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पहले नकारा फिर स्वीकारा… नेपाल की आपदा प्रबंधन नीति पर सवाल, नेपाली मीडिया ने किया बड़ा खुलासा

Published: Tue, 01 Sep 2026 06:28 PM (IST)

नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ के बाद आपदा प्रबंधन नीति पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि सरकार ने पहले विदेशी सहायता ठुकरा दी थी।

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HighLights

  1. नेपाल ने पहले विदेशी बचाव दलों की मदद ठुकराई थी।

  2. आपदा प्रबंधन में समन्वय की कमी और देरी पर सवाल।

  3. विशेषज्ञों ने नागरिकों की जान बचाने को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।

रजनीश त्रिपाठी, नुवाकोट (नेपाल)। बाढ़ में फंसे लोगों और लापता नागरिकों की बढ़ती चिंता के बीच नेपाल की आपदा प्रबंधन नीति पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक मामलों की समझ रखने वाले बुद्धिजीवियों से लेकर प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों और सरकारी कर्मचारियों तक का कहना है कि संकट की इस घड़ी में प्राथमिकता राजनीति, कूटनीति नहीं, लोगों की जान बचाना होनी चाहिए।

नेपाल ने 26 अगस्त को आई आपदा के अगले दिन नेपाल सरकार ने विदेशी खोज-बचाव दलों की मदद लेने से इनकार कर दिया। उसने अपने सुरक्षा बलों को पर्याप्त बताया था। आपदा की गंभीरता समझ आने और जनहानि देखकर सरकार ने रुख बदला और 28 अगस्त को विशेषज्ञ विदेशी सहायता स्वीकार की। भारत समेत पड़ोसी देशों के शुरू से ही बचाव सहायता की पेशकश के बावजूद नेपाल के इनकार ने सरकार के फैसले पर बहस छेड़ दी।

कर्मचारियों ने उठाया सवाल

नेपाली मीडिया के अनुसार, रसुवा हाइड्रो परियोजना के कर्मचारियों ने छद्म नाम से भेजे पत्रों में सवाल उठाया है कि विदेशी बचावकर्मियों को समय पर अनुमति और समन्वय क्यों नहीं मिल पा रहा।

उनका कहना है कि एक स्थान पर बचाव अभियान पूरा होने के बाद ही दूसरे स्थान पर अभियान शुरू किया जा रहा है, जबकि जरूरत वाले स्थानों पर समानांतर अभियान चलाया जाना चाहिए।

मलबा हटाने में कोई मदद नहीं कर रही सरकार

आपदा में अपना घर और दुकान गंवा चुके धादिंग के चोक बहादुर दहाल भी इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि सरकार घरों के भीतर जमा मलबा हटाने में कोई मदद नहीं कर रही है। जितना नुकसान हुआ है उसके लिए बहुत तकनीकी उपकरण और संसाधन चाहिए होगा। प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव के लिए इसे बढ़ाने की जरूरत है।

राजनीतिक विश्लेषक और त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डा प्रेम शर्मा कहते हैं मेरे विचार में, ऐसी गंभीर स्थिति में सरकार को अनुमान के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। थोड़ी देरी भी नागरिकों के जीवन पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।

सरकार के तीनों स्तरों के बीच कुछ भ्रम और समन्वय की कमी दिखाई देती है। किस निकाय को क्या करना है, इसका स्पष्ट विभाजन होना चाहिए था। विशेष रूप से जब विदेशी बचाव दल, आधुनिक तकनीक, उपकरण और विशेषज्ञता उपलब्ध हो सकती हो।

राष्ट्रीय स्वाभिमान को बनाए रखते हुए नागरिकों की जान बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के दृष्टिकोण से भी आपदा के समय मिलने वाली मानवीय सहायता को राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता के आधार पर प्रभावी ढंग से उपयोग करना सकारात्मक कदम है।

संकट में उपलब्ध हर सक्षम संसाधन का इस्तेमाल हो

नुवाकोट के शिक्षाविद रामप्रसाद रिमाल का कहना है कि आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आपदा के समय निर्णय का पहला आधार लोगों का जीवन बचाना होना चाहिए। संकट में उपलब्ध हर सक्षम संसाधन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और मदद मिलने पर उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। हां, मदद करने वाले को भी बड़े भाई नहीं सहयोगी पड़ोसी की भूमिका में नजर आना चाहिए।

सेवानिवृत्त शिक्षक नवराज साप कोटा भी मानते हैं कि आपदा के समय राहत और बचाव में तेजी सबसे महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि राजनीतिक या कूटनीतिक आग्रह से ऊपर नागरिकों की सुरक्षा को रखा जाना चाहिए। यदि किसी स्थान पर स्थानीय संसाधन पर्याप्त नहीं हैं तो बाहरी सहायता और अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल कर बचाव अभियान को तेज किया जाना चाहिए।

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