गोरखपुर शिक्षक एमएलसी चुनाव: मतगणना में त्रिकोणीय संघर्ष, कैंपों में बढ़ी हलचल
गोरखपुर में शिक्षक एमएलसी चुनाव की मतगणना के दौरान प्रत्याशियों के कैंपों में देर रात तक गहमागहमी बनी रही। भाजपा ...और पढ़ें

सुबह से सजे प्रत्याशियों के कैंप, शाम होते ही उमड़ी समर्थकों की भीड़। जागरण
HighLights
गोरखपुर शिक्षक एमएलसी मतगणना में देर रात तक गहमागहमी।
ध्रुव, संजय और राजीव के बीच कांटे की टक्कर जारी।
मतगणना स्थल पर समर्थकों की भारी भीड़, पुलिस तैनात।
डा. राकेश राय, गोरखपुर। शिक्षक एमएलसी चुनाव की मतगणना के लिए मंगलवार की सुबह से ही गोरखपुर विश्वविद्यालय गेट के सामने प्रत्याशियों के कैंप सज गए। समर्थकों की आवाजाही शुरू हो गई और हर किसी की निगाह मतगणना स्थल पर टिक गई। हालांकि, दोपहर तक मतों के बंडल बनने की सूचना के बीच कैंपों में गिने-चुने लोग ही नजर आए।
इंतजार लंबा था, इसलिए चर्चाओं का सिलसिला भी सीमित रहा। मगर जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, माहौल बदलने लगा। कैंपों में लगीं कुर्सियां भरने लगीं, परिचित चेहरों की आवाजाही तेज हुई और हर नई सूचना पर निगाहें टिकने लगीं। शाम होते-होते प्रत्याशियों के कैंप सियासी हलचल के केंद्र बन गए।
भीड़ का दबाव ऐसा बढ़ा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय के आसपास की सड़कों पर यातायात पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा। गोरखपुर क्लब की ओर से आने वाली सड़क पर आवाजाही रोक दी गई, वहीं आरटीओ तिराहे और विश्वविद्यालय चौराहे पर बैरीकेडिंग कर दी गई।
कैंपों में बढ़ती भीड़ और सड़कों पर पुलिस की सक्रियता बता रही थी कि शिक्षक एमएलसी चुनाव की मतगणना अब केवल आंकड़ों का खेल नहीं रह गई है, बल्कि प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव के आकलन का भी मौका बन गई है। चुनावी गणित आगामी विधानसभा चुनाव की भूमिका भी तैयार कर रही है।
सपा के खेमे में पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर वरिष्ठ नेताओं ने डेरा डाल रखा तो भाजपा के कैंप में भी स्थानीय दिग्गजों की आवाजाही बनी रही। दोनों खेमों में मौजूदगी के अपने सियासी मायने थे। एक ओर प्रत्याशी के प्रदर्शन पर नजर थी तो दूसरी ओर मतों के आंकड़ों के जरिए संगठन की ताकत का आकलन भी हो रहा था। हर किसी की दिलचस्पी इस बात में थी कि शिक्षकों के बीच किसकी पकड़ कितनी मजबूत निकली और किसके पक्ष में समर्थन का समीकरण बैठा।
मतगणना शुरू होते ही गर्म हुआ चर्चा का बाजार
मतगणना शुरू होते ही कैंपों में चर्चाओं का केंद्र बदल गया। अब इंतजार सिर्फ नतीजे का नहीं, रुझानों का भी था। कोई इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो रही सूचनाएं साझा कर रहा था तो कोई मतगणना स्थल पर मौजूद एजेंटों से संपर्क कर सही जानकारी जुटाने में लगा था। फोन की घंटियां बजतीं, बातचीत के बीच अचानक किसी नए आंकड़े का जिक्र होता और फिर आसपास खड़े लोग उसी पर चर्चा करने लगते। हर सूचना के साथ उम्मीदों का पलड़ा कभी एक ओर झुकता तो कभी दूसरी ओर।
त्रिकोणीय संघर्ष में उलझे रहे समर्थक
भाजपा प्रत्याशी ध्रुव कुमार त्रिपाठी, सपा प्रत्याशी संजय त्रिपाठी और निर्दल प्रत्याशी राजीव यादव के बीच कांटे की टक्कर सबसे ज्यादा चर्चा में रही। खासकर राजीव यादव को मिले मतों की बड़ी संख्या ने सियासी जानकारों और समर्थकों को चौंकाया। निर्दल प्रत्याशी के पक्ष में इतने मतों का आना मुकाबले को नए सिरे से देखने का आधार बना। इससे यह भी साफ हुआ कि चुनावी गणित को केवल भाजपा और सपा के बीच सीधी लड़ाई मानकर नहीं देखा जा सकता।
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चुनावी समीकरण समझाते रहे अनुभवी नेता
रुझानों में आगे दिखने वाले प्रत्याशी के कैंप में उत्साह बढ़ता तो पीछे नजर आने वाले खेमे में बेचैनी साफ दिखती। अनुभवी नेता भी मतों के आंकड़ों को जोड़कर जीत-हार के समीकरण समझने में जुटे रहे। कोई शिक्षक मतदाताओं के रुझान का आकलन कर रहा था तो कोई प्रत्याशियों के पक्ष में पड़े मतों के सियासी संकेत तलाश रहा था। देर रात तक कैंपों में यही सिलसिला चलता रहा।
