गोरखपुर में पिछड़ी जातियों का बड़ा गणित, आरक्षित सीटों पर बनी हुई है निगाह
पूर्वांचल में विधानसभा चुनावों से पहले पिछड़ों की राजनीति तेज हो गई है, जहाँ एनडीए और विपक्ष दोनों ही ओबीसी ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
पूर्वांचल में विधानसभा चुनावों से पहले ओबीसी राजनीति महत्वपूर्ण बनी।
एनडीए और विपक्ष दोनों ओबीसी वोटों पर ध्यान केंद्रित कर रहे।
भाजपा को सहयोगी दलों और विपक्ष दोनों से चुनौती मिल रही।
रजनीश त्रिपाठी, गोरखपुर। पूर्वांचल में पिछड़ों की राजनीति महत्वपूर्ण रही है। प्रदेश जैसे-जैसे विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है वैसे-वैसे पूर्वांचल में आरक्षण की मांग से लेकर अलग पहचान की राजनीति का रंग गहरा होता जा रहा है। एनडीए हो या विपक्ष, गोरखपुर क्षेत्र की 62 विधानसभा सीटों पर सभी ओबीसी राजनीति के जरिये लखनऊ का मार्ग खोजना चाहते हैं।
एनडीए के भीतर ही संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर अपने मुद्दे उठा रहे हैं। निषाद पार्टी आरक्षण के सहारे राजनीतिक वजन बढ़ाना चाहती है। वहीं, अपना दल (एस) कुर्मी हिस्सेदारी के आधार पर सीटों में भागीदारी चाहता है। वहीं, सपा की नजर विशेषकर आरक्षित सीटों पर है, जहां उसे लगता है कि बसपा के वोट बैंक का लाभ उसे मिल सकता है।
पूर्वांचल में राजनीति को बिरादरी की जमीन पर पहुंचाने की कोशिश जाति आधारित दल और विपक्ष कर रहा है। निषाद, कुर्मी, सैंथवार, राजभर जैसे वोट बैंकों को लेकर अपनी-अपनी दावेदारी है। इस राजनीति से पार पाने की चुनौती भाजपा के सामने है। विपक्ष के साथ ही उसे अपने सहयोगी दलों के दबाव से भी पार पाना है। ऐसे में गोरखपुर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े क्षेत्रीय संगठन से लेकर बूथ प्रबंधन तक पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगे, जिसके बाद पार्टी रणनीति तय करेगी।
तावड़े भाजपा के प्रमुख पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ मंथन करेंगे। तावड़े ने बिहार विधानसभा चुनाव में यह काम बखूबी किया था। वहीं, सपा प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल भी गोरखपुर की दो सुरक्षित सीटों खजनी और बांसगांव में सम्मेलन कर पीडीए में दलितों के महत्व का संदेश देने में लगे हैं। बिरादरी के मतदाताओं को जोड़ने और तोड़ने की राजनीति निषाद वोट बैंक में सबसे साफ दिख रही है।

प्रदेश सरकार में कैबिनेट रैंक के मंत्री होने के बावजूद वह लगातार दबाव बना रहे हैं। आरक्षण के मुद्दे पर सरकार के गंभीर न होने की स्थिति में राजनीतिक फैसला लेने का बयान दे रहे निषाद 14 सितंबर को सपा के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय से लखनऊ में मिले। यद्यपि संजय निषाद इसे शिष्टाचार भेंट बता रहे हैं, लेकिन यह मुलाकात राजनीति गलियारे में चर्चा का विषय बन गई।
गोरखपुर क्षेत्र में वह लगातार सक्रिय हैं। उनकी पार्टी के सामाजिक आधार में सेंधमारी का प्रयास बिहार के मुकेश सहनी भी कर रहे हैं। वह अपने दल विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) के जरिये आरक्षण को मुद्दा बना रहे हैं। वहीं, रामभुआल निषाद और पप्पू निषाद को लोकसभा भेज चुकी सपा भी निषाद मतदाताओं को साधने में जुटी है। कुर्मी मतदाताओं के दम पर अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल भी एनडीए में ज्यादा सीटों की दावेदारी कर रही हैं।
अनुप्रिया ने छह सितंबर को देवरिया के टाउनहाल में 2027 की तैयारी का आह्वान करने के साथ संगठन को गांव और बूथ तक मजबूत करने पर जोर दिया। इसी सामाजिक आधार से आने वाले सैंथवार अपनी अलग पहचान स्थापित करने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। सैंथवार समाज जाति प्रमाण पत्र में कुर्मी की जगह मल्ल के साथ वर्गीकरण चाहता है। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा कुर्मी मतदाताओं को संदेश देना चाहती है। सैंथवार समाज को साधने के लिए आरपीएन सिंह को भी सक्रिय किया गया है।
यह भी पढ़ें- सीएम योगी के गढ़ पर सपा की नजर, यूपी विधानसभा चुनाव से पहले 'गोरखपुर' कैसे बन गया 'हॉट' शहर?
वहीं, सपा नरेश उत्तम पटेल, लालजी वर्मा के अलावा बस्ती के सांसद राजेंद्र चौधरी के भरोसे इस वोट बैंक में अपनी पैठ को मजबूत करना चाहती है। खजनी-बांसगांव की आरक्षित सीटों पर लगातार दो दिन सम्मेलन और संगठन के निचले ढांचे की भागीदारी से सपा पिछड़ा-दलित आधार मजबूत करने में लगी है। अगले महीने अखिलेश यादव के प्रस्तावित दो दिवसीय गोरखपुर कार्यक्रम की तैयारियां भी इसी क्रम में आगे बढ़ रही हैं।
