गोरखपुर, जागरण संवाददाता। गोरखपुर जिले के बेलघाट के दिनेश प्रताप सिंह को हृदय रोग है। उन्होंने बेतियाहाता स्थित एक डॉक्टर से परामर्श लिया। डॉक्टर ने 15 दिन की दवा लिख दी। दिनेश के पास रुपये कम थे। उन्होंने डॉक्टर से प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र की दवा लिखने का अनुरोध किया। डॉक्टर ने मना कर दिया। उनके पास कुछ ही रुपये थे तो सिर्फ पांच दिन की ही दवा ली। सोचा की गांव जाकर बचे दिनों की दवाएं वहीं से ले लूंगा। पांच दिन दवा खाने के बाद उन्होंने पूरे इलाके के मेडिकल स्टोर में दवा की तलाश कराई लेकिन कहीं नहीं मिली। एक दुकानदार ने बताया कि जिस डॉक्टर ने दवा लिखी है उसी के मेडिकल स्टोर पर जाइए। परेशान दिनेश ने गांव के एक लड़के को किराया और दवा के रुपये देकर डॉक्टर के मेडिकल स्टोर पर भेजा। तब कहीं जाकर उन्हें दवा मिल पाई।

डॉक्टरों की क्लिनिक और नर्सिंग होम में खुल गए हैं मेडिकल स्टोर: यह सिर्फ दिनेश की समस्या नहीं है। ज्यादातर डाक्टरों ने अपने नर्सिंग होम और क्लिनिक में मेडिकल स्टोर खोल दिया है। डाक्टर खुद कंपनियों से संपर्क कर दवाएं बनवाते हैं। जो दवा डाक्टर बनवाते हैं वह दूसरी जगह नहीं मिलती। इस कारण रोगी को वापस वहीं आकर दवा खरीदनी पड़ती है। यह डाक्टर जन औषधि केंद्र की दवा लिखते ही नहीं हैं।

ज्यादा होता है मुनाफा: दवा की बिक्री में ज्यादा मुनाफा ने डाक्टरों को इस धंधे में भी उतार दिया है। जेनरिक दवाएं आसानी से अधिकतम खुदरा मूल्य पर बिक जाती हैं। चूंकि दवा दूसरी जगह नहीं मिलेगी इसलिए रोगी की मजबूरी होती है कि वह वापस डाक्टर के ही मेडिकल स्टोर पर जाए।

मालीक्यूल के नाम पर दवा का होता है विरोध: जो रोगी या उनके स्वजन दवाओं को मालीक्यूल के नाम से खरीदकर इस्तेमाल करते हैं, उनका विरोध होने लगता है। इसे ऐसे समझें- डाक्टर ने गैस की दवा पेंटाप्रोजोल व डोमपेरिडान के काम्बिनेशन की दवा लिखी। यह दवा डाक्टर के मेडिकल स्टोर में यदि 15 रुपये प्रति कैप्सूल है और बाजार में सिर्फ दो से तीन रुपये प्रति कैप्सूल में मिल जाती है तो रोगी बाहर वाली दवा ही खाना चाहता है। दोनों दवाओं के पावर में भी कोई अंतर नहीं रहता है लेकिन डाक्टर के यहां से बताया जाता है कि यदि दूसरे नाम से दवा खायी तो यह काम नहीं करेगी। प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों में मालीक्यूल के नाम से दवा मिलती है। यह दवा पेटेंट और जेनरिक दवाओं के मुकाबले काफी सस्ती होती हैं लेकिन डाक्टर मालीक्यूल के नाम से दवा नहीं लिखते हैं।

बाहर छूट, यहां प्रिंट रेट चलता है: क्लिनिक या नर्सिंग होम के मेडिकल स्टोर पर रोगी को अधिकतम खुदरा मूल्य पर ही दवाएं दी जाती हैं। इसमें एक रुपये कम नहीं किए जाते हैं। इन दवाओं का पेटेंट बाहर के मेडिकल स्टोरों पर 15-20 प्रतिशत छूट पर मिल जाता है।

सरकारी नहीं चाहते तो प्राइवेट का क्या कहना: स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोग खुद स्वीकार करते हैं कि प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र के माध्यम से कम दाम पर दवाओं की उपलब्धता बहुत बड़ी पहल है लेकिन खुद इसके लिए डाक्टरों को आगे आना होगा। अब जब सरकारी अस्पतालाें के डाक्टर ही जन औषधि केंद्र की दवाएं नहीं लिख रहे हैं तो प्राइवेट डाक्टरों की बात करना भी बेमानी है।

कई डाक्टर लिखते हैं मालीक्यूल नाम से दवा: महानगर में कुछ ऐसे भी डाक्टर हैं जो मालीक्यूल के नाम से दवा लिखते हैं। इन डाक्टरों के भी अपने मेडिकल स्टोर हैं लेकिन रोगी कहीं से भी दवा खरीद सकता है। इन डाक्टरों की दुकानों पर पेटेंट दवाएं ही मिलती हैं। साथ ही कुछ प्रतिशत छूट भी दी जाती है।

Edited By: Pragati Chand