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गोरखपुर में 56 दुकानें ध्वस्त होने से कई परिवारों पर संकट, कोई बेटी की शादी के लिए चिंचित तो कोई पेट पालने को

नगर निगम और रेलवे की 56 दुकानें गिराए जाने से कई परिवारों की जीविका पर संकट गहरा गया है। किसी को बेटी की शादी की चिंता है तो किसी को स्कूल की फीस और पेट पालने की चिंता सता रही है।

By Jagran NewsEdited By: Pragati ChandPublished: Sun, 26 Mar 2023 08:17 AM (IST)Updated: Sun, 26 Mar 2023 08:17 AM (IST)
गोरखपुर में 56 दुकानें ध्वस्त होने से कई परिवारों की जीविका पर संकट। -जागरण

गोरखपुर, दुर्गेश त्रिपाठी। वर्ष 1993 में कन्हैया लाल वैश्य ने असुरन में रेलवे की जमीन पर बनी दुकान आवंटित कराई और वैश्य प्रोविजन स्टोर्स शुरू किया। धीरे-धीरे गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ने लगी। दो बेटियों और एक बेटे को पढ़ाना शुरू किया। 10 लाख रुपये लोन लेकर एक बेटी की पिछले साल शादी की। दुकान के दम पर दो लाख रुपये लोन चुका भी दिए। अब कन्हैया लाल की न दुकान बची और न ही पूंजी। एक झटके में दुकान ध्वस्त हो गई। कन्हैया लाल उन 56 लोगों में शामिल हैं जिनकी रेलवे व नगर निगम से आवंटित दुकान शुक्रवार को गिरा दी गई। इनमें नगर निगम की 27 और रेलवे की 29 दुकानें शामिल हैं। सभी दुकानें सरकारी थीं और वैध तरीके से आवंटित की गई थीं।

रेलवे द्वारा आवंटित दुकान में कास्मेटिक्स और जनरल मर्चेंट का सामान बेचकर गृहस्थी चलाने वाले ब्रजेश शाही शनिवार को बेटे के साथ इसी दुकान के मलबे से ईंटें चुन रहे हैं। बेटे की ओर इशारा करते हुए बोल पड़ते हैं कि यह दुकानों का मलबा नहीं, बल्कि दुकानदारों के टूटे सपनों का ढेर है। दुकानें तोड़ने में इतनी तेजी दिखाई गई कि पंखा, रैक, टिनशेड तक नहीं निकालने दिया गया। हमें पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। बच्चों को कैसे पालूंगा समझ में नहीं आ रहा है।

रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि 20 साल से दुकान ही रोजगार का जरिया थी। अब समझ में नहीं आ रहा है कि दो बच्चों की पढ़ाई कैसे पूरी करूंगा। पांच साल पहले पिता को खोने वाले राजीव कुमार गुप्ता कहते हैं कि दुकान के भरोसे मां, पत्नी और दो बच्चों का गुजारा हो रहा था। अचानक कार्रवाई से एक लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ। अफसरों ने कार्रवाई न होने का आश्वासन दिया और देखते ही देखते सब कुछ तोड़ दिया गया, हमारे साथ धोखा हो गया।

क्या कहते हैं दुकानदार

  • इम्तियाज अहमद ने कहा कि दो बेटियां और एक बेटा है। नगर निगम ने वर्ष 2000 में मेरे नाम से दुकान आवंटित की थी। रैक और रेलिंग तोड़ दिया। डेढ़ लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ। अफसरों ने दुकान देने का वादा किया था, लेकिन अब कोई सुन नहीं रहा।
  • जावेद ने कहा कि अक्टूबर, 2020 से नगर निगम ने किराया लेना बंद कर दिया। पिता जी की सदमे में मौत हो गई। विकास में बाधक नहीं हैं, लेकिन हमें व्यवस्थित तो कर देना चाहिए था। दो बेटियां हैं, उनका भी भविष्य अंधकारमय हो गया है।
  • इरशाद अहमद ने बताया कि कोल्ड ड्रिंक की दुकान से परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे। इस तरह कार्रवाई की जैसे हम अतिक्रमणकारी और कब्जेदार हैं। परिवार का खर्च अब कैसे चलेगा, सोचकर परेशान हैं। महराज जी से उम्मीद है कि वह कुछ न कुछ जरूर करेंगे।
  • मोगीस अहमद ने कहा कि जब से दुकान तोड़ने की बात उठी पिता रेहान अहमद परेशान रहने लगे। इसी सदमे के चलते उनकी मृत्यु भी हो गई। अब दुकान तोड़ दिए जाने के बाद कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हर अफसर के पास गए, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

रेल मंत्री का पत्र दिखाते रहे दुकानदार

दुकानदार 19 जुलाई, 2022 को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की ओर से सदर सांसद रवि किशन शुक्ल को लिखा पत्र दिखाते रहे। पत्र में रेल मंत्री ने रेलवे की दुकानें न हटाने की बात कही है। लिखा है कि पूर्व में राज्य सरकार ने इन दुकानों को हटाने की योजना बनाई थी। राज्य सरकार को स्पष्टीकरण दे दिया गया है, यह भूमि रेलवे की है और फिलहाल दुकानों को हटाने की कोई योजना नहीं है। दुकानदारों का कहना है कि इस पत्र काे भी रेलवे के अफसरों को दिखाया गया, लेकिन किसी ने कुछ नहीं सुना। यहां तक कि किराया भी लगातार लिया जाता रहा। 22 मार्च को नोटिस दिया और 24 मार्च को दुकान गिरा दी।

क्या कहते हैं अधिकारी

नगर निगम के अपर नगर आयुक्त दुर्गेश मिश्र ने बताया कि दुकानों का आवंटन अक्टूबर, 2020 में ही निरस्त कर दिया गया था। तबसे किराया भी नहीं लिया जा रहा था। सभी को पता था कि दुकानें गिराई जाएंगी।

एडवोकेट बोले

एडवोकेट दीपेश मिश्र ने बताया कि यदि दुकानदार अनधिकृत अध्यासी नहीं थे और रेलवे व नगर निगम के आवंटी थे तो बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। नगर निगम दुकानों से किराया नहीं ले रहा था तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आवंटन गलत है। विधिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन न होने पर दुकानदार क्षतिपूर्ति की मांग कर सकते हैं। आवंटियों को पूरा मौका मिलना चाहिए था।


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