोकसभा सीटों पर भी भाजपा के सांसद हैं।
यही वजह है कि गोरखपुर में संगठन की गतिविधि को केवल शहर तक सीमित करके नहीं देखा जाता। यहां होने वाली बैठकों में आसपास के जिलों और पूरे गोरक्ष क्षेत्र के संगठनात्मक समीकरण भी चर्चा का हिस्सा बनते हैं।

योगी से पहले गुरु, फिर पांच बार सांसद बने योगी
गोरखपुर की राजनीति को समझने के लिए गोरक्षपीठ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ के बाद योगी आदित्यनाथ ने 1998 से 2017 तक लगातार पांच बार गोरखपुर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ी।
इसके बाद 2018 के उपचुनाव में सपा के प्रवीण निषाद ने भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ल को हराकर इस सीट का समीकरण बदल दिया। हालांकि 2019 में भाजपा ने रवि किशन के जरिए सीट पर फिर वापसी की और 2024 में भी रवि किशन ने जीत दर्ज की।
यानी गोरखपुर का इतिहास यह भी बताता है कि मजबूत राजनीतिक प्रभाव वाली सीट पर भी संगठन, उम्मीदवार और सामाजिक समीकरण चुनावी परिणाम बदल सकते हैं।

गोरखपुर क्यों बन जाता है पूर्वांचल का सियासी 'टेस्ट सेंटर'
गोरखपुर की खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति और राजनीतिक विस्तार में भी है। यह गोरक्ष क्षेत्र का प्रमुख संगठनात्मक केंद्र है। भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े भी अपने मौजूदा दौरे में गोरखपुर से संगठनात्मक समीक्षा की शुरुआत कर रहे हैं। उनके कार्यक्रम में क्षेत्रीय पदाधिकारियों, जिलाध्यक्षों, जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और मीडिया-सोशल मीडिया टीम से अलग-अलग संवाद शामिल हैं।
दूसरी तरफ सपा ने भी गोरखपुर में अपने प्रदेश अध्यक्ष का दो दिवसीय कार्यक्रम रखा है। खजनी और बांसगांव में पीडीए कार्यकर्ता सम्मेलन के जरिये बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं तक संगठन को सक्रिय करने पर जोर है।
यही आज के गोरखपुर की सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर है। भाजपा यहां अपने मजबूत संगठन और मौजूदा राजनीतिक आधार की समीक्षा कर रही है, तो सपा उन क्षेत्रों में बूथ स्तर का नेटवर्क मजबूत करने पर जोर दे रही है जहां वह अपना आधार बढ़ाना चाहती है।
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इसलिए गोरखपुर में होने वाली बैठकें केवल स्थानीय कार्यक्रम नहीं हैं। इनके जरिए दोनों दल कार्यकर्ता नेटवर्क, बूथ प्रबंधन, जनप्रतिनिधियों से तालमेल और स्थानीय राजनीतिक माहौल को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
2027 के चुनाव की तैयारी अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन गोरखपुर में एक ही समय पर भाजपा और सपा के प्रदेश स्तर के नेताओं की मौजूदगी यह जरूर दिखाती है कि पूर्वांचल की इस धरती पर संगठन की लड़ाई अब बूथ तक पहुंच चुकी है।
